स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)
Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary
by महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट
Source: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (origin)
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Read in contextभूमिका ७ समक्ष ही सौभाग्यवश उनसे भेंट हुई और प्रस्तुत विषय की चर्चा भी छिड़ गई। डा० महोदय श्रीभट्ट कल्लट को ही मूल सूत्रकार मानने के पक्ष में हैं। इस विषय में वे उल्लिखित श्री भास्कराचार्य की मान्यता को ही श्री क्षेमराजाचार्य की मान्यता की अपेक्षा अधिक प्रामाणिक मानते हैं। साथ ही उनका कथन है कि उनके गुरुमहाराज प्रातःस्मरणीय श्री अमृतवाग्भ- वाचार्य महाराज का मत भी यही है। इसके प्रतिकूल श्री सद्गुरु ईश्वरस्वरूप जी महाराज अपने गुरुक्रम से चली आ रही परम्परा के आधार पर, सिद्ध वसुगुप्त को मूलसूत्रकार मानते हैं। अस्तु, परमेश्वरस्वरूप गुरुओं की बातें गुरु ही जानें। प्रस्तुत लेखक को, उनकी मान्य- ताओं को उचित या अनुचित ठहराने का न तो कोई अधिकार है और न उसमें ऐसा साहस है। केवल अपनी ओर से इतना नम्र निवेदन है कि यदि श्रीभट्ट कल्लट के अपने ही पद्य— अगाधसंशयाम्भोधिसमुत्तरणतारिणीम् । वन्दे विचित्रार्थपदां चित्रां तां गुरुभारतीम् ॥ (स्पन्दकारिकावृत्ति ५२ वाँ पद्य) के अर्थ पर निष्पक्षता से विचार किया जाये, तो सहज ही में यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि वास्तव में सूत्रकार होने का श्रेय सिद्ध वसुगुप्त को प्राप्त है। मूल स्पन्दसूत्रों की संख्या ५१ है। श्रीक्षेमराजाचार्य ने भी स्पन्दनिर्णय के उपोद्घात में मूलसूत्रों की यही संख्या बताई है। इससे यह बात स्वयं सिद्ध हो जाती है कि उल्लिखित कारिका श्रीभट्ट कल्लट ने मूल- सूत्रों पर वृत्ति लिखने के अनन्तर, गुरुभारती की वन्दना करने के लिये, अपनी ओर से जोड़ दी है। यदि मूलसूत्र भी उनके अपने ही शब्द होते तो सम्भवतः उनको यह कारिका लिखने की आवश्यकता नहीं पड़ती। कोई भी विवेकशाली व्यक्ति, अपने ही शब्दों को 'गुरुभारती' का नाम देकर और कारिका में वर्णित विशेषणों से सजाकर, स्वयं ही उनकी वन्दना करता हुआ देखा नहीं जाता है। अतः सिद्ध वसुगुप्त के ही मूलसूत्रकार होने की मान्यता स्वयं वृत्ति- कार के ही शब्दों से प्रमाणित होती है। इसके अतिरिक्त प्रस्तुत अनुवाद के ही मूल पुस्तक, यहाँ के रिसर्च कार्यालय द्वारा प्रकाशित स्पन्दकारिका (श्री कल्लटाचार्य वृत्ति-संवत् १८७० संस्करण) के अन्त में, तीन श्लोकों का एक अलग परिशिष्ट जैसा छपाया गया है। ये तीन श्लोक श्रीभट्ट कल्लट ने लिखे हैं अथवा किसी और ने, कुछ पता नहीं है। इनमें से दूसरा श्लोक इस प्रकार है— दृब्धं महादेवगिरौ महेशस्वप्नोपदिष्टाच्छिवसूत्रसिन्धोः । स्पन्दामृतं यद्वसुगुप्तपादैः श्रीकल्लटस्तत्प्रकटीचकार ॥ उल्लिखित श्लोकों की रचना चाहे जिस किसी व्यक्ति ने की हो परन्तु यहाँ पर उद्धृत श्लोक, स्पष्ट शब्दों में, वसुगुप्तपाद को ही सूत्रकार और श्री भट्टकल्लट को वृत्तिकार उद्घोषित करता है।