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स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary

by महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट

Source: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished190 pages

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८६ स्पन्दकारिका शङ्का का समाधान नहीं होने पाता है कि क्या प्रबुद्ध योगी की आत्म-अनुभूति का रूप भी, चाहे दो ही अवस्थाओं में सही, ठीक वैसा ही अखण्ड होता है जैसा सुप्रबुद्ध योगी की अनुभूति का होता है ? तात्पर्य यह है कि क्या प्रबुद्ध योगी को भी इन दो अवस्थाओं के आदि, मध्य और अन्त में समानरूप से आत्म-अनुभूति स्थिर रहती है या नहीं ? भट्टकल्लट की वृत्ति के ही आधार पर लिखी हुई श्रीरामकण्ठाचार्य की विवृति में भी इस शङ्का का कोई सन्तोषजनक समाधान नहीं मिलता है । फलतः वास्तविक स्थिति पूर्णरूप से स्पष्ट नहीं होने पाती है । श्रीरामकण्ठाचार्य ने अपनी विवृति में 'तदाद्यन्ते' इस मूलपद का जैसा अर्थ लिखा है वैसे ही अर्थ को आधार मान कर इसका हिन्दी अनुवाद किया गया है । इस स्थल पर आचार्य जी की विवृति को ही हिन्दी अनुवाद का आधार बनाने का कारण यह है कि आचार्य जी ने स्वयं भट्टकल्लट की वृत्ति को ही अपनी विवृति का आधार बनाया है । इस सन्दर्भ में निःसंकोच रूप में इस बात को स्वीकार करना आवश्यक है कि प्रातः- स्मरणीय ईश्वरस्वरूप जी को रामकंठाचार्य के द्वारा प्रस्तुत किया हुआ 'तदाद्यन्ते' शब्द का विश्लेषण मान्य नहीं है । आपने कई बार अपने मौखिक प्रवचनों में इस आध्यात्मिक गुत्थी को, इस मूल शब्द का दूसरी प्रकार से अर्थ लगाकर, सुलझाने की कृपा की है । आपके मन्तव्यानुसार प्रबुद्ध योगी को, सद्गुरु के उपदेश से, स्वप्नपद के अन्त और सुषुप्ति पद के आदि में, अर्थात् स्वप्नपद से सुषुप्तिपद में प्रविष्ट होने के अवसर पर, दोनों पदों के अन्त- रालवर्ती संधिक्षण में स्वभाव की अनुभूति प्राप्त होती है परन्तु वह बिजली की कौंध के समान क्षणपर्यवसायिनी होने के कारण अखण्ड नहीं कही जा सकती है । जब वह, सद्-गुरु के द्वारा बताई गई विधि का अक्षरशः परिपालन करता हुआ, निरन्तर अभ्यास एवं अनुसन्धान के द्वारा, इस तुर्यरूप स्वभाव पर स्थिर रहने की क्षमता प्राप्त कर लेता है, तब वह प्रबुद्ध- भाव से निकल कर सुप्रबुद्ध-भाव में प्रविष्ट हो जाता है और उसकी आत्म-उपलब्धि तीनों पदों के आदि, मध्य और अन्त में समानरूप से स्थिर बनी रहती है । अब रह जाता है प्रश्न सुप्रबुद्ध योगी का । उसके विषय में कुछ कहना चमकते हुए सूर्य को दीये के द्वारा ढूंढने के बराबर है । उसने तो परमेश्वर के अनुग्रह से तुर्यरूप शाक्त- भूमिका (सामान्य-स्पन्दभूमिका) आक्रान्त की हुई होती है और वह साक्षात् शिवभाव पर आरूढ़ सिद्ध होता है । उसमें भेदव्याप्ति के संस्कार भी अवशिष्ट नहीं होते हैं अतः उसकी आत्म-अनुभूति में, कभी भी, कोई उतार-चढ़ाव आने का प्रश्न ही नहीं उठता है । अभी ऊपर कहा गया है कि इस सूत्र में गुरुपदेश के लिये उपयुक्त एवं अधिकारी पात्र का निर्देश व्यंग्यरूप में अन्तर्निहित है । वृत्तिकार ने 'जाग्रत्तूर्यौ त्वागममात्रगम्यौ' इतना कह कर ही उस व्यंग्य का स्पष्टीकरण किया है । इस कथन के अनुसार केवल प्रबुद्ध- भाव पर अवस्थित व्यक्ति ही गुरुपदेश के लिए उपयुक्त पात्र है । इस सम्बन्ध में यहाँ पर प्रबुद्ध, सुप्रबुद्ध इत्यादि भूमिकाओं पर अवस्थित प्रमाताओं की स्वभावगत विशेषताओं पर प्रकाश डालना आवश्यक प्रतीत होता है क्योंकि उससे पाठकों को सूत्र का अर्थ भली-भाँति हृदयङ्गम करने में सहायता मिलने की आशा है ।