स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)
Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary
महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 14, कुल 190 में से
संदर्भ में पढ़ें४ स्पन्दकारिका I. श्री भट्ट कल्लट की स्पन्दकारिकावृत्ति । पाठकों के हाथों में इसी वृत्ति का भाषानुवाद है । II. श्री क्षेमराज का स्पन्द-सन्दोह । यह केवल पहले ही स्पन्द-सूत्र पर लिखी गई एक विस्तृत टीका है और इसी में अन्य सारे सूत्रों का सार संगृहीत किया गया है । III. श्री क्षेमराज का ही स्पन्द-निर्णय । इसमें सारे स्पन्द-सूत्रों पर अलग-अलग टीका लिखी गई है । IV. श्री रामकंठ की स्पन्दकारिका-विवृति । यह विवृति श्री भट्ट कल्लट की वृत्ति का आशय पूर्णतया प्रकाश में लाने के अभिप्राय से लिखी गई है । V. श्री उत्पल (वैष्णव) की स्पन्द-प्रदीपिका । यह भी सारे स्पन्द-सूत्रों पर लिखी गई विस्तृत टीका है । श्री उत्पल (वैष्णव) के विषय में यह ध्यान में रखना आवश्यक है कि यह व्यक्ति ईश्वरप्रत्यभिज्ञा के लेखक भगवान् उत्पलदेव से भिन्न कोई दूसरा व्यक्ति था । इस उपलब्ध साहित्य का तुलनात्मक अध्ययन करने से यह तथ्य भली-भाँति समझ में आता है कि इन टीकाकारों में बहुधा पारस्परिक मतभेद और दृष्टिकोणों की भिन्नता रही है । प्रत्येक लेखक ने किसी विशेष आध्यात्मिक दृष्टिकोण को अपनाकर ही सूत्रों की व्याख्या की है । सिद्ध वसुगुप्त और श्री भट्ट कल्लट का समय इसमें न तो किसी प्रकार का खेद है और न कोई आश्चर्य कि इन दोनों सिद्ध पुरुषों ने अपने जीवनवृत्त या वंशावली के विषय में कहीं कुछ भी नहीं लिखा है क्योंकि ऐसा करने में इन्होंने विशुद्ध भारतीय मर्यादा का ही पालन किया है । परवर्ती लेखकों ने भी इनके विषय में जितना उल्लेख किया है उससे केवल इतना ज्ञात होता है कि अर्वाचीन शैवक्षेत्र इनको सिद्ध गुरुओं के रूप में स्मरण करते आये हैं । क्षेमराजाचार्य ने स्पन्द-निर्णय के उपोद्घात में उल्लिखित जनश्रुति का उल्लेख करने के अवसर पर, जहाँ सिद्ध वसुगुप्त का मात्र नामनिर्देश किया है वहाँ श्री भट्ट कल्लट की प्रासङ्गिक चर्चा भी नहीं की है । आचार्यजी ने केवल शिवसूत्र विमर्शिनी के उपोद्घातमें सिद्ध वसुगुप्त को महामाहेश्वर सिद्धगुरु और श्री भट्ट कल्लट को उनके अन्यतम शिष्य के रूप में स्वीकार किया है । इसके प्रतिकूल कश्मीर के प्रसिद्ध इतिहास कार कल्हण ने अपनी राजतरङ्गिणी में, मुख्यरूप में, श्री भट्ट कल्लट का ही नाम लेकर, उसके समकालीन अन्य सिद्धों का 'आदि' शब्द से गौणरूप में ही निर्देश किया है । अनुग्रहाय लोकानां भट्टश्रीकल्लटादयः । अवन्तिवर्मणः काले सिद्धा भूममवातरन् ॥ (राजतरङ्गिणीः ५, ६६) इन दोनों के अतिरिक्त दूसरे शैव लेखकों ने भी अपनी कृतियों में इन दोनों का, गुरु और शिष्य के रूप में, केवल नामोल्लेख किया है । अतः इस विषय में तबतक मौन का आश्रय लेना ही श्रेयस्कर है जबतक इसपर अलग शोध न किया जाये । जहाँतक इन दोनों के समय का सम्बन्ध है, हमें श्री कल्हण का परम आभार स्वीकार करना चाहिये, क्योंकि उन्होंने इस समस्या का समाधान करके रखा है । अभी ऊपर जो राज-