स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)
Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary
by महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट
Source: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (origin)
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Read in context७० स्पन्दकारिका में भी अर्थात् संसार के सारे कार्यकलापों को करता हुआ भी उन्हीं समाधिकालीन संस्कारों के द्वारा प्रत्येक वेद्यपदार्थ में मात्र चिन्मयता के ही आभास को प्राप्त करने के कारण, दोनों अवस्थाओं में १स्वरूपनिष्ठ ही होता है। उसको सारा भाववर्ग शरत्काल के मेघखण्ड की तरह चिदाकाश में ही लीन होता हुआ प्रतीत होता है। फलतः ऐसा योगी अभी अन्तर्मुख और अभी बहिर्मुख होता है। इस द्विमुखी समाधिक्रम को शास्त्रकारों ने इस प्रकार अभिव्यक्त किया है— “२शाक्तभूमिका पर पहुँचा हुआ योगी 'निमीलनसमाधि' के द्वारा, बाहर के इदन्तरूप भाववर्ग को सामान्यस्पन्द में ही विश्रान्त करता हुआ पराचित्-भूमिका में प्रवेश करता है। वहाँ स्वरूपसाक्षात्कार करके 'उन्मीलनसमाधि' के द्वारा अहन्ता में विश्रान्त किये हुए भाववर्ग को बाहिर की ओर वमन करता हुआ फिर भी इदन्ता के क्षेत्र में प्रवेश करता है। इस 'अन्तःप्रवेश' और 'बहिः-निर्गमन' की प्रक्रिया में यह बात विशेष रूप से ध्यान में रखने के योग्य है कि ऐसे पद पर पहुँचे हुए योगी को दोनों ही अवस्थाओं में स्वरूपभूत सामान्यस्पन्दात्मकता का ही विकास अनुभव में आता है।” ३'क्रममुद्रा' शब्द के दो खण्ड हैं—'क्रम' और 'मुद्रा'। इनमें से 'क्रम' शब्द से संवित् रूप में ही सृष्टि, स्थिति और संहार के क्रम का और 'मुद्रा' शब्द से मुद्रित करने का अर्थात् स्वरूप में ही विश्रान्त करने का अभिप्राय लिया जाता है। फलतः 'क्रममुद्रा' स्वतः तुरीयारूपा होने के कारण, प्रत्येक प्रकार के क्रम को, ग्रास करने के क्रम से स्वरूप में ही विश्रान्त कर लेती है। इसके अतिरिक्त 'क्रममुद्रा' शब्द से यह अभिप्राय भी लिया जाता है कि यह एक नित्य-उदित समाधि की दशा होने के कारण अन्तःरूप में या बाह्यरूप में समानरूप से आनन्द का वितरण करती है, अख्याति के द्वारा उत्पादित पाशों को काट लेती है और सारे बाह्य-अवभास को आभ्यन्तर तुरीयासत्ता में मुद्रित कर लेती है। प्रस्तुत सूत्र में इसी योग-भूमिका को 'स्मयमानः' शब्द के द्वारा अभिव्यक्त किया गया है ॥१९॥ [ अभावब्रह्मवाद, सर्वशून्यत्ववाद की निःसारता ] शैव दर्शन के अनुसार सामान्य-स्पन्दमयी शाक्त-भूमिका पूर्णज्ञातृत्व और पूर्णकर्तृत्वरूप चैतन्य की भूमिका है। इसके प्रतिकूल अभावब्रह्मवादी श्रुत्यन्तविदों और लगभग उनके ही समकक्ष सिद्धान्त का अनुसरण करने वाले शून्यवादी माध्यमिकों की मान्यता के अनुसार स्व- १. आसादितसमावेशो योगिवरो व्युत्थानेऽपि समाधिरससंस्कारेण क्षीब इव सानन्दं घूर्ण- मानो भावराशिं शरदभ्रलवम् इव लीयमानं पश्यन्, भूयो भूयः अन्तर्मुखतामेव समवल- म्बमानो निमीलनसमाधिक्रमेण चिदैक्यमेव विमृशन् व्युत्थानाभिमतावसरेऽपि समाध्येकरस एव भवति । (प्र० हृ० सू०, १९) २. द्रष्टव्य, प्रत्यभिज्ञाहृदय सूत्र १९ की टीका । ३. अत्रायमर्थः सृष्टि-स्थिति-संहारादिसंविच्चक्रविकासरूपं क्रमं मुद्रयति, स्वाधिष्ठितम् आत्मसात् करोति येयं तुरीया चितिशक्तिः...................................। (प्र० हृ० सू०, १९)