BharatKosha
Back to the archive

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

by भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य)

DevanagariHindipublished696 pages

प्रारंभिक पृष्ठ एवं विशिष्टाद्वैत मंगलाचरण

Page 1Permalink

जगद्गुरु श्री रामानुजाचार्य कृत श्रीभाष्य प्रथम खंड THE ACADEMY OF SANSKRIT RESEARCH MELKOTE - 571 431. (KARNATAKA STATE) प्रस्तोता आचार्य श्री ललितकृष्ण गोस्वामी श्री निम्बार्काचार्य पीठ १२, महाजनी टोला प्रयाग ankurnagpal108@gmail.com

Page 2Permalink

मुनिलाल, प्रकाशन अधिकारी श्री निम्बार्क पीठ १२ महाजनी टोला, प्रयाग मूल्य : इक्यावन रुपये मात्र 51-00 6847 मुद्रक ईश्वर शरण आश्रम मुद्रणालय, इलाहाबाद ankurnagpal108@gmail.com

Page 3Permalink

प्रकाशकीयः भगवान श्री रामानुजाचार्य कृत श्री भाष्य की सानुवाद प्रस्तुति से हमें अपार हर्ष है। पूज्य चरण स्वामी ललित कृष्ण जी महाराज ने बड़ी निष्ठा और लगन के साथ प्रसिद्ध चारो वैष्णव सम्प्रदाय के भाष्यों की व्याख्या सरल सुगम मार्मिक भाषा में प्रस्तुत की है। सं० २०२० में श्री निम्बार्काचार्य चरण प्रणीत वेदान्त पारिजात सौरभ और वेदान्त कामधेनु को हम सानुवाद, वृहद भूमिका सहित प्रकाशित कर चुके हैं, जो कि प्रादेशिक सरकार द्वारा पुरस्कृत भी है, उसका नव संस्करण तथा मध्व और वल्लभ संप्रदाय के पूर्णप्रज्ञ और अणुभाष्य भी हम इसके साथ प्रकाशित कर रहे हैं। समस्त वैष्ण समाज निश्चित ही इससे लाभान्वित होगा। इस ग्रन्थ के प्रकाशन में आदरणीय पं० भगवानदत्त जी जोशी, श्रीमान नृसिंह दास जी बाँगर, बैकुण्ठवासी श्रीमान गजाधर जी सोमाणी, श्रीमान जयदयाल जी डालमिया, श्रीमान गंगाधर जी डालमिया आदि महानुभावों की सदभावना और आर्थिक सहयोग प्राप्त हुआ है इसके लिए हम अत्यन्त आभारी हैं। कल्याण के सम्पादक पूज्य चिम्मन लाल जी गोस्वामी की आज्ञा से गीता प्रेस के प्रबन्धकों ने आचार्य चरण के चित्रपट भेजे हैं उसके लिये हम गोस्वामी जी को साभार नमन करते हैं। श्री सम्प्रदाय के आचार्यों, विद्वानों और वैष्णवों का भी इस ग्रन्थ के प्रकाशन में हमें पूर्ण सौहार्द प्राप्त हुआ है इस ग्रन्थ की गरिमा जगत् प्रसिद्ध है, इसके संबंध में कुछ लिखना मुझ जैसे व्यक्ति के लिए असंभव है। विज्ञजन इसे अपनाकर हमें कृतार्थ करेंगे। मकरसंक्रान्ति, २०३० मुनि लाल (भगवानदास मुन्नीलाल, बाँदा, उत्तर प्रदेश) ankurnagpal108@gmail.com

Page 4Permalink

ग्रन्थकार परिचिति : श्री माधवाङ्घ्रि जलजद्वय नित्यसेवा प्रेमाविलाशय पराङ्कुश पादभक्तम् । कामादिदोषहरमात्मपदाश्रितानां रामानुजं यतिपतिं प्रणमामि मूर्ध्ना ॥ सर्वत्र पूर्ण रूप से व्याप्त, तीनो कालो में विद्यमान तथा सब प्राणियो और पदार्थों के स्वरूपभूत ब्रह्म को जो महापुरुष पवित्र, एकाग्र वेदान्त संस्कार युक्त अन्त.करण से अभेद भाव से स्पष्ट अनुभव करते है वे महापुरुष ब्रह्म वेत्ता कहे जाते है । ऐसे ब्रह्मविद् महापुरुषो का अवतार इस पवित्र देव भूमि भारत में समय समय पर होता रहता हे श्री रामानुजाचार्य इसी श्रेणी के अन्यतम महा- पुरुष है । विक्रम संवत् १०७४ मे दक्षिण भारत में भूतपुरी वर्तमान पेरम्बुदूरम स्थान पर श्री केशव जी सोमयाजी के घर माता कान्तिमती जी के गर्भ से मेष राशि के सूर्य और आर्द्रा नक्षत्र मे आचार्य चरण का प्रादुर्भाव हुआ । प्रसिद्धि हे कि ससाराग्नि से प्रदीप्त जीवों के उद्धार के लिए भगवान विष्णु की आज्ञा से शेष जी ने ही आचार्य रूप से अवतार धारण किया था पिता की आज्ञा से यज्ञो- पवीत के बाद आप कांची मे यादव प्रकाश जी के पास विद्याध्ययन के लिए गए, आचार्य की कुशाग्र बुद्धि और शास्त्र विवेचन की अद्भुत शैली से यादव प्रकाश जी को अमर्ष होना स्वाभाविक था । आगे चल कर उसने वैमनस्य का रूप धारण किया । यादव प्रकाश जी ने आचार्य की हत्या करने का प्रयास किया, अन्तत' श्री रामानुज गुरुकुल मे अधिक दिन नही ठहर सके । अल्पवय में ही माता की आज्ञा से इन्होने विवाह किया, किन्तु इनका गार्हस्थ्य जीवन भी कलहपूर्ण रहा । कटु- भाषिणी स्त्री के दुर्व्यवहार से खिन्न होकर आचार्य ने त्रिदण्ड सन्यास ग्रहण कर अपने को वैष्णव धर्म के प्रचार मे पूर्णतः अर्पित कर दिया । उन्ही दिनो श्रीरगम् में श्री यामुनाचार्य जी वैष्णव धर्म के प्रचार कार्य मे लगे हुए थे, उन्होंने आचार्य रामानुज की प्रशस्ति श्रवण की और अपने शिष्य महापूर्ण स्वामी को आचार्य को कांची से लिवा लाने के लिए भेजा, आचार्य भी श्री यामुनाचार्य जी से मिलने के लिए बहुत दिनो से उत्सुक थे, वे जब तक श्री रंगम पधारे तब तक दुर्भाग्य से यामुनाचार्य जी का परलोक हो गया अतः आचार्य ने महापूर्ण स्वामी से ही दीक्षा ग्रहण की । आचार्य की सन्यास दीक्षा गोष्ठीपूर्णस्वामी द्वारा हुई । यामुनाचार्य जी ने ब्रह्मसूत्र भाष्य की रचना, दिल्ली के तत्कालीन शासको के महल से भगवान श्रीराम के श्री विग्रह का उद्धार और विशिष्टाद्वैत सिद्धान्त का प्रचार करने की प्रबल कामना की थी, आचार्य रामानुज ने इन तीनो को पूर्ण किया । भाष्य रचना के लिए वे अपने अभिन्न सहयोगी कुरेश स्वामी को लेकर काश्मीर पधारे, वहाँ उन्होने सरस्वती पीठ मे बोधायन वृत्ति देखी, कुरेश स्वामी ने प्रायः सम्पूर्ण ग्रन्थ को कठस्थ कर लिया, उसी के आधार पर आचार्य ने ब्रह्म सूत्र भाष्य की रचना की जो कि श्रीभाष्य के नाम से प्रसिद्ध हुआ, जिसे आज आपके समक्ष लोक भाषा विवर्त्त के साथ प्रस्तुत किया जा रहा है । दिल्ली के शासकों से श्रीराम के श्रीविग्रह को सम्पत् कुमार कह कर आचार्य जी ने ग्रहण किया । आचर्य को एक हयग्रीव का विग्रह कश्मीर में भी प्राप्त हुआ था जिसकी आराधना से ही आचार्य को वाग्वैभव प्राप्त हुआ । आजकल यह विग्रह, मैसूर के परकाल मठ मे विराजमान है । ankurnagpal108@gmail.com

Page 6Permalink

स्वामी ललित कृष्ण जी महाराज ankurnagpal108@gmail.com

Page 7Permalink

श्री यामुनाचार्य को वैष्णव धर्म के प्रचार कार्य में सबसे बड़ी कठिनाई चोल देश के राजा कुलोत्तुङ्ग शैव की कट्टरता और बर्बरता थी, इसीलिए उन्हें श्रीरामानुज के सहयोग की अपेक्षा थी । आचार्य ने बड़े संघर्ष और धैर्य से उस बर्बर शासक का सामना किया । उसने श्री रामानुज को शासकीय अधिकार से दरबार मे बुलाकर समाप्त करने का ही निश्चय कर लिया, किन्तु कूरेश स्वामी ने आचार्य को चुपचाप ममूर रवाना कर दिया और स्वयं दरबार में उपस्थित हो गए । उस क्रूर धर्मान्ध शासक ने कूरेश स्वामी की आँखें निकलवाली थीं । यह भारत के सांस्कृतिक समाज की लज्जास्पद घटना है जिसे वैष्णव समाज आज तक नहीं भुला पाता । अभी भी वैष्णवों का अन्तःकरण उक्त संकीर्ण विचार वाले उपासकों के प्रति क्षुब्ध है । आचार्य ने मैसूर के राजा विट्तिदेव को प्रभावित कर वैष्णव सम्प्रदाय में दीक्षित किया और उसके सहयोग से अपनी अभीष्ट सिद्धि की । १११८ ई० में कुलतुङ्ग की मृत्यु हो जाने के बाद आचार्य पुनः श्री रंगम आ सके, वहाँ उन्होंने आलवार सन्त की मूर्तियों की स्थापना की । आचार्य के बढ़ते हुए प्रभाव से श्री रङ्गम के अर्चक भी आचार्य श्री से ईर्ष्या करते थे, एकवार उन्होंने आचार्य को समाप्त करने की भी योजना बनाई किन्तु अर्चक की पत्नी ने जो कि आचार्य की लीला से अभिभूत थीं आचार्य को आगाह कर दिया जिससे उनका षड़यंत्र विफल हो गया । आचार्य ने तिरुपति में गोविन्द राज की मूर्ति की स्थापना की । आचार्य चरण ने ७४ शिष्य बनाए । आचार्य श्री का जीवन अत्यन्त संघर्षमय था, दक्षिण भारत के प्रचलित शैव सम्प्रदाय से ही आचार्य को संघर्ष नहीं करना पड़ा अपितु पूर्व प्रचलित अन्यान्य वैष्णव मतावलम्बियों से भी उनका संघर्ष हुआ । जिसका आजतक अंशतः प्रभाव चला आ रहा है । आचार्य श्री रामानुज का सा संघर्षमय जीवन किन्हीं भी अन्य का नहीं था आचार्य श्री ने जो कार्य किया है वह वैष्णव सम्प्रदाय के ऐतिह्य में चिरस्मरणीय रहेगा, इनकी असीम कृपा से श्री वैष्णव सम्प्रदाय उपकृत है, अन्यथा दक्षिण भारत तो वैष्णवता विहीन हो जाता । प्रयागस्थ श्री निम्बार्काचार्य पीठाधीश, जगद्गुरु स्वामी श्री राधाकृष्ण जी महाराज के बालक स्वामी ललित कृष्ण जी ने श्री भाष्य का हिन्दी रूपान्तर कर वैष्णव समाज के समक्ष श्लाघ्य आदर्श प्रस्तुत किया है । आशा है वैष्णवजन पर- म्परित तथा पारस्परिक कथितभेदभाव को अनादृत कर समादर पूर्वक इसको ग्रहण करेंगे । आचार्य ललित कृष्ण जी ने कई वर्ष पूर्व श्री निम्बार्काचार्य जी के भाष्य वेदान्त पारिजात सौरभ का भी लोकभाषा में रूपान्तर किया है । श्री वल्लभाचार्य के अणुभाष्य तथा श्री मध्वाचार्य के पूर्णप्रज्ञभाष्य के हिन्दी रूपान्तर भी इस भाष्य के साथ प्रकाशित हुए हैं । निश्चित ही समस्त वैष्णव सम्प्रदाय के लिए यह गौरव की बात है, ब्रह्मसूत्र के परम्परित वैष्णव भाष्यों को हिन्दी भाषियों के समक्ष प्रस्तुत कर जो स्तुत्य प्रयास किया है उसके लिए लेखक धन्यवादार्ह हैं । श्री रामानुज जयन्ती, सं० २०३० गतश्रम नारायण मंदिर \hfill रामानुज आचार्य विश्रान्त घाट मथुरा ankurnagpal108@gmail.com

Page 8Permalink

श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमते वेदान्त महादेशिकाय नमः अनन्त श्री जगद्गुरु निम्बार्काचार्य स्वामी श्री राधाकृष्ण र्ज महाराज के बालक स्वामी श्री ललित कृष्ण जी महाराज ने श्री भाष्य का हिन्दी में विवर्त्त (अनुवाद) किया है, हमने इसको देखा है, अनुवाद में मूल का आशय स्पष्ट किया गया है । साम्प्रदायिक अर्थ परम्परा क भंग कहीं भी दृष्टिगत नहीं होता । सनातन भागवत धर्मरूपी एक ही वटवृक्ष की श्री निम्बार्क श्री रामानुज, श्री मध्व, श्री वल्लभ आदि अनेक शाखायें हैं, स. शाखाओं में जो व्यापक भावना है, इस अनुवाद में उसी का दर्शन हो रहा है । अनुवादक ने निम्बार्क सम्प्रदायी होते हुए भी श्री भाष्य क अनुवाद किया हैयह भागवत धर्म की व्यापकता का ही दर्शन है । इस से सब शाखाओं के वैष्णवों को समन्वय भाव का समादर करने की प्रेरण मिलती है । हिन्दी में भगवान श्री रामानुजाचार्य जी के श्री सूक्तिरूप अमृत के पान करने की अभिलाषा रखने वाले जनों को इससे आत्मतृप्ति [L1

Page 9Permalink

प्रस्तावना : नमो नमो वाङ्मनसातिभूमये नमो वाङ्मनसैकभूमये । नमो नमोऽनन्तमहाविभूतये नमो नमोऽनन्तदयैकसिन्धवे ॥ चेतनाचेतन विभागविशिष्ट ब्रह्म के अभेद के प्रतिपादक सिद्धान्त को विशिष्टाद्वैत कहते हैं। श्री यमुनाचार्य ने अपने ग्रन्थों में इसी सिद्धान्त को युक्तियुक्त प्रतिपादन किया है। इसी मत को आचार्य श्री रामानुज ने आगे बढ़ाया किन्तु आचार्य चरण के प्रतिपादन का आधार बोधायन टीका और श्री द्रविडाचार्य के भाष्य थे। वेदान्त सूत्रों के प्रथम भाष्यकार आचार्य द्रविड ही के सर्वमान्य सिद्धान्त को प्रायःस भी परवर्ती आचार्यों ने अपने-अपने दृष्टिकोण से अपनाया है। आचार्य शंकर माण्डूक्योपनिषद् भाष्य में द्रविडाचार्य को 'आगमविद्' तथा वृहदारण्यकोपनिषद् भाष्य मे 'सम्प्रदाय विद्' कहते हैं। जहाँ कहीं भी आचार्य का उल्लेख किया है वहाँ सम्मानपूर्वक ही किया है। श्री यामुनाचार्य ने भी द्रविडाचार्य के भाष्य की महत्ता स्वीकार की है-वे सिद्धित्रय में लिखते हैं कि- "भगवता बादरायणेन इदमर्थमेव सूत्राणि प्रणीतानि विवृतानि च परिमित गम्भीर भाष्यकृता" अर्थात् भाष्यकार आचार्य द्रविड ने जिस परिमित और गम्भीर शैली में वेदान्त सूत्रों का विवरण प्रस्तुत किया है लगता है भगवान बादरायण ने उसी अर्थ में सूत्रों की रचना की है। आचार्य रामानुज भी इस परिमित गम्भीर भाष्य को अपने भाष्य का उपजीव्य बतलाते हुए कहते हैं "पूर्वाचार्याः संचिक्षिपुः तन्मतानुसारेण' इत्यादि आचार्य रामानुज ने अपने भाष्य में यत्रतत्र यथाह द्रविड भाष्यकारः कहकर उनके उपनिषद् भाष्यों के वाक्य भी उद्धृत किये हैं वल्लभ सम्प्रदाय में भी पूर्वाचार्य के रूप में श्री द्रविडाचार्य का स्मरण किया गया है। प्रसिद्ध सभी भाष्यों का आधार श्री द्रविडाचार्य कृत भाष्य ही है। प्रायः सभी आचार्यों ने मीमांसा को पूर्व, उत्तर दो भागों में स्वीकार किया है, किन्तु आचार्य रामानुज, बोधायन टीका के आधार पर "अथातो धर्म जिज्ञासा" से लेकर "अनावृत्तिः शब्दात्" सूत्र तक बीस अध्यायों का एक ही वेदार्थ विचार करने वाला मीमांसा दर्शन मानते है। उनके मत से धर्म मीमांसा, देवमीमांसा और ब्रह्ममीमांसा नामक तीन काण्ड हैं। प्रथम काण्ड जैमिन का रचा हुआ है, जिसमें बारह अध्याय हैं। दूसरा काण्ड-काशकृत्स्नाचार्य-रचित है जिसमें चार-अध्याय हैं। तीसरा काण्ड बादरायणाचार्य रचित है, इसमें भी चार अध्याय है। इस संपूर्ण मीमांसा शास्त्र की वृत्ति बोधनाचार्य ने बनाई थी। ankurnagpal108@gmail.com

Page 10Permalink

२ आचार्य रामानुज ने पूर्व प्रचलित अद्वैतवाद को ही अपने ढंग से प्रस्तुत किया है । ' 'एकमेवाद्वितीयं ब्रह्म" आदि श्रुतिवाक्य ब्रह्म के एकत्व का प्रतिपादन करते हैं। केवलाद्वैतवाद में एकमात्र ब्रह्म की सत्ता ही स्वीकार की गई है, तदभिन्न कुछ भी नहीं है । किन्तु रामानुज जी "बृहबृंहिवृद्धौ' धातु के साथ "मनिन्" प्रत्यय के संयोग से 'ब्रह्म' शब्द की निष्पत्ति करते हैं अतः वे एक में तीन का समावेश मानते हैं । इसके प्रमाण में वे "बृहतिबृंहयति इतितत्परं ब्रह्म" ऐसा रहस्याम्नाय ब्राह्मण का तथा "बृहत्त्वाद् बृंहणत्वाच्च तद् ब्रह्मेत्यभिधीयते" ऐसा विष्णुपुराण का वाक्य प्रस्तुत करते हैं । इन प्रमाणों से स्पष्ट होता है कि ब्रह्म एक है जो स्वयं बृहत होने और दूसरे को बृहत् करने में समर्थ है । ब्रह्म से अन्य पदार्थ भी हैं जो कि उसी के द्वारा बृहत् किए जाते हैं। रामानुजाचार्य जी का अद्वैत, परमात्मा का दो अन्य वस्तुओं से विशिष्ट एकत्व है। इस मत की पुष्टि के लिए आचार्य चरण ने भाष्य में अनेक स्थलों पर अन्तर्यामी ब्राह्मण का यह वाक्य प्रस्तुत किया है— "यस्य पृथिवी शरीरं यं पृथिवी न वेद, यः पृथिवीमन्तरो यमयति यस्यात्मा- शरीरं यमात्मा न वेद य आत्मानमन्तरो यमयति" इत्यादि । इससे स्पष्ट होता है कि परमात्मा, आत्मा और जड़ पदार्थ दोनों में है । वह चिन्मय, आत्मा तथा जड़ प्रकृति से विशिष्ट है । इस प्रकार विशिष्ट ब्रह्म को विशिष्टाद्वैत कहा गया है। इस मान्यता का सबसे बड़ा वैशिष्ट्य यह है कि केवला- द्वैत वाद को जो एकमात्र ब्रह्म को ही सत्य सिद्ध करने के लिए जगत को मिथ्या तथा ब्रह्म में अविद्या की कल्पना करनी पड़ी जिससे कि ब्रह्म अपने में विविध नाम रूपात्मक जगत को देखता है, वह थोथापन नहीं है। विशिष्टाद्वैत में एक ब्रह्म में जो तीन पदार्थों की समिष्ट है उससे उसे अद्वैत के लिए उक्त कल्पना करने की आवश्यकता नहीं पड़ी । इस मत में शास्त्र वाक्यों से निश्चित कर दिया गया है कि विश्व ब्रह्म में लीन है और ईश्वर विश्व में अन्तर्हित, अतः बिना मिथ्या कल्पना के ही ब्रह्म का एकत्व प्रमाणित हो जाता है । आचार्य रामानुज भारतीय परम्परा के अनुरूप ही ब्रह्म को प्रमाणित करने में शब्द अर्थात् वेद को ही एकमात्र प्रमाण स्वीकार करते हैं । क्योंकि वेद सनातन हैं, प्रत्येक कल्प में इनकी उसी पदक्रम से आवृत्ति होती है, इनका कोई रचयिता नहीं है ये अपौरुषेय हैं, अतः मानव के मन बुद्धि में संभावित संशय विपर्यय आदि दोषों की इनमें संभावना नहीं है । ये स्वतः प्रमाण हैं इसलिए इनके स्वरूप के विपरीत किसी को कुछ भी निर्णय देने या किसी अंश को अप्रामाणिक कहने का

Page 11Permalink

३ कोई अधिकार नहीं है । यदि कोई भी बात वेदों में प्रत्यक्ष या अनुमान प्रमाण के विपरीत प्रतीत होती है तो उसमें मनुष्य की समझ की ही कमी है उनकी कोई त्रुटि नहीं है । उन समस्याओं को मीमांसा शास्त्र ने सुलझाया है । वेदों में प्रतीत होने वाले विरोधाभास का वास्तविक अभिप्राय मीमांसा शास्त्र से ही ज्ञात होता है, हमें अपने भ्रम की निवृत्ति के लिए इसी के सहारे की आवश्यकता है । वेद के अन्तिम भाग उपनिषद् ही वेदान्त नाम से प्रसिद्ध हैं वे भी वैसे ही प्रमाण हैं । वेदान्त वाक्यों में तीन पदार्थों का स्पष्टतया उल्लेख है, जड पदार्थ अथवा जड़ प्रकृति जिसे प्रधान प्रकृति, माया या अविद्या कहते हैं । दूसरा चेतन आत्मा जो कि अणु प्रमाण है । तीसरा ईश्वर जो कि विभु और सर्वनियन्ता हैं तथा सत्य ज्ञान आनन्द आदि कल्याण गुणों से विशिष्ट है । ब्रह्म में ये तीनों पदार्थ एक साथ रहते हैं । प्रत्येक शरीर में हम देखते हैं कि उसमें रहने वाला एक चेतन आत्मा होता है ठीक उसी प्रकार ईश्वर आत्मा तथा ईश्वर और जड पदार्थ का भी संबंध है । ब्रह्म और ईश्वर एक ही है । उक्त तीन पदार्थों की समष्टि का नाम ही ब्रह्म का अद्वैत है । संसार में स्थावर और जंगम दो प्रकार के जीव हैं । जंगम जीव अधिक प्राण शक्ति समन्वित हैं, स्थावर जीवों में प्राण शक्ति कम होती है । प्रत्येक सत् वस्तु उपर्युक्त त्रैत में ही है । कोई भी जड पदार्थ आत्मा और ईश्वर बिना नहीं रह सकता । कोई भी आत्मा प्रकृति और ईश्वर के बिना नहीं रह सकता तथा ईश्वर भी प्रकृति और आत्मा के बिना नहीं रह सकता । उदाहरण के लिए मनुष्य ही को लें मनुष्य का अर्थ आपाततः शरीर ही होता है, अधिक विचार करने पर अर्थ होता है शरीर में रहने वाला आत्मा, वेदान्त का कथन है कि आत्मा जैसे शरीर का संचालन करता है वैसे ही ईश्वर आत्मा का नियन्त्रण करता है अतः ईश्वर प्रत्येक पदार्थ का अन्तर्यामी आत्मा है । इससे निश्चित होता है कि शरीर तथा शरीर को धारण पोषण करने वाला चैतन्य आत्मा तथा उस आत्मा को भी धारण पोषण और नियन्त्रण करने वाला ईश्वर, इन तीनों की समष्टि ही यथार्थ अद्वैत है । इस वेदान्त सिद्धान्त से परिणामवाद ही प्रमाणित होता है विवर्तवाद नहीं अर्थात् कारण ही कार्य बन जाता है । जैसे कि घट की कारण मृत्तिका और घट एक ही वस्तु है वैसे ही ब्रह्म और जगत भी एक है । कारण के गुण ही कार्य के गुण हैं । यदि हमें इस संसार रूप कार्य में तीन पदार्थ दृष्टिगोचर होते हैं तो इसके कारण में भी तीनों का होना आवश्यक है । जब वेद कहते हैं कि ब्रह्म जगत के कारण हैं तो यह निश्चित हो जाता है कि एक में तीन छिपे हैं और वे ही एक के अन्तर्गत तीन के रूप में प्रकट होते हैं । परिणामवाद वेद सम्मत है जैसे ankurnagpal108@gmail.com

Page 12Permalink

४ कि- "यथा सोम्येकेन मृत्पिण्डेन विज्ञातेन सर्वं मृन्मयं विज्ञातं भवति" इत्यादि । संसार का कारण संसार के सदृश ही होना चाहिए यह स्वतः सिद्ध है । कारण ब्रह्म और कार्यब्रह्म समान हैं, कारण ही कार्य बन जाता है, अन्तर केवल इतना ही है कि कारण को हम योगजन्य ज्ञान से ही देख सकते हैं जब कि कार्य को इन नेत्रों से ही देखते हैं । कारणरूप ब्रह्म अव्यक्त जड़ प्रकृति अव्यक्त चैतन्य और ईश्वर इन तीनों की समष्टि है । यहाँ अगोचर सूक्ष्म ब्रह्म कार्यरूप स्थूल ब्रह्म बन जाता है । अतः तत्त्वतः कारण और कार्य ब्रह्म में कोई भेद नहीं है । जड़ और चेतन शरीरी ब्रह्म में संसारी पदार्थों की तरह "अस्ति, जायते, वर्द्धते, विपरिणमते, अपक्षीयते, नश्यति" आदि परिवर्तन नहीं होते, श्रुतियों में ब्रह्म को अविकार्य बतलाया गया है । जैसे कि बच्चा जन्म लेकर क्रमशः यौवन प्रौढ़ता और वार्धक्य को प्राप्त होता है किन्तु ये सारी अवस्थायें शरीर की ही होती हे आत्मा की नहीं वैसे ही कारण ब्रह्म जब कार्य रूप में परिणत होता है तो उसमे भी विकार नहीं होता, प्रकृति बदलती है तथा आत्मा का ज्ञानस्वरूप बदल जाता है, यद्यपि वह तत्त्वतः सदा एक सा रहता है । ब्रह्म की विविध नामरूपात्मक जगद् रूप परिणति में जो परिवर्तन होता भी है वह समस्त स्थूल शरीरों में अनुप्रविष्ट होने की इच्छा से होती है अतः उसे किसी भी दृष्टि से विकार नहीं कह सकते । एकता ही ईश्वर का स्वरूप है, जड़ प्रकृति और चेतन आत्मा, उसका शरीर है अतः जगत सत्य है और अद्वैत भी सत्य है । ब्रह्माद्वैत का तात्पर्य है कि इसकी बराबरी का कोई नहीं है । संसार ब्रह्म से ओत-प्रोत है अतः ब्रह्माद्वैत कहने का यह तात्पर्य कदापि नहीं हो सकता कि जगत है ही नहीं । श्रुतियों में इसी लिए अनेक स्थलों पर आत्मा और ब्रह्म की भिन्नता का स्पष्ट उल्लेख है और एकता का भी । केवलाद्वैत मतानुसार अभेद प्रतिपादक श्रुति ही सही और प्रामाणिक है तथा भेद प्रतिपादक श्रुति काल्पनिक और मिथ्या हैं । किन्तु वैष्णव मतावलम्बियों के मत में दोनों ही प्रकार की श्रुतियाँ सही और प्रामाणिक हैं । इनका कथन है कि जैसे मनुष्य को एक कहते हुए भी आत्मा और शरीर के रूप में भिन्न माना जाता है वैसे ही ब्रह्म, जड़ प्रकृति और चेतन आत्मा से भिन्न होते हुए भी एक है । श्रीरामानुज के मत में अभेद प्रतिपादक श्रुति एक में तीन का वर्णन करती है तथा भेद प्रतिपादक श्रुति तीनों का भिन्न-भिन्न वर्णन करती हैं । इस प्रकार दोनों ही प्रामाणिक हैं । इसी प्रकार सगुण और निर्गुण प्रतिपादक श्रुतियों का भी तात्पर्य है देखने में तो ये परस्पर ankurnagpal108@gmail.com

Page 14Permalink

५ ( ब ) पदार्थ ├── प्रमाण │ ├── प्रत्यक्ष │ ├── अनुमान │ └── शब्द └── प्रमेय ├── द्रव्य │ ├── जड़ │ │ ├── प्रकृति │ │ │ └── प्रकृति — महत् — अहंकार — मन — ज्ञानेन्द्रिय — कर्मेन्द्रिय — तन्मात्रा — महाभूत │ │ └── काल │ │ ├── भूत │ │ ├── भविष्य │ │ └── वर्तमान │ └── अजड़ │ ├── पराक् │ │ ├── नित्यविभूति │ │ └── धर्मभूतज्ञान │ └── प्रत्यक् └── अद्रव्य ├── सत्त्व ├── रज ├── तम ├── शब्द ├── स्पर्श ├── रस ├── गंध ├── संयोग └── शक्ति

Page 15Permalink

[जीवात्मा-विभागः]

                     ┌─── बद्ध
                     │
                     ├─── मुक्त
                     │
         ┌── जीवात्मा ┼─── नित्य
         │           │
         │           └─── बद्ध ┬─── बुभुक्षु ┬─── अर्थकामपर
         │                     │             │
         │                     │             └─── धर्मकामपर ┬─── देवतान्तरपर
         │                     │                            │
         │                     │                            └─── भगवत्पर
         │                     │
         │                     └─── मुमुक्षु ┬─── कैवल्यपर
         │                                  │
         │                                  └─── मोक्षपर ┬─── भक्त
         │                                               │
         │                                               └─── प्रपन्न ┬─── एकान्ती
         │                                                            │
         │                                                            └─── परमैकान्ती ┬─── दृप्त
         │                                                                            │
         │                                                                            └─── आर्त

[ईश्वर-विभागः]

                                    ┌─── पर (नारायण) ─── केशवादि
                                    │
                                    ├─── व्यूह ─── वासुदेवादि (वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न-अनिरुद्ध)
                                    │
                         ┌── ईश्वर ┼─── विभव (मत्स्यादि)
                         │         │
                         │         ├─── अन्तर्या
Page 17Permalink

विरुद्ध प्रतीत होता है किन्तु निर्गुणश्रुति का तात्पर्य है कि ब्रह्म में कोई प्राकृत गुण नहीं है सगुण श्रुति में सत्यसंकल्प सत्यकाम आदि उन अलौकिक गुणों का उल्लेख है जो कि एकमात्र परमात्मा में ही है, जीव या जड़ में कदापि संभव नहीं है। श्रुतियों में कहीं-कहीं ऐसा भी उल्लेख है कि ब्रह्म में कोई अवगुण नहीं हैं अपितु अनेक कल्याण गुण हैं। श्रुतियों के उल्लेख निर्विकार आदि शब्द जगत के आदि कारण रूप ब्रह्म के ज्ञापक हैं “जीव ब्रह्म भिन्न है” जीव ब्रह्म एक है 'ब्रह्म निर्गुण है” ब्रह्म सगुण है "इत्यादि वाक्यों का संदर्भानुसार अलग-अलग अभिप्राय है। जहाँ एकता की बात है वहाँ जीव ब्रह्म और जीव प्रकृति में भेद है ये प्रकृति और जीव, ब्रह्म के शरीर से भिन्न कुछ और नहीं है इस कथन में वदतोव्याघात नहीं होता। यही विशिष्टाद्वैत का अभिप्राय है। इस मत के समर्थन में आचार्य रामानुज ने अनेक प्रकार से विचार किया है जो कि संक्षेप में इस प्रकार है । आचार्य के मत में ब्रह्म जिज्ञासा का वही अधिकारी है जिसे कर्म और कर्मफल की अनित्यता का यथोचित ज्ञान हो चुका हो । उसे प्रथम शास्त्र चिन्तन करना होगा तभी उसे कर्मफल की अनित्यता का परिज्ञान हो सकेगा तभी उसे उससे मुक्त होने की अभिलाषा होगी तथा स्थिर फलावाप्ति की इच्छा के फल- स्वरूप ब्रह्म की जिज्ञासा होगी। अविद्या की निवृत्ति ही वास्तविक प्रयोजन है। उपासना द्वारा ब्रह्म साक्षात्कार हो जाने पर ही अज्ञान से छुटकारा संभव है । मुक्त जीव ईश्वर के दास के रूप में ईश्वर की नित्यलीला में अपार आनन्द का उपभोग करता है । ध्यान और उपासना ही मुक्ति के साधन हैं, ज्ञान मुक्ति का साधन नहीं है. ब्रह्मात्मैक्य ज्ञान से अविद्या की निवृत्ति नहीं हो सकती क्योंकि जब बन्धन पारमार्थिक है तब इस प्रकार के ज्ञान से उसकी निवृत्ति कैसे संभव है। वेदन, ध्यान' उपासना आदि शब्द भक्ति के ही सूचक हैं । भक्ति, साधन और फल दो प्रकार की है । जिज्ञास्य ब्रह्म, सगुण और सविशेष हैं उसकी शक्ति माया है । वह अशेष कल्याणकारी गुणों के आलय हैं उनमें हेयता नहीं है । सर्वेश्वरत्व सर्वेशितृत्व सर्वफलप्रदत्व, सर्वाधारत्व, सर्वकार्योत्पादकत्व, समस्तद्रव्य शरीरत्व आदि उनके लक्षण है । चिदचिच्छरीरत्व उनका मुख्य लक्षण है । समस्तचिदचिद् विशेष रूप में वे जगत के उपादान कारण हैं, संकल्प विशिष्ट रूप में निमित्त कारण हैं। भगवान नारायण, सृष्टिकर्त्ता, कर्मफलदाता, नियन्ता और सर्वान्तर्यामी है । पर, व्यूह, विभव अन्तर्यामी और अर्चावतार भेद से वे पाँच प्रकार के

Page 18Permalink

हैं। शंख चक्र गदा पद्मधारी चतुर्भुज, किरीटादि दिव्य आभूषणों से सुज्जित वे श्री, भू, लीला देवी सहित विराजते हैं। मत्स्य, कूर्म, सिंह, वराह, परशुराम श्रीराम, बलभद्र, श्रीकृष्ण, और कल्कि उनके मुख्य अवतार हैं। इनमें भी मुख्य, गौण, पूर्ण, अंश आदि अनेक भेद हैं। भगवदवतार कर्म प्रयोजन से नहीं हो स्वेच्छा से होते हैं। दुष्कृतों का विनाश और साधुओं का परित्राण ही अवतार सबंधिनी इच्छा है। जीव, ब्रह्म के ही समान चेतन है और ब्रह्म का शरीर है, किन्तु ब्रह्म विभु हैं जीव अणु है। ब्रह्म जीव में सजातीय विजातीय भेद नहीं हैं अपितु स्वगत भेद है। ब्रह्म पूर्ण है, जीव खण्डित है, ब्रह्म ईश्वर है, जीव दास है। मुक्त जीव भी ईश्वर का दास है। जीव कार्य है, ईश्वर कारण है, दोनों ही स्वयं प्रकाश, चेतन ज्ञानाश्रय और आत्मस्वरूप हैं। जीव देहेन्द्रिय मन प्राणादि से भिन्न है। जीव नित्य है उसका स्वरूप भी नित्य है। जीव प्रत्येक शरीर में भिन्न है,। स्वाभाविक रूप में सुखी है कि तु उपाधिवश उसे संसार भोग प्राप्त होते हैं। भगवान के दासत्व की प्राप्ति ही जीव की मुक्ति है बैकुण्ठ में श्री, भू लीला सहित नारायण की सेवा करना ही परमपुरुषार्थ है। प्राकृत देह विच्युत हो जाने पर अप्राकृत देह से नारायण के समान भोग प्राप्त करना ही मुक्ति है। ब्रह्म के साथ अभिन्नता प्राप्त करना कदापि संभव नहीं है, क्योंकि जीव स्वरूपतः नित्य, नित्यदास, नित्य अणु है। मुक्त जीव में आठों गुणों का आविर्भाव होता है। भगवान नारायण भूमा हैं उनके श्री चरणों में आत्म-समर्पण करने से ही जीव को वास्तविक शान्ति मिल सकती है। सर्वस्व निवेदन करने से ही प्रभु की कृपा प्राप्त हो सकती है तभी वे जीव का वरण करते हैं (अपनाते हैं) प्रभु के अनुकूल, आचरण करने का संकल्प, प्रतिकूल आचरण का वर्जन तथा सब विधियों का त्याग कर उनकी शरण होना ही समर्पण संन्यास या प्रपत्ति है। ऐसी प्रपत्ति या न्यासविद्या से भगवदावाप्ति होती है। इस समय इस संप्रदाय में बड़गल और तिङ्गल दो मत दृष्टिगत होते हैं जो कि— . वैष्णवों में विवाद रूप से प्रचलित हैं। दोनों ही अपने को प्रथम का हो का दावा करते हे और उस पक्ष में अपने प्रमाण प्रस्तुत करते हैं, किन्तु गने दृष्टि से विचार करने पर और आचार्य चरण के सिद्धान्त का मनन भीर करने पर दोनों ही विचारधाराओ की प्राचीनता सिद्ध हो जाती है, ankurnagpal108@gmail.com

Page 19Permalink

७ आचार्य चरण ने प्रपत्ति भक्ति की महत्ता के साथ पूर्व मीमांसा को भी जब उत्तर मीमांसा का ही अंग माना है तब कर्मकाण्ड की महत्ता भी तो उनको स्वीकृत थी, अतः दोनों ही धारायें प्राचीन हैं यह तो कालान्तर में तिलक धारण आदि कुछ परिवर्त्तनों के साथ दोनों ने अपने को पृथक् करके विवाद प्रारम्भ कर दिया है। सही बात तो यह है कि वैष्णव संप्रदायों की नींव तो रागात्मिका भक्ति ही है उसी पर इनके प्रासाद खड़े हैं, आचार्य श्री रामानुज के प्रथम जितने भी आलवार सन्त हुए वे सभी गाढानुरागी थे आचार्य चरण उनसे पूर्णतः प्रभावित थे। कुमारिल आदि मीमांसकों के मत जब प्रबल हुए तो कर्मकाण्ड की अर्हता भक्तों को स्वीकारनी पड़ी। पंद्रहवीं सोलहवीं शताब्दी में पूरे भारत में सभी वैष्णव संप्रदायों में पुनः उनकी असली प्रकृति उभड़ी और वे सारे के सारे प्रभु चरणों की गाढानुरक्ति में निमग्न हो गए अतः कर्मकाण्ड में शिथिलता आना स्वाभाविक ही था। भक्तिमार्ग तो समन्वयात्मक है उसमें सभी का निर्वाह सदा से होता रहा है इसलिए भगवान ने स्वयं ही श्रीमद्भागवत में उद्धव को उपदेश देते हुए भक्ति मार्ग के इस वैशिष्ट्य का स्पष्ट उल्लेख किया है—“न निर्विण्णः नाऽतिसक्तः भक्तियोगोऽस्य सिद्धिदः” अर्थात् भक्ति योग उसी को लाभदायी होता है जो कि न तो एकदम ही कर्म का त्याग कर देता है और न एकदम ही कर्म में आसक्त हो जाता है। इस भगवदाज्ञा को मानकर पारस्परिक मतभेद को त्यागकर मित्रतापूर्वक प्रभु कृपा प्राप्त करने के लिए प्रयास करना चाहिए, यही भक्ति मार्ग की शोभा है विशिष्टाद्वैत तो माया को भी भगवान का ही अंग मानता है, तभी तो वह वास्तविक अद्वैत वादी होने का दावा करता है इसमें भेद भाव का अवसर ही नहीं है। आचार्य चरण ने अपने सिद्धान्त और उपासना की पुष्टि के लिए लगभग पचास ग्रन्थों की रचना की है जो कि इस प्रकार हैं— (१) श्री भाष्य (२) विशिष्टाद्वैत भाष्य (३) वेदान्त संग्रह (४) वेदान्त सार (५) वेदान्त दीप · ६) वेदान्त तत्त्वसार (७) वेदार्थ संग्रह (८) गीताभाष्य (६) श्वेताश्वतरोपनिषद् भाष्य (१०) मुण्डकोपनिषद् भाष्य (११) प्रश्नोपनिषद् भाष्य (१२) ईशोपनिषद् भाष्य (१३) विष्णु सहस्रनाम भाष्य (१४) न्यास परि शुद्धि (१५) न्याय सिद्धाञ्जन (१६) पाञ्चरात्र रक्षा (१७) योग सूत्र भाष्य (१८) मणि दर्पण (१६) रत्न प्रदीप (२०) न्याय रत्नमाला (२१) गुण रत्नकोष (२२) मति मानुष (२३) देवता पारम्य (२) चक्रोल्लास (२५) कूट संदोह (२६) वार्त्ता माला (२७) शत दूषणी (२८) गद्य त्रय (२६) शरणागति गद्य (३०) ankurnagpal108@gmail.com

Page 20Permalink

वैकुण्ठ गद्य (३१) विष्णु विग्रह (३२) संशन स्तोत्र (३३) पंच पटल (३४) अष्टादश रहस्य (३५) कण्टकोद्धार (३६) नित्य पद्धति (३७) नित्याराधन विधि (३८) नारायण मंत्रार्थ (३६) संकल्प सूर्योदय टीका (४०) सच्चरित्र रक्षा (४१) राम पटल (४२) राम पद्धति (४३) राम पूजा पद्धति (४४) राम रहस्य (४५) रामार्चापद्धति (४६) रामायण व्याख्या (४७) दिव्य सूरि प्रभाव दीपिका (४८) सर्वार्थ सिद्धि (४६) भगवदाराधन क्रम, इत्यादि । इन ग्रन्थों के अतिरिक्त आचार्य श्री ने ७२ वाक्यों का उपदेश भक्तों को दिया था किन्तु उनका पालन कलिकाल में असंभव मानकर आचार्य चरण ने ६ विशेष वाक्यों का उपदेश दिया जिनका सारांश इस प्रकार है— (१) कर्मानुष्ठान को भगवत्कैङ्कर्य समझ कर करना चाहिए, और फलेच्छा रहित होकर भगवन्मन्त्र का जप करना चाहिए । श्री भाष्य को आदर से श्रवण- मनन करना चाहिए । इस भाष्य का लोक में प्रचार करने से ईश्वर कैङ्कर्य हो जाता है । (२) यदि इसमें असमर्थ हों तो द्राविड़ ग्रन्थों का अहर्निश पाठ करना चाहिए । (३) यदि यह भी न हो सके तो दिव्य देशों में भगवत्कैङ्कर्य करना चाहिए और भगवन्मूर्त्तियों की प्रतिष्ठा करनी चाहिए । (४) यदि यह भी न हो तो अर्थ के सहित निरन्तर मन्त्रद्वय का अनुसन्धान करना चाहिए । (५) यदि इसमें भी गति न हो तो दिव्य देशों में कुटी बनाकर निरन्तर वास करना चाहिए । (६) यदि ऐसा भी न कर सके तो, ज्ञान भक्ति वैराग्य युक्त शरणांगति धर्म के मर्मज्ञ अहकार ममता मुक्त भगवद् भक्तों के आश्रय में सदा रहना चाहिए । यह सम्प्रदाय श्री (लक्ष्मी) के नाम से प्रसिद्ध है, इस सिद्धान्त की आद्या- चार्या श्री जी ही थीं । श्री पराशर व्यास पराङ्कुश, आदि इस संप्रदाय के प्रसिद्ध आचार्य है । कहा जाता है, आचार्य श्री रामानुज ने कांचीपूर्ण स्वामी से छः प्रश्न किये थे कि—परम तत्त्व क्या है ? सिद्धान्त क्या है ? मोक्ष के अनेक उपाय है परन्तु कौन सा सुलभ है ? अन्तिम कर्त्तव्य क्या है ? प्रपन्न का मोक्ष कब होगा ? मैं किन आचार्य से शिष्यता ग्रहण करू ? कांचीपूर्ण स्वामी ने, भगवान वरदराज से इन प्रश्नों की जिज्ञासा की, भगवान ने आकाशवाणी द्वारा इनका उत्तर दिया कि—समस्त जगत का कारण मै नारायण ही परतत्त्व । ईश्वर जीव का भेद ही सिद्धान्त है । शरणागति ही मोक्षोपाय है । अन्तकाल में यदि मेरे भक्त मेरा स्मरण न भी कर सकें तो भी उनकी मुक्ति होती है। प्रपन्न भक्त का मोक्ष व कर्त्ता मैं हूँ महापूर्णाचार्य की शिष्यता ग्रहण करो । कहा जाता है कि श्री रामानुजाचार्य ने ७४ पीठों की स्थापना की थी । कालान्तर में श्री वरवर मुनि स्वामी ने ८ पीठों की स्थापना की । इन पीठस्थ आचार्यों और श्रीमन्तो के द्वारा ही इस सम्प्रदाय की श्रीवृद्धि हो रही है । स्वामी ललित कृष्ण ankurnagpal108@gmail.com