स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)
Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary
महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 167, कुल 190 में से
संदर्भ में पढ़ेंपुर्यष्टक १५७ ज्यों ही वह कायिक व्यवहार में पर्यवसित हो जाती है त्यों ही उस पर 'मैं पकाता हूँ, मैं कल लिखता था; मैं अगले वर्ष शैवदर्शन पढूँगा' इत्यादि रूपों में देहाभिमान और तदनुकूल संकुचित कालक्रम और देशक्रम का उपराग चढ़ जाता है। स्थूल क्रिया की अभिलापात्म- मकता भी स्थूल ही होती है। यह १अभिलापात्मकता वही पूर्वोक्त अहंविमर्शमयी परावाणी ही पश्यन्ती और मध्यमा के मार्ग से वैखरी पदवी पर उतर कर 'अ' से 'क्ष' तक के स्थूल-वर्णसमुदाय (मातृका) के रूप में विकसित हुई होती है। फलतः ऐसी स्थूल-अभिलापमयी और सक्रम पशुवर्तिनी क्रिया संसार के पशुवर्ग को पग-पग पर तथाकथित शुभ एवं अशुभ कर्मों की ग्राह्यता और हेयता की शङ्काओं के पाशों से जन्मजन्मान्तरों तक जकड़ कर रख देती है। स्थूल अभिलाप अथवा पारिभाषिक शब्दों में 'ककार' आदि स्थूल वर्णसमुदाय में अधिष्ठित ब्राह्मी इत्यादि पशुशक्तियों के द्वारा बुद्धि भेद में डाला गया पशु, प्रतिसमय की जाने वाली स्थूलक्रियाओं के वास्तविक रूप को भूल कर, उनको केवल अपने देह, प्राण आदि के अभिमान के साथ जोड़कर ही करता रहता है। सूत्र के अन्तिम चरण में इस तथ्य की ओर संकेत किया गया है कि यदि किसी अलक्ष्य अनुग्रह से पशु में यह सद्ज्ञान उदित हो जाये कि वास्तव में सारी क्रियायें शिववर्तिनी क्रियाशक्ति का बहिर्मुखीन विकासमात्र हैं और 'मैं' अर्थात् 'मेरा शरीर, मेरी बुद्धि' इत्यादि इनके कर्ता नहीं हैं। तो उसके ये स्थूल क्रियात्मक पाश स्वयं ही छिन्न-भिन्न हो जाते हैं। यथार्थरूप में ऐसी अनुभूति प्राप्त कर लेने पर, वह जो कुछ भी करे, उसमें उसे शिवत्व की ही उपलब्धि होती रहती है ॥४६-४८॥ [ पुर्यष्टक ] पूर्वसूत्र में यह कहा गया है कि आत्मा को अपनी ही शक्ति, अज्ञात होने की अवस्था में बन्धन में डाल देती है। इस सम्बन्ध में अब अगले दो सूत्रों में यह समझाया जा रहा है कि वह बन्धन कैसा होता है और उससे आत्मा कैसी दुर्गति में पड़ जाती है:— २तन्मात्रोदयरूपेण मनोऽहंबुद्धिवर्तिना । पुर्यष्टकेन संरुद्धस्तदुत्थं प्रत्ययोद्भवम् ॥४९॥ तन्मात्रोदयः, तन्मात्राणां शब्दादीनाम् अनुभवरूपेण, मनोऽहंकारबुद्धिभिः इति त्रिभिः परामृश्यमानेन पुर्यष्टकेन बद्धः, तदुत्थं तस्मादुद्भूतं सुखदुःखसंवेदनरूप तदा ॥४९॥ १. इस विषय में द्रष्टव्य शिवसूत्रविमर्शिनी का १-४ २. 'यहाँ पर पहले 'तन्मात्ररूप' ऐसा शब्दखण्ड लेकर उससे सूक्ष्मपुर्यष्टक (कारण शरीर) और फिर 'तन्मात्रोदयरूप' ऐसा शब्दखण्ड लेकर उससे स्थूल-पुर्यष्टक (पाञ्चभौतिक स्थूल शरीर) का अभिप्राय समझना चाहिये।