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स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary

by महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट

Source: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished190 pages

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स्मर्यमाणता की असंगति ७७ सतत स्फुरणशील परमशिवतत्त्व ही अभिप्रेत है। उसको 'शून्य' की संज्ञा इसलिये दी गई है वह विश्वोत्तीर्ण रूप में, १माया का अविषय होने के कारण, उससे (माया से) जनित परिणामित्व इत्यादि धर्मों से शून्य है। उस तत्त्व का यह 'शून्य' अर्थात् विश्वोत्तीर्ण रूप ही कुछ ऐसा है जिसमें यह सारा इदंवाच्य प्रमेयमण्डल, उसी रूप में विश्रान्त होकर, अभिन्न 'अहं-रूप' में ही अवस्थित है। विश्वोत्तीर्ण दशा में इस नामरूपात्मक प्रमेयमण्डल का अलग भाव न होने का नाम ही 'अभाव' है और ऐसे ही अभाव का नाम 'शून्य' है। 'शून्य' ही एक महान् सत्ता है जो कि पूर्णज्ञानक्रियात्मक स्वातन्त्र्य होने के कारण प्रत्येक भाव या अभाव को सत्ता प्रदान कर देती है। इस पद में जिस कारण प्रत्येक प्रकार की भेदकल्पना विश्रान्त होती है उस कारण यह शान्त एवं अनिर्वाच्य है। यह शून्यतत्त्व एक अति अद्भुत एवं विलक्षण तत्त्व है क्योंकि वह शून्य होकर भी अशून्य है। इसका अभिप्राय यह कि (शून्यतत्त्व) विश्वोत्तीर्णता के अतिरिक्त, नाद, बिन्दु, भुवन, भाव इत्यादि रूपों में आभासमान विश्वमयता में भी, सुमन में वास की तरह, २व्याप्त होकर अवस्थित है। संक्षेप में कहने का तात्पर्य यह कि शैव आचार्यों के मतानुसार 'शून्य' सर्वाभाव न होकर, पूर्णवेदक अर्थात् स्वतन्त्र ज्ञान-क्रियात्मक प्रमातृसत्ता का अभिव्यञ्जक है। इस सारे पर्यालोचन का निष्कर्ष यही निकलता है कि शैव मान्यता के अनुसार व्युत्थान, समाधि, शून्य, अभाव इत्यादि सारी अवस्थाओं में अनुभवितारूप आत्मा की ज्ञान- क्रियात्मक स्पन्दना में कोई अन्तर नहीं पड़ता है। फलतः सततस्पन्दमयी आत्मसत्ता के प्रत्यभिज्ञान की अवस्था न सर्वाभाव, न सर्वशून्यता और न मूढ़ता की ही अवस्था है ॥१२॥ [स्मर्यमाणता की असंगति] अब सूत्रकार अभावसमाधि को साधारण पशुवर्ग में पाई जाने वाली मोहात्मक सुषुप्ति (प्रगाढ़ निद्रा) जैसी कृत्रिम एवं जड़ता की ही अवस्था सिद्ध करने के अभिप्राय से अलग सूत्र बतला देते हैं— अतस्तत्कृत्रिमं ज्ञेयं सौषुप्तपदवत् सदा । न त्वेवं स्मर्यमाणत्वं तत्तत्त्वं प्रतिपद्यते ॥१३॥ अभावभावनालब्धभूमिकस्यापि कृत्रिमा अनित्या सा अवस्था, यथा, सौषुप्ते पदे, यस्मात् चिद्रूपत्वं तु आत्मनः स्वरूपं नित्यसन्निहितं तदेव गुरूपदेशेन नित्यमेवानुशील- नीयम् ॥१३॥ अनुवाद सूत्र:—उक्त कारणों से वह अभाव समाधि प्रतिसमय (साधारण पशुवर्ग की) सुषुप्ति (तामसिक निद्रा) के समान कृत्रिम ही समझनी चाहिये। वह तत्त्व (स्पन्दतत्त्व = १. यत्तु अस्य शून्यत्वमुक्तं तन्मायाक्षयोपचारेण तद्धर्मैः परिणामित्वादिभिः शून्यत्वाच्छून्यम् । (तं० वि०, १.७६) २. यत्र यत्र च नादादि स्थूला अन्येऽपि संस्थिताः । तत्र तत्र परं शून्यं सर्वं व्याप्य व्यवस्थितम् ॥ (स्व० तं०, ४.२९४)