स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)
Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary
by महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट
Source: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (origin)
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Read in context७६ स्पन्दकारिका शून्यवादी बौद्धों ने प्रसिद्ध माध्यमिक आचार्य नागार्जुन की यह उक्ति— सर्वलम्बनधर्मैश्च सर्वतत्त्वैरशेषतः । सर्वक्लेशाशयैः शून्यं न शून्यं परमार्थतः ॥ प्रस्तुत करके इस बात का दावा किया है कि हमारे शून्य से ऐसी किसी दशा का अभिप्राय नहीं जिसको अन्य दार्शनिकों ने सर्वाभाव का नाम देकर कटु आलोचना का विषय बनाया है। वास्तव में हमारे शून्य से एक ऐसे निरपेक्ष परम-तत्त्व का अभिप्राय है जिसमें कल्पित आलम्बनधर्मों, सम्पूर्ण तत्त्वों और सारी क्लेशात्मक वासनाओं की शून्यता हो। वास्तव में उस शून्यतत्त्व का स्वरूप सर्वाभाव नहीं है। वह शून्यतत्त्व एक ऐसी अवस्था है जो १चतुष्कोटियों की अविषय, मन और वाणी से अगोचर और अनिर्वचनीय है। इस विषय में यह बात विचारणीय है कि यदि नागार्जुन की उक्ति के अनुसार 'शून्य' में केवल कल्पित ग्राह्य, ग्राहक आदि भावों की ही शून्यता है और ज्ञानरूपता की स्थिरता अटल रहती है तो फिर शून्यवाद में, बौद्धों की दूसरी शाखा २विज्ञानवाद के सिद्धान्त से बढ़कर और कौन सी नई बात कही गई है ? विज्ञानवादियों का मन्तव्य भी यही है कि यह ३सारा कल्पित जगत्-प्रपञ्च, वास्तव में, अन्तःकरणों का धर्म बने हुए ज्ञान, जिसको उनकी शब्दावली में 'विज्ञप्ति' कहते हैं, का विकासमात्र है। यह ज्ञान ही विचित्र रूपों को अवभा- सित करने वाला है परन्तु स्वयं, कल्पित तत्त्वादि का रूप धारण नहीं करता है। यह चेतन- क्रिया के साथ सम्बन्धित होने के कारण 'चित्त' कहलाता है और यही एक पारमार्थिक सत्य है। इससे यह बात स्पष्ट हो जाती है कि शून्यवादियों के 'शून्य' और विज्ञानवादियों के 'चित्त' में शाब्दिक भेद के अतिरिक्त कोई सैद्धान्तिक भेद नहीं है। जहाँ तक शैवों का सम्बन्ध है वे तो ज्ञान को चित्तरूप या अन्तःकरणरूप मानने के पक्ष में नहीं हैं। अन्तःकरण इन्द्रिय होने के कारण स्वतः जड़ हैं। ज्ञान सर्वस्वतन्त्र और चैतन्य होने के कारण उनका धर्म कैसे बन सकता है ? 'शून्य' की कल्पना के विषय में भी शैवों का दृष्टिकोण अन्य दार्शनिकों से नितरां भिन्न है। इनके कथनानुसार 'शून्य' शब्द से वास्तव में ४अशून्य अर्थात् चिदानन्दघन और १. द्रष्टव्य, भारतीय दर्शन, बलदेव उपाध्याय, पृष्ठ १५४-६२ । २. अथ 'सर्वलम्बनधमैश्च....................' इत्याद्युक्तयुक्त्या ग्राह्यग्राहकभावादिना कल्पितेन रूपेण शून्यं न तु संविदापि इति चेत्, एवं ह्युच्यमाने विज्ञानवादे एवाभ्युपगमः स्यात्' । (तं० वि०. १.३३) ३. इत्यन्तःकरणस्यैव विचित्रात्मावभासिनः । अविभाविततत्त्वस्य विस्फूर्जितमिदं जगत् ॥ (तं० १.३३ में उदाहृत) ४. अशून्यं शून्यमित्युक्तं शून्यं चाभाव उच्यते । अभावः स समुद्दिष्टो यत्र भावाः क्षयं गताः । सत्तामात्रं परं शान्तं तत्पदं किमपि स्थितम् ॥ (स्व० तं० ४.२९२-९३)