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स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary

by महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट

Source: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished190 pages

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८२ स्पन्दकारिका हो गया है।' परन्तु जो भाव हो अर्थात् जिसकी सत्ता त्रिकालाबाधित हो, उसका विनाश कभी नहीं होता है ।। १५ ।। विवरण पहले भी इस बात पर प्रकाश डाला गया है कि अभाववादी लोग किसी भी पदार्थ की सत्ता के अनस्तित्व को ही वास्तविक यथार्थ मानते हैं। उनके मतानुसार यही सिद्धान्त आत्मसत्ता पर भी लागू हो जाता है। यही कारण है कि वे लोग इसी अनस्तित्व की अवस्था को प्राप्त करने के लिए प्रतिसमम—'मैं नहीं हूँ, मेरा भाव नहीं है'—इस प्रकार की भावना का अभ्यास करते रहते हैं। निरन्तर अभ्यास करते करते कभी ऐसे किसी योगी को, समाधि- काल में, इन्द्रियों का व्यापार विरत हो जाने पर बाह्य विषयों के साथ पूर्णतया सम्बन्धविच्छेद हो जाता है। उसके बाह्य इन्द्रिय वर्ग में अपने अपने शब्द, स्पर्श आदि विषयों को ग्रहण करने का सामर्थ्य नहीं रहता है क्योंकि उसकी चेतना बहिर्मुखता से निवृत्त होकर अन्तर्मुख होने लगती है। ऐसी दशा में वह अबुध होने के कारण यह समझ लेता है कि 'मैं' अर्थात् मेरी आत्मा अभाव में ही हो गई है।'' कहना न होगा कि समाधि-काल में ऐसी अवस्था का उदय हो जाना केवल साधना की अपरिपक्वता और साधक की अबुधता का परिचायक है। सुप्रबुद्ध योगी ही अपने पुरुषार्थ से इस अवस्था को पार कर के तुरीया-रूप शाक्त-भूमिका का साक्षात्कार करने में समर्थ होते हैं। उनको तो उस भूमिका (तुरीया-भूमिका) पर पहुँच कर अपनी ज्ञानक्रियामयी स्पन्दना का अनुभव हो जाने से पूर्ण वेदकता की अनुभूति हो जाती है। इसमें सद्गुरु की कृपा परम अपेक्षणीय है। इस सम्बन्ध में यह बात ध्यान में रखना परम आवश्यक है कि कार्योन्मुख प्रयत्न के लुप्त होने की दशा में यदि कर्तृत्व अंश का भी सचमुच लोप ही हुआ होता तो उस सर्वाभाव- दशा के साक्षात्कार की अनुभूति किसको होती ? कौन सा तत्त्व एक ओर स्वयं को 'अहं रूप' में सत्ता देकर, परन्तु दूसरी ओर अभाव में लय होकर, ऐसे लयीभवन की अनुभूति को अभि- व्यक्त कर लेता ? फलतः यह एक तथ्य है कि योगी में अथवा सर्वसाधारण जीवधारियों में भी जो यह 'अहं रूप' प्रतीति विद्यमान है वही वेदकता का अंश है। उसी में अनुभव करने की, सोचने की, समझने की अथवा किसी प्रकार की भी अनुभूति को अभिव्यक्त करने की शक्ति है। वही अभाव को भी अभाव के रूप में ( न होने के भावरूप में ) सत्ता देकर उसकी अनु- भूति प्राप्त कर लेता है। उस वेदक अंश का, किसी भी अवस्था में, लोप नहीं होता है अतः अभाववादियों की सर्वाभाव जैसी कपोलकल्पित अवस्था में मूढ़ता के अतिरिक्त और कुछ नहीं है ।। १५ ।। [ आत्मतत्त्व की स्थिरता ] अगले सूत्र में, कर्तृत्व अंश के, किसी भी अवस्था में नष्ट न होने के मौलिक शैवसिद्धान्त की पुष्टि, हेतु के द्वारा की जा रही है— न तु योऽन्तर्मुखो भावः सर्वज्ञत्वगुणास्पदम् । तस्य लोपः कदाचित् स्यादन्यस्यानुपलम्भनात् ॥ १६ ॥