श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
by भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य)
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Read in context३ कोई अधिकार नहीं है । यदि कोई भी बात वेदों में प्रत्यक्ष या अनुमान प्रमाण के विपरीत प्रतीत होती है तो उसमें मनुष्य की समझ की ही कमी है उनकी कोई त्रुटि नहीं है । उन समस्याओं को मीमांसा शास्त्र ने सुलझाया है । वेदों में प्रतीत होने वाले विरोधाभास का वास्तविक अभिप्राय मीमांसा शास्त्र से ही ज्ञात होता है, हमें अपने भ्रम की निवृत्ति के लिए इसी के सहारे की आवश्यकता है । वेद के अन्तिम भाग उपनिषद् ही वेदान्त नाम से प्रसिद्ध हैं वे भी वैसे ही प्रमाण हैं । वेदान्त वाक्यों में तीन पदार्थों का स्पष्टतया उल्लेख है, जड पदार्थ अथवा जड़ प्रकृति जिसे प्रधान प्रकृति, माया या अविद्या कहते हैं । दूसरा चेतन आत्मा जो कि अणु प्रमाण है । तीसरा ईश्वर जो कि विभु और सर्वनियन्ता हैं तथा सत्य ज्ञान आनन्द आदि कल्याण गुणों से विशिष्ट है । ब्रह्म में ये तीनों पदार्थ एक साथ रहते हैं । प्रत्येक शरीर में हम देखते हैं कि उसमें रहने वाला एक चेतन आत्मा होता है ठीक उसी प्रकार ईश्वर आत्मा तथा ईश्वर और जड पदार्थ का भी संबंध है । ब्रह्म और ईश्वर एक ही है । उक्त तीन पदार्थों की समष्टि का नाम ही ब्रह्म का अद्वैत है । संसार में स्थावर और जंगम दो प्रकार के जीव हैं । जंगम जीव अधिक प्राण शक्ति समन्वित हैं, स्थावर जीवों में प्राण शक्ति कम होती है । प्रत्येक सत् वस्तु उपर्युक्त त्रैत में ही है । कोई भी जड पदार्थ आत्मा और ईश्वर बिना नहीं रह सकता । कोई भी आत्मा प्रकृति और ईश्वर के बिना नहीं रह सकता तथा ईश्वर भी प्रकृति और आत्मा के बिना नहीं रह सकता । उदाहरण के लिए मनुष्य ही को लें मनुष्य का अर्थ आपाततः शरीर ही होता है, अधिक विचार करने पर अर्थ होता है शरीर में रहने वाला आत्मा, वेदान्त का कथन है कि आत्मा जैसे शरीर का संचालन करता है वैसे ही ईश्वर आत्मा का नियन्त्रण करता है अतः ईश्वर प्रत्येक पदार्थ का अन्तर्यामी आत्मा है । इससे निश्चित होता है कि शरीर तथा शरीर को धारण पोषण करने वाला चैतन्य आत्मा तथा उस आत्मा को भी धारण पोषण और नियन्त्रण करने वाला ईश्वर, इन तीनों की समष्टि ही यथार्थ अद्वैत है । इस वेदान्त सिद्धान्त से परिणामवाद ही प्रमाणित होता है विवर्तवाद नहीं अर्थात् कारण ही कार्य बन जाता है । जैसे कि घट की कारण मृत्तिका और घट एक ही वस्तु है वैसे ही ब्रह्म और जगत भी एक है । कारण के गुण ही कार्य के गुण हैं । यदि हमें इस संसार रूप कार्य में तीन पदार्थ दृष्टिगोचर होते हैं तो इसके कारण में भी तीनों का होना आवश्यक है । जब वेद कहते हैं कि ब्रह्म जगत के कारण हैं तो यह निश्चित हो जाता है कि एक में तीन छिपे हैं और वे ही एक के अन्तर्गत तीन के रूप में प्रकट होते हैं । परिणामवाद वेद सम्मत है जैसे ankurnagpal108@gmail.com