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स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary

by महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट

Source: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished190 pages

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'या' 'आश्चर्यमानता' कहते हैं। ठीक इसी प्रकार स्वात्मनिष्ठ साधक को भी बार-बार शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध इस वेद्यपञ्चक के, सामान्य-स्पन्दमयी अहन्ता में विश्रान्त हो जाने के अवसरों पर, अनिर्वाच्य अतिशयता से युक्त और नव-नव-चमत्कार (चैतन्य रस का अलौकिक आस्वाद) से पूर्ण स्वरूप-समावेश का उदय हो जाता है। उस समय उसके अन्तस् में, स्वरूपभूत करणेश्वरीचक्र के विकसित वैभव की अनुभूति प्राप्त कर लेने से कोई ऐसी आन्तरिक दशा उदित हो जाती है कि वह बार बार उस स्वरूपसमावेशमय आनन्द का, अतृप्तरूप में, अनुभव करता हुआ १आश्चर्यमानता से सराबोर हो जाता है। इस आश्चर्यमानता के प्रारम्भिक रूप को शास्त्रीय शब्दों में 'साश्चर्यस्पन्दरूपता' कहते हैं। इस दशा के उदित हो जाने के अनन्तर ही ऐसा साधक विकल्पहीन तुर्यातीत दशा पर प्रतिष्ठित होने की क्षमता प्राप्त कर लेता है। इस दशा का उदित होना ही इस बात का सूचक होता है कि ऐसे योगीश्वर की आत्मा, पञ्चकञ्चुक की सीमाओं को लांघ कर, भेदरहित विश्वात्मभाव के उन्मुक्त आकाश में विचरण करने लगी है और वह अपने ही चिन्मात्ररूप को सर्वत्र उपलब्धा या अधिष्ठाता के रूप में अनुभव करने लगी है। ऐसी मुक्तात्मा के लिए कभी भी आवागमन के बन्धन में फँस जाने का प्रश्न ही नहीं उठता है क्योंकि एक बार पिंजरे का द्वार खुल गया, उन्मुक्त होने के लिए युग युगों में तड़पता हुआ, विहङ्गम उड़ कर शून्य में खो गया, अब वह आकर फिर उसी पिंजरे का बन्दी बन जायेगा, ऐसी कल्पना करना व्यर्थ है। ऊपर कहा गया है कि तुर्यावस्था पर पहुँचा हुआ योगी बार बार उस आनन्द का अनुभव करने के लिये अन्तर्मुख हो जाता है। इस बार बार अन्तर्मुख हो जाने की अवस्था को शैव शब्दों में 'क्रममुद्रा' कहते हैं। साथ ही इस अवस्था को द्योतित करने वाले 'भैरवं- मुद्रा, स्वरूप-समावेश, शाम्भव-समावेश' इत्यादि अन्य कतिपय शास्त्रीय शब्द भी हैं। क्रममुद्रा नित्योदित-समाधि को कहते हैं। इस अवस्था में साधक अन्तर्मुख अवस्था के अति- रिक्त बहिर्मुख अवस्था में भी चित्-रूपता में २समाविष्ट ही रहता है। इसका अभिप्राय यह कि क्रममुद्रा समाधि की ऐसी परिपक्व अवस्था होती है कि साधक स्वरूप-समावेश के बल से, सहज ही में, ३बहिर्मुखता से अन्तर्मुखता में और अन्तर्मुखता से बहिर्मुखता में विद्युद्- गति से प्रवेश कर सकता है। ऐसा करने में उसको कोई प्रयत्न नहीं करना पड़ता है क्योंकि निरन्तर अभ्यास के द्वारा यह उसका स्वभाव ही बना होता है। अपरिपक्व समाधि दशा में समाधिकाल तक ही स्वरूप की अनुभूति रहती है परन्तु इसमें ऐसा कोई प्रतिबन्ध नहीं रहता है। यही कारण है कि सिद्ध पुरुषों ने ऐसी समाधि को 'सबाह्याभ्यन्तरसमावेश' का नाम दिया है। गुरुओं का कथन है कि इस अवस्था पर पहुँचा हुआ साधक व्युत्थानदशा १. द्रष्टव्य, शि० सू० वि०, १.१२ २. क्रममुद्रया अन्तःस्वरूपया बहिर्मुखः समाविष्टो भवति साधकः । (प्र० हृ० सू०, १९) ३. तत्रादौ बाह्याद् अन्तःप्रवेशः, अभ्यन्तराद् बाह्यस्वरूपे प्रवेश आवेशवशाद् जायत इति सबाह्याभ्यन्तरसमावेश मुद्राक्रमः। (तत्रैव)