भारतकोश
स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary

महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished190 पृष्ठ

पृष्ठ 13, कुल 190 में से

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भूमिका ३ CC-0.In Public Domain. Digitization by eGangotri वृत लोगों को समझा कर, उनका उद्धार करे । सिद्ध वसुगुप्त ने भगवान् के आदेशानुसार वहाँ से उन सूत्रों का संग्रह किया और श्री भट्टकल्लट आदि सत्-शिष्यों को उनका यथावत् अध्ययन भी कराया । साथ ही स्वयं उन सूत्रों में वर्तमान, शक्तिमान् और शवित के पूर्ण अभेदसिद्धान्त का सार, इकावन कारिकाओं में संग्रहीत भी किया । आगे चलकर उन्हीं इकावन कारिकाओं को स्पन्दकारिका, स्पन्दसूत्र या शक्तिसूत्र की संज्ञा दी गई । श्री भट्ट कल्लट ने परतत्त्व की विमर्शप्रधानता के सिद्धान्त को अपनाकर इन स्पन्द- सूत्रों पर अपनी वृत्ति लिखी और स्पन्द-सम्प्रदाय का शिलान्यास किया । ऊपर उल्लेख किया गया है कि सिद्ध वसुगुप्त के द्वारा अद्वैत शैवदर्शन का पुनरुद्धार हुआ । वास्तव में उस समय इस दर्शन का दूसरी बार पुनरुद्धार हुआ । सिद्ध वसुगुप्त से पहले बहुत प्राचीनकाल में भी, प्रतिकूल विचारधाराओं के प्रचण्ड प्रहारों से, इसका उच्छेद हो चुका था । उस काल में भी भगवान् आशुतोष ने, अंधकार में पड़े हुए लोगों का उद्धार करने की इच्छा से, श्रीकण्ठ की मूर्ति धारण करके, भगवान् दुर्वासा के द्वारा इसका पुनरुद्धार करवाया था । इस घटना का उल्लेख भगवान् अभिनवगुप्त ने अपने तंत्रालोक के प्रथम आह्निक में विस्तारपूर्वक किया है । स्पन्द-सम्प्रदाय का उपलब्ध साहित्य जिस प्रकार सिद्ध वसुगुप्त के अनन्तर श्रीसोमानन्द और उसकी शिष्य-परम्परा ने एक से एक बढ़कर स्वतन्त्र ग्रन्थों की रचना करके विशाल प्रत्यभिज्ञा-साहित्य की सर्जना की उस प्रकार स्पन्द-सम्प्रदाय में ऐसे किसी मौलिक लेखक का नाम नहीं मिलता है जो इस विषय पर स्पन्दकारिका के अतिरिक्त अन्य किसी स्वतन्त्र ग्रन्थ की रचना करता । इसका कारण क्या है, यह कुछ समझ में नहीं आता है । यह सोचना भी गलत है कि ऐसे ग्रन्थ लिखे तो गये होंगे परन्तु बाद में राजनैतिक विषमताओं के कारण काल-कवलित हो गये । यदि ऐसा ही हुआ होता तो प्रत्यभिज्ञा-साहित्य या शैवदर्शन के दूसरे प्राचीन आगम-ग्रन्थ या स्वयं स्पन्द- सूत्र ही उन विषमताओं के कठोर प्रहारों से कैसे बच सकते ? अतः स्पष्ट है कि स्पन्द विषय पर सिद्ध वसुगुप्त के अनन्तर, स्पन्द-कारिकाओं के अतिरिक्त, कोई मौलिक ग्रन्थ नहीं लिखा गया । इस विचार में भी कोई सार नहीं दिखता कि कश्मीर में अधिकतर संख्या शैवों की ही रही है शाक्तों की नहीं । आजकल भी यहाँ शाक्त-क्रम पर चलनेवाले लोगों की कमी नहीं है । फिर इसमें क्या कारण हो सकता है, यह स्वयं शिवभट्टारक ही जानते हैं । स्पन्द-सूत्रों पर बहुत सी वृत्तियां या टीकायें अवश्य लिखी गईं । इनमें से कई आज भी उपलब्ध हैं और कइयों का केवल उल्लेख मिलता है । अभिनवगुप्तपाद के प्रधान शिष्य श्रीक्षेमराजाचार्य ने अपने स्पन्द-निर्णय में अनेकों विवृत्तियों का उल्लेख किया है :— 'यद्यप्यस्मिन् विवृत्तिगणना विद्यते नैव शास्त्रे' ॥ उन्होंने विशेषतः सूत्राङ्क १७ और १८ की व्याख्या में भट्टलोल्लट की वृत्ति और अन्य टीकाकारों की टीकाओं का उल्लेख किया है । ये वृत्तियां या टीकायें उनके समय में उपलब्ध रही होंगी परन्तु दुर्भाग्य से आजकल उपलब्ध नहीं हैं । आजकल जो वृत्तियां या टीकायें उपलब्ध हैं उनका ब्योरा निम्नलिखित प्रकार से है :— Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal

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