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स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary

by महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट

Source: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished190 pages

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८८ स्पन्दकारिका प्रवृत्त नहीं होते हैं। कामिनी-कांचन को ही जीवन का चरम लक्ष्य समझने के कारण उनको 'बुद्ध' कहा जाता है। प्रबुद्ध प्रमातृत्वं—१भगवान् परम कारुणिक हैं अतः उनके शक्तिपात से किसी समय किसी प्रमाता में अकस्मात् ऐसी योग्यता उभर आती है कि उसके अंतर-तम में दिव्य शाङ्कर- भक्ति की किरण स्वयं फूट पड़ती है। इसके फलस्वरूप सर्वप्रथम उसके हृदय में सांसारिक विषयों के प्रति अरुचि उत्पन्न हो जाती है। उसके सद्-ज्ञान पर छाया हुआ मायीय आवरण हटने लगता है और वह संसार के सारे कृत्रिम सम्बन्धों को इन्द्रजाल के समान अनुभव करने लगता है। गुरु कृपा से वह आत्म अनुसंधान करने की ओर प्रवृत्त हो जाता है। जब उसकी आत्मजिज्ञासा तीव्रतर रूप धारण करती है तब भगवान् चन्द्रमौलि स्वयं ही गुरु का रूप धारण करके, उसको शाङ्कर-मार्ग में दीक्षित कर देते हैं और वह प्रबुद्ध-भाव की अवर भूमिका से निकलकर सुप्रबुद्ध-भाव की उच्चतर भूमिका में प्रविष्ट होकर कृतार्थ हो जाता है। ऐसे प्रमाता को शैव शब्दों में प्रबुद्ध-प्रमाता कहते हैं। सुप्रबुद्ध प्रमातृत्वं—२प्रबुद्ध-प्रमाता ही, अनथक प्रयत्न। और निश्चल एवं पवित्र भक्ति के द्वारा प्रसन्न किये हुए, शङ्कर-स्वरूप गुरु से शैवी दीक्षा प्राप्त करके, योगमार्ग पर अग्रसर होता हुआ सुप्रबुद्ध अवस्था में प्रविष्ट हो जाता है। उसको उत्कृष्ट एवं अवर्णनीय तुर्यरूप शाक्त-भूमिका की अखण्ड अनुभूति प्राप्त हो जाती है। ऐसा प्रमाता, भगवान् के तीव्रतम शक्तिपात के प्रभाव से एक ऐसी भूमिका पर पहुँचा हुआ होता है जो वर्ण, पद, मन्त्र, कला, तत्त्व और भुवन इन छः मार्गों से अतिगत होने के कारण पूर्णतया विरज, विमल और शान्त है। संक्षेप में केवल इतना ही कहना पर्याप्त है कि सुप्रबुद्ध योगी साक्षात् शिवभाव पर पहुँचा हुआ प्रमाता होता है अतः उसको प्रत्येक अवस्था में, प्रतिसमय और प्रत्येक दिशा में आनन्द रस से परिपूर्ण मात्र शिवभाव की अनुभूति त्रिकालाबाधित रूप में होती है। इतनी बातें समझने के अनन्तर पाठक स्वयं इस निष्कर्ष पर पहुँच जाता है कि प्रबुद्ध योगी ही गुरुपदेश के लिये उपयुक्त पात्र है। अबुद्ध तथा बुद्ध प्रमाता उपदेश के पात्र ही नहीं होते क्योंकि वे प्रमाद-मदिरा के नशे में झूमते हुए कभी भी आत्मचिन्तन की ओर प्रवृत्त ही नहीं होते हैं। हाँ यदि उनमें से स्वयं ही भगवान् किसी को उभारना चाहें तो वह बात दूसरी है। सुप्रबुद्ध योगी को उपदेश देने की आवश्यकता ही नहीं हैं क्योंकि साक्षात् शिवभाव पर अवस्थित व्यक्ति को उपदेश देने का प्रयोजन ही क्या है ? ॥१७॥ [अवस्था भेदों में स्वरूप की अभेद अवस्था] अगले सूत्र में इस रहस्य को अनावृत किया जा रहा है कि अनुभूति के दृष्टिकोण से जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति और तुर्य अवस्थाओं में स्वभाव की उपलब्धि किन किन रूपों में होती है :— १. द्रष्टव्य—मा० वि०, १. ४२-४५, तथा स्व० तं०, ११. ११३-१२० २. द्रष्टव्य—मा० वि०, १. ४६-४७, तथा स्व० तं०, ११. १२१-१३५