भारतकोश
स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary

महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished190 पृष्ठ

पृष्ठ 15, कुल 190 में से

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भूमिका ५ तरङ्गिणी का पद्य उद्धृत किया गया है उसके अनुसार श्री भट्ट कल्लट और अन्य कई सिद्धों ने, लोगों पर अनुग्रह करने के लिए, कश्मीर के प्रसिद्ध राजा अवन्तिवर्म्मन् के शासनकाल में पृथिवी पर अवतार लिया था। श्री कल्हण ने राजतरङ्गिणी के ही एक अन्य पद्य में अवन्ति- वर्म्मन् के राज्याधिरोहण का काल लौकिक संवत् २९०० बताया है। श्लोक इस प्रकार है :- एकोनत्रिंशे वर्षेऽथ प्रजाविप्लवशान्तये । विनिर्वायोत्पलापीडं तमेव नृपति व्यधात् ॥ (राजतरङ्गिणी : ४, ७१६) यह संवत् श्री स्टैन महोदय की गणना के अनुसार ईस्वी ८५५/५६ बैठता है। अवन्तिवर्म्मन् का राज्यकाल ३१ वर्ष का रहा है अतः ईस्वी सन् ८८६/८७ अवन्तिवर्म्मन् के समय की अपर सीमा है। सिद्ध वसुगुप्त और श्री भट्ट कल्लट आपस में गुरु और शिष्य रहे हैं अतः उनके समकालीन होने में तनिक भी संशय नहीं। दूसरी ओर कल्हण ने श्रीभट्ट कल्लट को सिद्ध के रूप में स्मरण किया है। उसको सिद्धावस्था प्राप्त करने में कम से कम पचास वर्ष तो लगे ही होंगे। अतः यदि उसके प्रादुर्भाव का समय नवीं शताब्दी का आरम्भ माना जाये तो सिद्ध वसुगुप्त के प्रादुर्भाव का समय बीस वर्ष प्रति पीढ़ी के हिसाब से पीछे लेकर आठवीं शताब्दी का उत्तरार्ध मानना युक्तियुक्त होगा। स्पन्द-सूत्रों का वास्तविक लेखक इस सम्बन्ध में भी प्राचीनकाल से ही यहां के शैव आचार्यों में पारस्परिक मत-भेद चलता आ रहा है। आजतक भी यह प्रश्न विवादग्रस्त ही है और इसका कोई निश्चित एवं संतोषजनक समाधान प्राप्त नहीं हो सका है। कई आचार्यों के विचार में मूल सूत्रों की रचना स्वयं सिद्ध वसुगुप्त ने ही की है और भट्ट कल्लट ने गुरु की सूत्रात्मक भाषा का आशय सम- झाने के लिए इनपर वृत्ति लिखी है। आजकल भी यहाँ के शैव क्षेत्रों में बहुमत इसी मान्यता का समर्थन कर रहा है। इसके प्रतिकूल कई आचार्यों का मत यह है कि मूलसूत्रों की रचना श्री भट्ट कल्लट ने की है और अपनी ही भाषा का अभिप्राय स्पष्ट करने के लिये इन पर स्वयं ही वृत्ति भी लिखी है। इस दूसरी मान्यता के समर्थकों में स्पन्दप्रदीपिका के लेखक श्री उत्पल (वैष्णव) और शिवसूत्रवार्त्तिक के लेखक श्री भास्कराचार्य प्रमुख हैं। श्री उत्पल का कथन है कि श्री भट्ट कल्लट को तत्त्वदर्शी गुरु वसुगुप्त से यह रहस्य मिला और उसने इसको श्लोकबद्ध किया— वसुगुप्तादवाप्येदं गुरोस्तत्त्वार्थदर्शिनः । रहस्यं श्लोकयामास सम्यक् श्रीभट्टकल्लटः॥ (स्प० प्र० ५३ वां पद्य) श्री भास्कराचार्य ने, अपने शिवसूत्रवार्त्तिक के उपोद्घात में पूर्वोक्त जनश्रुति का उल्लेख करते हुए, अपनी यह मान्यता प्रस्तुत की है कि प्राचीन समय में गुरु वसुगुप्त को, किसी सिद्ध के आदेश से महादेव पर्वत पर शिवसूत्र मिले थे। उसने वे सूत्र और उनका रहस्य श्री भट्ट कल्लट को दे दिया। सूत्र चार खण्डों में विभक्त थे। श्री भट्ट कल्लट ने इनमें से

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