स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)
Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary
by महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट
Source: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (origin)
Page 78 of 190
Read in context६८ स्पन्दकारिका आलोक पुञ्ज की तरह स्वरूप के ही बहिर्मुख विकास के रूप में प्रतीत होती हैं। इस प्रकार की यौगिक अनुभूति के स्तर को शास्त्रीय शब्दों में तुरीया दशा या शाक्तभूमिका में प्रविष्ट होने की भूमिका कहा जाता है। इसी शाक्तभूमिका का साक्षात्कार हो जाने के अनन्तर साधक में, ज्यों ज्यों इस भाव पर स्थिर रहने की क्षमता में उत्तरोत्तर वृद्धि होती जाती है त्यों त्यों उसको कई ऐसी १लोकोत्तर यौगिक भूमिकायें स्वतः अनुभव में आ जाती हैं जो अन्तिम तुर्यातीत दशा पर शीघ्र ही आरूढ होने की पूर्वसूचना की प्रतीक होती हैं। वास्तव में शैवगुरुओं का कथन है कि तुरीया-भूमिका पर शाश्वत स्थिरता प्राप्त करना ही तुरीयातीत-भूमिका (पूर्ण शिवभाव) पर आरूढ होना होता है। इन यौगिक भूमिकाओं को ही परमकारुणिक भगवान् चन्द्रमौलि ने 'विस्मय' का नाम दे दिया है जिसका उल्लेख प्रस्तुत सूत्र में 'स्मयमानः' शब्द से किया गया है। शैवदर्शन में २'विस्मय' शब्द का अर्थ आश्चर्य की अनिर्वाच्य एवं स्वसंवेद्य अनुभूति है। योगी को शाक्त- भूमिका का साक्षात्कार होते ही, उसके प्रति एक प्रकार की अतृप्ति जैसी उत्पन्न हो जाती है। फलतः वह बार बार अन्तर्मुख होकर उस आनन्दसागर में डुबकियां लगाने लगता है। ऐसे समयों पर उसके अन्तस् में एक विशेष प्रकार की आश्चर्यमानता की जैसी दशा उदित हो जाती है जो उसको बार बार अन्तर्मुख हो जाने की ओर आकर्षित कर लेती है। शैव मान्यता के अनुसार यह विस्मयात्मक योगभूमिका साक्षात् तुरीयारूप और नित्य नव-नव-चमत्कारमयी होने के कारण सबसे उत्कृष्ट और केवल स्वानुभवगम्य है, जबकि अणिमा इत्यादि दूसरे प्रकार की यौगिक भूमिकायें, इसकी अपेक्षा निम्नस्तर की और परसंवेद्य भी हैं। ३दैनिक आदान-प्रदानों में जब कोई मनुष्य किसी विशेष अतिशय से युक्त वस्तु का साक्षात्कार कर लेता है तो उसके मन में एक प्रकार की विचित्र एवं स्तम्भकारिणी वृत्ति का उदय हो जाता है। उस समय वह उस वस्तु के, अन्य वस्तुओं से विशिष्ट, आकार-प्रकार को कौतूहलपूर्ण नेत्रों से देखता हुआ भी वाणी के द्वारा कुछ अभिव्यक्त नहीं कर सकता है। उस समय उसको अन्तः-चेतना, उसी वस्तु के अनन्य एवं अद्भुत सौन्दर्य का आन्तरिक रूप में ही आनन्द लेती हुई एक ऐसी अकथनीय अवस्था में डूब जाती है जिसको 'विस्मय' १. ता एव योगस्य परतत्त्वैक्यस्य सम्बन्धिन्यो भूमिकाः। तदध्यारोहविश्रान्तिसूचिकाः परिमिता भूमयः। (शि० सू० वि०, १.१२) २. विस्मयो योगभूमिकाः। (शि० सू०, १.१२) ३. यथा सातिशयानन्दे कस्यचिद्विस्मयो भवेत्। तथास्य योगिनो नित्यं तत्तद्ध्येयावलोकने ॥ निःसामान्यपरानन्दानुभूतिस्तिमितैन्द्रिये । परे स्वात्मन्यतृप्त्यैव यदाश्चर्यं हि विस्मयः ॥ (शि० सू० वा० (वरद), पृ० २.६३)