स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)
Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary
by महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट
Source: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (origin)
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Read in contextसमाधि में मात्र कार्यता का लोप ८१ दिया गया है। आचार्य अभिनवगुप्तपाद ने कहा है कि मौलिक तत्त्व अपने स्वातन्त्र्य से प्रति- समय ^१आवरणरहित अर्थात् वेदक और आवरण-सहित अर्थात् वेद्य के रूप में स्वयं अवभासमान है। वह तत्त्व युगपत् ही कर्तृता की अवस्था और कार्यता की अवस्था भी है पहले रूप में अपरिणामी, अविचल और अनश्वर और दूसरे रूप में परिणामी, चल और नश्वर। अनुभवी शैवगुरुओं ने तुरीयारूप शाक्तभूमिका का यथार्थ अनुभव प्राप्त करके इस बात को स्पष्ट किया है कि शाक्त के 'कर्तृत्व' अंश में, किसी भी दशा में, कोई परिवर्तन नहीं होता है। वेदकता का भाव, शाश्वतरूप में, अटल एवं अक्षुण्ण है क्योंकि यही शक्ति का वास्त- विक रूप है। 'कार्यता' अंश में देश, काल एवं आकार के भेद के अनुसार उतार-चढ़ाव अथवा उदय एवं अस्त होते ही रहते हैं। समाधि की अवस्था में कार्यता का क्षय हो जाता है। इसका वास्तविक अभिप्राय यह है कि कार्यता संहृत होकर कर्तृता में ही विश्रान्त हो जाती है और वह अपने विशुद्ध ज्ञानक्रियात्मक चित्-रूप में अवभासमान रहती है ॥ १४ ॥ [ समाधि में मात्र कार्यता का लोप ] समाधिकाल में सतत स्पन्दमयी कर्तृता ( वेदकता ) बाह्य प्रमेयवर्ग की ओर उन्मुख न होने के कारण, अपने ही कार्यता अंश को अपने में ही विलीन करके, विशुद्ध चिन्मात्र रूप में अवस्थित रहती है। ऐसी अवस्था में ^२सुप्रबुद्ध योगीजन ही उस चिन्मात्र रूपता को पहचानने में समर्थ होते हैं। अभाव की भावना करने वाले योगी वास्तव में अबुद्ध होते हैं अतः समाधि- काल में कार्यता अंश के विलीन होते ही उनको ऐसा लगता है कि हम अभाव में हो गये। अगले सूत्र में इस रहस्य का उद्घाटन किया जा रहा है :- कार्योन्मुखः प्रयत्नो यः केवलं सोऽत्र लुप्यते । तस्मिँल्लुप्ते विलुप्तोऽस्मीत्यबुधः प्रतिपद्यते ॥ १५ ॥ कार्यसंपादनसामर्थ्यं बाह्यकरणव्यापाररूपं केवलं विलुप्यते, स्थगितेन्द्रियस्य तस्मिन् विलुप्ते सामर्थ्ये 'स्वभावो मे विलुप्त'-इति अबुधो जानाति, न तु भावस्य विनाशोऽस्ति ॥ १५ ॥ अनुवाद सूत्र-( समाधि-काल में ) केवल इतना हो जाता है कि बहिर्मुखीन कार्यता के प्रति उन्मुखता रूप प्रयत्न लुप्त हो जाता है। उसके लुप्त हो जाने पर अबुध योगी को ऐसा लगता है कि-'मैं स्वयं भी लुप्त हो गया हूँ अर्थात् अभाव में ही हो गया हूँ' ॥ १५ ॥ वृत्ति-(समाधि-काल में ) केवल इतना हो जाता है कि कार्य सिद्ध करने का सामर्थ्य, जिसका बाह्य इन्द्रियों का, अपने शब्द स्पर्श इत्यादि विषयों को ग्रहण करने का व्यापार होता है, लुप्त हो जाता है। बाह्य इन्द्रियों के विरत हो जाने की दशा में; विषयों को ग्रहण करने का सामर्थ्य लुप्त हो जाने पर, अबुध योगी ऐसा समझ लेता है कि-'मेरे स्वभाव का ही लोप १. 'निरावरणमाभाति भात्यावृतनिजात्मकः ।' (तं० १.९३) २. आगे, सूत्र १७ की विवृत्ति देख लें। ६