स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)
Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary
by महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट
Source: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (origin)
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Read in contextप्रबुद्ध और सुप्रबुद्ध की अनुभूति ८७ शास्त्रकारों ने, आध्यात्मिक संदर्भ में, संसार के प्रमातृवर्ग को १अबुद्ध, बुद्ध, प्रबुद्ध और सुप्रबुद्ध इन चार भेदों में विभक्त किया है । तंत्रग्रन्थों में इन चार प्रकार के प्रमाताओं की स्वरूपगत विशेषताओं का जो उल्लेख किया गया है उसका संक्षिप्त आशय इस प्रकार है— अबुद्ध-प्रमातृवर्ग—इस २वर्ग में ऐसे प्रमाताओं को रखा गया है जो पारमेश्वरी तिरोधानात्मिका शक्ति के द्वारा संहार की अवस्था में धकेले गये होते हैं । वे इस संहार की अवधि में मायारूपी कालरात्रि अथवा दूसरे शब्दों में गुणत्रय की साम्यावस्था के गर्भ में; प्रगाढ अंधकार से परिपूर्ण गहन गुफाओं में गहरी नींद में पड़े हुए अजगरों की तरह, निःसंज्ञ बनकर पड़े रहते हैं । इस वेला में उनकी चेतना पर स्वात्म-अख्याति का इतना दुर्भेद्य आवरण छाया रहता है कि उनको अपने सद्भाव या असद्भाव की चेतना नहीं रहती है और परिणाम- स्वरूप वे शब्दादि विषयों को ग्रहण करने में सर्वथा असमर्थ होते हैं । तावत्कालपर्यन्त उनको सुख, दुःख इत्यादि की भी कोई अनुभूति नहीं रहती है । यही कारण है कि ऐसे प्रमातृवर्ग को अबुद्ध की संज्ञा दी गई है । इस सम्बन्ध में यह बात भी ध्यान में रखने के योग्य है कि संहृत होने के समय ऐसे प्रमाताओं के संचित-कर्म भी संहृत होकर तावत्कालपर्यन्त वासना अथवा संस्कारों के रूप में उनके साथ ही प्रसुप्त अवस्था में पड़े रहते हैं । बुद्ध प्रमातृवर्ग—३इन संहारावस्था में पड़े हुए प्रमाताओं में से किन्हीं के कर्मपरिपाक का समय आने पर, भगवान् अनन्त-भट्टारक४ अपनी इच्छा शक्ति से उनको पूर्वसंचित कर्मों के अनुसार योनियों में धकेल कर, उनके फलों का भोग करने की ओर प्रवृत्त करते हैं । उस समय भगवान् कलातत्त्व के द्वारा उनमें पुनः अंशतः चेतना का संचार कर लेते हैं और वे प्राकृतिक प्रतिविधान के अनुसार, स्थूल शरीरों को धारण करके विचित्र योनियों में भटकते रहते हैं । ऐसे ही प्रमाताओं को दूसरे शब्दों में संसारी जीव या पशु कहा जाता है । विषय- पिपासा को विषयोपयोग के द्वारा शान्त करना ही उनका मात्र कर्तव्य बन जाता है । फल यह निकलता है कि वे प्रति-समय पारमेश्वरी निग्रहशक्ति के घोरतर प्रभाव में पड़कर, कामिनी- काञ्चन को ही सर्वोत्कृष्ट एवं उपादेय फल समझते हुए, कभी भी आत्म-चिन्तन की ओर १. चतुर्विधं तु पिण्डस्थमबुद्धं बुद्धमेव च । प्रबुद्धं सुप्रबुद्धं च•••• •••• •••• •••• ॥ (मा० वि०, २.४३) २. द्रष्टव्य—स्वच्छन्दतन्त्र, ११. ९१-९५ ३. द्रष्टव्य—स्वच्छन्दतन्त्र, ११. ९६-११२ ४. शैव सिद्धान्त के अनुसार शुद्धाध्व में भगवान् शिव भेदरहित शिवरूप में ही सृष्टि-संहार आदि करते रहते हैं । अशुद्धाध्व में अर्थात् मायातत्त्व से लेकर पृथिवी तत्त्व तक के विश्व में, स्वयं भी भेदव्याप्ति को अपना कर ही, सृष्टि संहार आदि करते हैं । उनके इस रूप का नाम अनन्त-भट्टारक है ।