स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)
Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary
महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 16, कुल 190 में से
संदर्भ में पढ़ें६ स्पन्दकारिका पहले तीन खण्डों की व्याख्या अपने स्पन्द-सूत्रों में और अन्तिम खण्ड की व्याख्या अपनी 'तत्त्वार्थचिन्तामणि' नामक टीका में की। श्री भास्कराचार्य के शब्द इस प्रकार हैं- श्रीमन्महादेवगिरौ वसुगुप्तगुरोः पुरा । सिद्धादेशात्प्रादुरासन् शिवसूत्राणि तस्य हि ॥ सरहस्यान्यतः सोऽपि प्रदाद्भट्टाय सूरये । श्रीकल्लटाय सोऽप्येवं चतुःखण्डानि तान्यथ ॥ व्याकरोत्रिकमेतेभ्यः स्पन्दसूत्रैः स्वकैस्ततः । तत्त्वार्थचिन्तामण्याख्यटीकया खण्डमन्तिमम् ॥ (शिवसूत्रवार्त्तिक उपोद्घात) श्री उत्पल (वैष्णव) और श्रीभास्कर की इस मान्यता का आधार क्या है, इसका कहीं उल्लेख नहीं मिलता है और न इन्होंने स्वयं ही इस विषय में कुछ कहा है । श्री क्षेमराजाचार्य का मत है कि सूत्रों की रचना स्वयं सिद्ध वसुगुप्त ने ही की है । उन्होंने अपनी इस मान्यता को स्पन्दनिर्णय के अन्त में अपनी ओर से जोड़े हुए एक पद्य में अभिव्यक्त किया है। वह पद्य इस प्रकार है- लब्ध्वाप्यलभ्यमेतज्ज्ञानधनं हृद्गुहान्तकृतनिहितेः । वसुगुप्तवच्छिवाय हि भवति सदा सर्वलोकस्य ॥ (स्पन्दनिर्णय ४, २) जहाँतक श्री रामकण्ठाचार्य की विवृति का सम्बन्ध है उससे भी, पाठक को, किसी अन्तिम एवं निश्चित निर्णय पर पहुँचने में कोई सहायता नहीं मिलती है। यहाँ के रिसर्च कार्यालय द्वारा प्रकाशित विवृति (संवत् १९६९ संस्करण) के पृष्ठांक ३ पर उल्लिखित 'केनापि ग्रथितां प्रसारणधिया........' इत्यादि उपोद्घातात्मक पद्य में श्रीरामकण्ठाचार्य ने सूत्रावली को ग्रथन करनेवाले किसी निश्चित व्यक्ति का नाम नहीं लिया है। इसी पद्य पर लिखी हुई टिप्पणी में स्पष्ट शब्दों में लिखा हुआ है कि श्री वसुगुप्तपाद ने ही सर्वप्रथम सूत्रा- वली की रचना की है- 'प्रथमं वसुगुप्तपादैः सूत्रावलिः दृब्धा' । यह टिप्पणी चाहे किसी ने भी लिखी हो, परन्तु किस आधार पर लिखी है इसका सूत्र कहीं भी प्राप्य नहीं है। दूसरी ओर आचार्य जी ने 'अगाधसंशया.............' इत्यादि अन्तिम पद्य की विवृति में गुरु वसुगुप्त का नाम तो लिया है परन्तु स्पष्ट शब्दों में उसको सूत्रकार उद्घोषित नहीं किया है। यदि यह माना भी जाये कि आचार्य जी श्री भट्ट कल्लट को ही मूल सूत्रकार मानने के पक्ष में थे, तो भी इस शंका का समाधान नहीं होने पाता कि उन्होंने फिर यह बात किसी स्थान पर स्पष्ट शब्दों में क्यों नहीं लिखी ? साथ ही आचार्य जी के इन शब्दों से यह स्थिति भी पूर्णतया स्पष्ट नहीं हो जाती है कि क्या गुरु वसुगुप्त ने अपने शिष्य को अद्वैत-सिद्धान्त का रहस्य सूत्ररूप में दिया था या मौखिक उपदेश के रूप में ? आज से कुछ दिन पहले प्रस्तुत लेखक के परम आदरणीय गुरुवर्य डा० बलजिन्नाथ पण्डित शिमला से यहाँ पधारे थे। ईश्वर आश्रम में श्री सद्गुरु ईश्वर स्वरूप जी महाराज के