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श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

by भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य)

DevanagariHindipublished696 pages

२. प्रथमाध्याय: समन्वयाध्याय (जन्माद्यस्य यतः आदि सूत्रों का ब्रह्म-समन्वय)

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: + ध्या + सों = अध्यासों! Wait, let's look closely at L7: विविध अध्यासों का उपादान - yes, Adhyasa! Adhyasa is the core Advaita concept being discussed! But wait, is it अध्यासों or अभ्यासों? Look at L7: the letter has a loop at the bottom? No, it's ध्! Wait, let's zoom in: In अभ्यन्तर: has a distinct circle on the left with a horizontal stroke to the right. In the word after विविध: it is अध्यासों! Wait, no, look at the top: does it have a loop? It is अध्यासों. Wait, let's check L13: अध्यास. L14: अध्यास. Yes, it's अध्यासों.

Wait, let's check L14: समय जगत् तथा ज्ञान बाध्य सर्प, रजत आदि वस्तु जन्य' अध्यास के Wait, is it अध्या- at the end of L13 and समय at L14? L13 ends with: अध्या- L14 starts with: समय जगत् -> wait! अध्यास-मय जगत्! Yes! अध्या- at the end of L13

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स्यानुमेयत्वे अभावाख्यप्रमाणविषयत्वे चेयमनुपपत्तिः समाना । अस्याज्ञानस्यभावरूपत्वे धर्मिप्रतियोगिज्ञान सद्भावेऽपि विरोधाभा- वादयमनुभवो भावरूपाज्ञान विषय एवाभ्युपगंतव्य इति । कथन यह है कि—"मैं अज्ञ हूं" इस प्रकार की प्रतीति में "अहं" संज्ञक आत्मा और उसके (अहं) के अभावधर्मीज्ञान की प्रतियोगी के रूप ने अवगति होती है या नही ? यह विचारणीय प्रश्न है। यदि वैसा ज्ञान रहता है, तो अभावात्मक और भावात्मक ज्ञान की सहस्थिति से ऐसा होना संभव नहीं है। यदि नहीं रहता, तब भी उस अभावात्मक ज्ञान की अवगति संभव नही है, क्योकि—अभाव की प्रतीति का सामान्य नियम है कि—जिसका अभाव जानना है तो उसके प्रतियोगी की जान- कारी आवश्यक है, बिना प्रतियोगी ज्ञान के अभाव का ज्ञान होता है, न हो सकता है। अभावात्मक ज्ञान चाहे अनुभव विषयक हो या अनुपलब्धि प्रमाण विषयक हो दोनों में ही उक्त असंगति समान रूप से होती है। इस अज्ञान को भावरूप मानने पर धर्मि प्रतियोगी ज्ञान की स्थिति में भी "मैं अज्ञान हूं" ऐसी प्रतीति असंगत नहीं होती, क्योंकि—इसमें परस्पर कोई विरोध नहीं रहता, इसलिए उक्त प्रकार की प्रतीति (मैं अज्ञ हूं) को भाव रूप अज्ञान विषयक ही मानना चाहिए। ननु च—भावरूपमप्यज्ञानं वस्तुयाथात्म्यावभासरूपेण साक्षि चैतन्येन विरुध्यते ? मैवम्—साक्षिचैतन्यं न वस्तुयाथात्म्यविषयं अपितु अज्ञानविषयम् अन्यथामिथ्यार्थविभासानुपपत्तेः । नहि अज्ञान विषयेण ज्ञानेनाज्ञानं निवर्त्यते, इति न विरोधः ननु चेदं भावरूपमप्यज्ञानं विषयविशेषव्यावृत्तमेव साक्षिचैतन्यस्य विषयो भवति। स विषयः प्रमाणाधीन सिद्धिरिति कथमिव साक्षि चैतन्येन अस्मदर्थव्यावृत्तमज्ञानं विषयी क्रियते ? नैष दोषः, सर्वं मेववस्तुजातं ज्ञाततया अज्ञाततया वा साक्षि चैतन्यस्य विषयभूतम् तत्र जडत्वेज्ञाततया सिध्यते एव, प्रमाणव्यवधानापेक्षा । अजडस्य तु प्रत्यग्वस्तुनः स्वयं सिध्यतो न प्रमाणव्यवधानापेक्षेति, सदैवा-

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( १५३ ) ज्ञानस्य व्यावत्त॑कत्वेनावभासो युज्यते । तस्मात् न्यायोपवृंहितेन प्रत्यक्षेण भावरूपमेवाज्ञानं प्रतीयते । तदिदं भावरूपमज्ञानं अनु- मानेनापि सिध्यति । विवादाध्यसितं प्रमाणज्ञानं स्वप्रागभाव- व्यतिरिक्त स्वविषयावरण स्वनिवर्त्त्य स्वदेशगतस्तु अन्तरपूर्वकम्, अप्रकाशितार्थ प्रकाशकत्वात्, अन्धकारे प्रथमोत्पन्न प्रदीपप्रभा- वत् इति । वस्तु के यथार्थ स्वभाव को प्रकाशित करने वाले साक्षी चैतन्य (अनुभविता जीवात्मा) से, भावरूप अज्ञान की विरुद्धता हो गयी ? ऐसा संशय नहीं करना चाहिए, वस्तु का यथार्थ स्वभाव प्रकाशन साक्षी चैत- न्य का विषय नहीं है, अपितु उसका विषय तो अज्ञान प्रकाशन है' अन्यथा वह मिथ्यार्थावभास न कर सकता । अज्ञान (असत्यवस्तु) विषयक अवभास से अज्ञान का निवारण तो हो नहीं सकता, इसलिए चैतन्य के साथ अज्ञान का विरोध भी नहीं है । “मै अज्ञ हूँ” इस प्रतीति में “अहं” पदार्थ आत्मा के साथ अज्ञान की भी प्रतीति होती है । स्वयं सिद्ध स्वयं प्रकाश आत्मा जब किसी भी प्रमाण के अधीन नहीं है, ऐसा साक्षी चैतन्य आत्मा “अहं” पदार्थ को छोड़कर केवल अज्ञान को ही अपना विषय कैसे करता है ? ऐसी आपत्ति भी नही की जा सकती क्योंकि—सभी ज्ञात अज्ञात वस्तुएं साक्षी चैतन्य की प्रतीति की विषय हैं । जडरूप से ज्ञात होने वाली वस्तुओं में प्रमाण अपेक्षित होते हैं । अजड वस्तुएं स्वयं सिद्ध स्वयं प्रकाश होने से, प्रमाणों की अपेक्षा नहीं रखतीं, वो सब तो अज्ञान से भिन्न हैं इसलिए सदा अवभासित हो सकती हैं । इस प्रकार युक्ति सिद्ध प्रत्यक्ष प्रमाण से अज्ञान की भावरूप प्रतीति सिद्ध होती है । अज्ञान पदार्थ भावरूप है, अभावरूप नहीं, यह बात अनुमान से भी प्रमाणित है । प्रमाण समुत्पादित ज्ञान द्वारा अज्ञात विषय प्रकाशित हुआ करता है, ज्ञानोत्पत्ति के पूर्व, उसके प्रागभाव से भिन्न उसके प्रकाश विषय को आवरक वस्तु स्वयं उसके द्वारा ही निवार्य होती है (अर्थात्— ज्ञानोत्पत्ति के पूर्व किसी एक ऐसी वस्तु की स्थिति माननी पड़ेगी जो

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( १५४ ) उस ज्ञानको आवृत किये रहती हैं। जिसे कि ज्ञान निवारण कर सके, आत्मा से समुत्पन्न यह ज्ञान आत्मा के आश्रित तो रहता ही है, इसलिए आवृत करने वाली वस्तु को ज्ञान का प्रागभाव नहीं कह सकते, अर्थात् ज्ञान की स्थिति नित्य है, उसका प्रागभाव होता नहीं, इसलिए उत्पत्ति के पूर्व वह किसी वस्तु से आवृत रहता है, अभावरूप नहीं रहता) उत्पत्ति के पूर्व वह ज्ञान, अन्धकार में प्रथमोत्पन्न प्रदीपप्रभा की तरह सदा आत्मा के आश्रित विद्यमान रहता है। आलोकाभावमात्रं वा रूपं दर्शनाभावमात्रं वा तमो न द्रव्यान्तरम्, तत्कथं भावरूपाज्ञान साधने निदर्शनतयोपन्यस्यते ? इति चेत् उच्यते-बहुलत्वविरलत्वाद्यवस्थायोगेन रूपवत्तया चोपलब्धेर्द्रव्यान्तरमेव तम इति निरवद्यम्, इति । (संशय) यदि कहो कि—आलोक का अभाव या रूप के दर्शन का अभाव ही तो अन्धकार है, अन्धकार कोई वस्तु नहीं है इसलिए उसे भाव- रूप अज्ञान की सिद्धि के लिए दृष्टान्तरूप से उपस्थित कर रहे है ? (समाधान) हल्के और घने तथा काले रूप से उस अन्धकार की उपलब्धि होती है, इसलिए अन्धकार नाम की कोई वस्तु अवश्य है। अत्रोच्यते-“अहमज्ञो मामन्यंच न जानामि” इत्यत्रोपपत्ति- सहितेन केवलेन च प्रत्यक्षेण न भावरूपमज्ञानं प्रतीयते । वस्तु- ज्ञान प्रागभावविषयत्वे विरोध उक्त., सहि भावरूपाज्ञानेऽपि तुल्यः । विषयत्वेनाश्रयत्वेन चाज्ञानस्य व्यावर्त्तंकया प्रत्यगर्थः प्रतिपन्नो वा अप्रतिपन्नो वा ? प्रतिपन्नश्चेत् तस्वरूपज्ञान निवर्त्यं तद ज्ञानं तस्मिन् प्रतिपन्ने कथमिव तिष्ठति । अप्रतिपन्नश्चेत—व्यावर्त्त- काश्रय विषय ज्ञान शून्यमज्ञानं कथमनुभूयेत ? (पूर्वपक्ष के उक्त तर्क का समाधान)— “मैं अज्ञ अपने को तथा अन्यों को नही जानता” ऐसी जो अज्ञान की प्रतीति होती है, युक्ति या प्रत्यक्ष प्रमाण द्वारा उसे भाव रूप से

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( १५५ ) प्रमाणित नही किया जा सकता । अज्ञान को ज्ञान का प्रागभाव बतलाने वाले सिद्धान्त में जो असंगति बतलाई गई है वह तो भाव रूप अज्ञान में भी रहेगी । आत्मा यदि अज्ञान का विषय या आश्रय है तो आश्रित अज्ञान, विशेष्य और आत्मा विशेषण होगा फिर बतलाओ कि—'अहं- अज्ञ'' कहने में आत्मा की प्रतीति रहती है या नहीं ? यदि रहती है तो आत्मज्ञान से नष्ट होने वाला वह अज्ञान आत्मा का आश्रित कैसे हो सकता है ? यदि नहीं रहती तो किस विषय का अज्ञान कब हुआ, इसका भान न होने से अज्ञान की प्रतीति होगी कैसे ? अथ-विशदस्वरूपावभासोऽज्ञानविरोधी, अविशदस्वरूपं तु प्रतीयते, इत्याश्रयविषयज्ञाने सत्यपि नाज्ञानानुभव विरोधः इति । हन्त र्तहि ज्ञान प्रागभावोऽपि विशदस्वरूप विषयः । आश्रय- प्रतियोगि ज्ञानंतु अविशदस्वरूपविषयमिति न कश्चिद् विशेषोऽन्य- त्राभिनिवेशात् । भावरूपस्याज्ञानस्यापि हि अज्ञानमिति सिध्यतः प्रागभावसिद्धाविव सापेक्षत्वमस्त्येव । तथाहि-अज्ञानमिति ज्ञाना- भावः, तदन्यः, तद्विरोधी वा ? त्रयाणामपि तत् स्वरूपज्ञानापेक्षाऽ- वश्याश्रयणीया । यद्यपि तमः स्वरूपप्रतिपत्तौ प्रकाशापेक्षा न विद्यते तथाऽपि प्रकाशविरोधीत्यनेनाकारेण प्रतिपत्तौ प्रकाश प्रतिपत्ति अपेक्षाऽस्त्येव । भवदभिमताज्ञानं न कदाचित् स्वरूपेण सिध्यति अपितु अज्ञानमित्येव । तथा सति ज्ञानाभाववत् तदपेक्षत्वं समानम् ज्ञानप्रागभावस्तु भवताऽप्यभ्युपगम्यते । प्रतीयते चेत्युभ- याभ्युपेतो ज्ञान प्रागभाव एव "अहमज्ञो मामन्यं च जानामि', इत्यनुभूयते इति अभ्युपगन्तव्यम् । यदि कहो कि—आत्म विषयक कोई विशेषज्ञान ही अज्ञान का निवर्त्तक हो, ऐसा कोई आवश्यक नहीं है, अपितु आत्मा का यथार्थ विशुद्ध स्वरूप विषयक ज्ञान ही उस अज्ञान का निवर्त्तक है । "मैं अज्ञ " में जो प्रतीति होती है, आश्रय और विषय रूप से होने वाली वह प्रतीति विशुद्ध

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( १५६ )

निर्मल आत्मा की नहीं होती अपितु अज्ञान कलुषित होती है । इसलिए अज्ञान के साथ उसका कोई विरोध नहीं है । (उत्तर) बहुत अच्छे; यदि ऐसी ही बात है, तो ज्ञान का प्रागभाव अज्ञान, विशुद्ध आत्म स्वरूप विषयक होगा, तथा आश्रय और विषय रूप से होने वाला आत्मज्ञान, विशुद्ध आत्म विषयक न होगा, इसलिए उक्त प्रकार के आत्मज्ञान की स्थिति में भी प्रागभाव रूपी अज्ञान बना रहेगा । आपके इस कथन में तो सिवा अज्ञान भाव सिद्धि की चेष्टा के, कोई और विशेष बात समझ में नहीं आती, अज्ञान को यदि भावस्वरूप मान भी ले, तब भी वह कहलायेगा तो अज्ञान ही, प्रागभाव की तरह, उसमें भी पूर्वोक्त सापेक्षता तो रहेगी ही । जरा सोचिये—अज्ञान है क्या वस्तु ? क्या वह ज्ञान का अभाव है, या ज्ञान विरोधी अज्ञान है, या ज्ञान से भिन्न कोई वस्तु विशेष है ? इन तीनों की जानकारी के पहिले ज्ञान के स्वरूप की जानकारी आवश्यक है । यद्यपि अन्धकार के स्वरूप की प्रतीति में प्रकाश ज्ञान की अपेक्षा नहीं रहती, फिर भी अन्धकार को जब प्रकाश के विरोधी रूप में जानने की इच्छा होती है तब प्रकाश की प्रतीति की अपेक्षा होती है । आपका अभिप्रेत “अज्ञान ” कभी भी स्वरूप से तो प्रतीत होता नहीं, केवल “अज्ञान” इस नाम से ही ज्ञात होता है इस प्रकार ज्ञानाभाव की तरह सापेक्षता इसमे भी रहती है इसलिए ज्ञान का प्रागभाव तो आप भी मानते है ऐसा लगता है । “मैं अज्ञ” इत्यादि प्रतीति में उभय संमत प्राग्- भाव स्वीकारना ही संगत है । नित्यमुक्तस्वप्रकाश चैतन्यैकस्वरूपस्यब्रह्मणोऽज्ञानानुभवश्च न संभवति स्वानुभवस्वरूपत्वात् । स्वानुभवस्वरूपमपि तिरोहितस्व- रूपमज्ञानमनुभवतीति चेत्, किमिदं तिरोहित स्वरूपत्वम् ? अप्रकाशितस्वरूपत्वमिति चेत् , स्वानुभवस्वरूपस्य कथम् प्रकाशित स्वरूपत्वम् ? स्वानुभवस्वरूपस्याप्यन्यतोऽप्रकाशित स्वरूपमापद्यत इति चेत् , एवं तर्हि प्रकाशाख्यधर्मानभ्युपगमेन प्रकाशस्यैव स्वरूप- त्वादन्धतः स्वरूपनाश एव स्यात् इति पूर्वमेवमोक्तम् ।

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( १५७ ) किञ्च-ब्रह्मस्वरूपतिरोधानहेतुभूतमेतदज्ञानं स्वयमनुभूतं सत् ब्रह्मतिरस्करोति, ब्रह्मतिरस्कृत्य स्वयं तदनुभवविषयो भवतीत्य- न्योन्याश्रयणम् । नित्य मुक्त, एकमात्र स्वप्रकाश चैतन्य स्वरूप ब्रह्म में तो अज्ञाना- नुभव हो नही सकता, क्योंकि-वह स्वयं अनुभवस्वरूप है। यदि कहो कि- स्वानुभवस्वरूप भी, तिरोहित स्वरूप अज्ञान का अनुभव करता है। तो वह तिरोहित स्वरूपता क्या है, यदि कहो कि-अप्रकाशित स्वरूपता ही तिरोहित रूपता है। तो स्वानुभव स्वरूप वस्तु तिरोहित स्वरूप कैसे हो सकती है ? स्वानुभव स्वरूप होते हुए भी, अन्य से आवृत होने से तिरोहित स्वरूपता होती है, इस कथन का तात्पर्य तो यह हुआ कि स्वानुभवस्वरूप प्रकाश ही किसी अन्य से आवृत होकर तिरोहित होता है अर्थात् उस प्रकाश के स्वरूप का नाश होता है, ऐसा तो पहिले भी कह चुके हैं । उक्त तर्क से तो यह तात्पर्य हुआ कि-ब्रह्म के स्वरूप को तिरोहित करने वाला अज्ञान स्वयं अनुभूत होकर ही, ब्रह्म को तिरोहित करता है, उसे तिरोहित करके, स्वयं उस ब्रह्म के अनुभव का विषय हो जाता है । इस प्रकार वे दोनों परस्पर एक दूसरे पर आश्रित हैं । अनुभूतमेव तिरस्करोति, चेत्, यद्यतिरोहितस्वरूपमेव ब्रह्मा- ज्ञानमनुभवति, तदा तिरोधानकल्पना निष्प्रयोजना स्यात् अज्ञान स्वरूपकल्पना च । ब्रह्मणोऽज्ञानदर्शनवत् अज्ञान कार्यतयाऽभिमत प्रपंचदर्शनस्यापि संभवात् । यदि कहो कि-अनुभूत होकर तिरस्कृत करता है, तब तो इसका तात्पर्य यह हुआ कि अतिरोहित स्वरूप ब्रह्म अज्ञान का अनुभव करता है; यदि ऐसी बात है, तो फिर तिरोधान की कल्पना व्यर्थ ही की, तथा अज्ञान के स्वरूप की कल्पना भी । ऐसा निश्चित होने से, ब्रह्म के अज्ञान अनुभव की तरह, अज्ञान का कार्यरूप प्रपंचमय सारा जगत भी सहज अनुभूति का विषय सिद्ध होता है । ankurnagpal108@gmail.com

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किं च--ब्रह्मणोऽज्ञानानुभवः किं स्वतोऽन्यतो वा ? स्वतः- चेत् अज्ञानानुभवस्य स्वरूपप्रयुक्तत्वेनानिर्मोक्षस्स्यात् । अनुभूति- स्वरूपस्य ब्रह्मणोऽज्ञानानुभव स्वरूपत्वेन मिथ्या रजतबाधक ज्ञानेन रजतानुभवस्यापि, निवृत्तिवत् निवर्त्तक ज्ञानेनाज्ञानानुभूतिरूप ब्रह्म स्वरूपनिवृत्तिर्वा । अन्यतश्चेत् किं तदन्यत् ? अज्ञानान्तरमिति- चेत् अनवस्था स्यात् ब्रह्म तिरस्कृत्यैव स्वयमनुभवविषयो भवतीति तथा सतीदमज्ञानं काचादिवत् स्वसत्तया ब्रह्मतिरस्करोति, इति ज्ञानबाध्यत्वं अज्ञानस्य न स्यात् । यह बतावें कि--ब्रह्म की उक्त अज्ञानानुभूति स्वतः होती है या दूसरे के द्वारा होती है ? यदि स्वतः होती है तो वह सदा होती रहेगी कभी छूटेगी ही नही जिसके फलस्वरूप, अज्ञानानुभव स्वरूप से प्रतीत होने वाला वह ब्रह्म शुक्ति रजत की तरह, अज्ञान निवर्त्तक तत्वज्ञान के द्वारा अज्ञान के साथ ही साथ तदनुभवरूप होने से स्वरूपतः समाप्त हो जायगा। यदि कहो कि नहीं उसकी वह अज्ञानानुभूति परतः होती है, तो वह परवस्तु क्या है ? यदि वह अज्ञान से भिन्न कोई और दूसरा अज्ञान है, तो फिर अनवस्था दोष उपस्थित होगा (अज्ञान के लिए अज्ञानों की ही कल्पना करते रह जाओगे) यदि कहो कि--अज्ञान ब्रह्म को आवृत करने के बाद अनुभूत होता है, तो काच आदि नेत्र रोगों की तरह जो कि--नेत्रों को आवृत कर दर्शन शक्ति समाप्त कर प्रतीत होते हैं, वैसे ही यह भी हुआ । ऐसा अज्ञान तो, तत्त्वज्ञान के द्वारा हटाया नहीं जा सकता । अथेदमज्ञानं स्वयमनादि ब्रह्मणः स्वसाक्षित्वं ब्रह्मस्वरूपति- रस्कृतिं च युगपदेव करोति, अतो नानवस्थादयो दोषा इति नैतत् । स्वानुभवस्वरूपस्य ब्रह्मणः स्वरूपतिरस्कृतिमंतरेण साक्षित्वापादना- योगात् । हेत्वंतरेण तिरस्कृतमिति चेत् तर्हि अस्यानादित्वं मपा- स्तम् । अनवस्था च पूर्वोक्ता । अतिरस्कृत स्वरूपस्यैव साक्षित्वा- पादेन ब्रह्मणः स्वानुभवैकतानता न स्यात् । ankurnagpal108@gmail.com

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( १५६ ) यह अज्ञान स्वयं अनादि है अतः ब्रह्म की स्वयं प्रकाशता और ब्रह्म- स्वरूपतिरस्कृति दोनों को एक साथ करता है, इसलिए अनवस्था आदि दोष नहीं हो सकते; ऐसा कथन भी असंगत है। स्वानुभवस्वरूप ब्रह्म की स्वरूप तिरस्कृति के बाद उसकी स्वयं प्रकाशता की संभावना की बात एक कल्पना मात्र है। यदि कहो कि—अज्ञान के अतिरिक्त किसी अन्य वस्तु से ब्रह्मस्वरूप की तिरस्कृति होती है; तो अज्ञान की अनादिता की बात कट जाती है और वही पूर्वोक्त अनवस्था दोष आ जाता है। ब्रह्म के अनावृत स्वरूप की ही अज्ञान साक्षिता मानते हो तो, ब्रह्म की अनुभवरूपता समाप्त हो जाती है अपि च—अविद्यया ब्रह्मणि तिरोहिते तद्ब्रह्म न किंचिदपि प्रकाशते ? उत् किंचित् प्रकाशते ? पूर्वस्मिन्कल्पे प्रकाशमात्र स्वरूपस्य ब्रह्मणोऽप्रकाशे तुच्छतापत्तिरसकृदुक्ता। उत्तरस्मिन् कल्पे सच्चिदानन्दैकरसे ब्रह्मणि कोऽयमंशस्तिरस्कृते, को वा प्रका- शते ? निरंशे निर्विशेषे प्रकाशमात्रे वस्तुन्याकारद्वयासम्भवेन तिर- स्कारः प्रकाशश्च युगपत् न संगच्छेते। अथ सच्चिदानन्दैकरसंब्रह्म अविद्यया तिरोहितस्वरूपमविशदमिवलक्ष्यत इति प्रकाशमात्र स्वरूपस्य विशदताऽविशदता वा किं रूपा। एतदुक्तं भवति यस्सां श विशेषः प्रकाशविषयः तस्य सकलावभासो विशदावभासः। कति- पय विशेषरहितावभासश्चाविशदाभासः। तत्र च आकारोऽप्रति- पन्नस्तस्मिन्नंशे प्रकाशाभावादेव प्रकाशावैशद्यं न विद्यते। यच्चांशः प्रतिपन्नस्तस्मिन्नंशे तद्विषय प्रकाशो विशद एव। अतः सर्वत्र प्रका शांशेऽवैशद्यं न संभवति। विषयेऽपि स्वरूपे प्रतीयमाने तद्गत कतिपय विशेषाप्रतीतिरेवावैशद्यम्। तस्मादविषयं निर्विशेषे प्रकाशमात्रे ब्रह्मणि स्वरूपे प्रकाशमाने तद्गत कतिपय विशेषाप्रतीतिरूपावैशद्यं नानाज्ञानकार्यं न संभवति। एक बात और विचारणीय है—अविद्या से तिरोहित ब्रह्म में कुछ प्रकाश रहता है या नहीं ? यदि नहीं रहता तो एक मात्र प्रकाश स्वरूप ankurnagpal108@gmail.com

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( १६० ) ब्रह्म में फिर रही क्या जाता है, वह तो एक तुच्छ वस्तु रह जायगा। यदि प्रकाश रहता है, तो सच्चिदानन्दैकरस ब्रह्म में कौन सा अंश छिपा रहता है, और कौन सा प्रकाशित रहता है ? अखंड निर्विशेष प्रकाश- मात्र ब्रह्म में आवरण और प्रकाश ये दो वस्तुएं एक साथ नहीं रह सकतीं यदि सच्चिदानन्द ब्रह्म अविद्या से आवृत होकर मलिन दीखता है तो, एक मात्र प्रकाश स्वरूप उसमें विशदता और मलिनता कैसी ? कहने का तात्पर्य यह है कि—जो वस्तु अंशयुक्त, सविशेष, अन्य प्रकाश होती है, वही पूर्ण या अपूर्ण प्रकाश वाली हो सकती है। विशेष प्रकाश से रहित, सूक्ष्म अविशद प्रकाश भी उसी का हो सकता है। उसका जो अंश अविकसित है, उसी में प्रकाश का अभाव होने से प्रकाश की विशदता नहीं रहती और जो अंश विकसित है, उसमें उसका विशद प्रकाश रहता है। इस प्रकार सभी जगह प्रकाशांश का वैशद्य संभव नहीं है। जो वस्तु स्वरूप से प्रतीति का विषय होती है, उसका जो अंश प्रतीतिगम्य नहीं होता, उसी के प्रकाश को अविशद कहा जा सकता है। इन्द्रियों का अविषय, निर्विशेष प्रकाशमात्र ब्रह्म जब स्वयं प्रकाश है तो उसके किसी विशेष अंश की अप्रतीतिजन्य अविशदता का कोई प्रश्न ही नहीं उठता (अज्ञान जन्य आवरण उसमें संभव ही नहीं है) अपि च—इदमविद्याकार्यमवैशद्यं तत्वज्ञानोदयान्निवर्त्तते न वा ? अनिवृत्तावपवर्गाभावः । निवृत्तौ च वस्तु किं रूपमिति विवेचनीयम् विशदस्वरूपमिति चेत् तद्विशद स्वरूपं प्रागस्ति न वा ? अस्ति चेत्, अविद्याकार्यमवैशद्यम् तन्निवृत्तिश्च न स्याताम् नोचेत् मोक्षस्य कार्यतया अनित्यता स्यात् । एक बात और भी है कि—यह अविद्या जन्य अविशदता, तत्वज्ञान से निवृत्त होती है या नहीं ? यदि नहीं होती तो मोक्ष नहीं हो सकता यदि होती है, तो उस वस्तु का क्या स्वरूप होता है यह विवेचनीय है। यदि वह निवृत्त वस्तु विशद होती है तो निवृत्ति के पूर्व वह विशद थी या नहीं ? यदि थी तो, अविद्या का कार्य अविशदता और उसकी निवृत्ति ये दोनों ही होना असंभव है, इनका तो प्रश्न ही नहीं उठता। यदि नहीं ankurnagpal108@gmail.com

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( १६१ ) र्था ता, उसे मोक्ष का काय माना जायगा, अतएव वह अनित्य है यह भी निश्चित है । अस्याज्ञानस्याश्रयनिरूपणादेवाऽसंभवः पूर्वमेवोक्तः । अपि च— अपरमार्थदोषमूलवादिना निरधिष्ठानभ्रमासंभवोऽपि दुरुपपादः भ्रम हेतुभूतदोष दोषाश्रयत्ववदधिष्ठानापरमार्थ्येऽपिभ्रमोपपत्तेः । ततश्च सर्वशून्यत्वमेव स्यात् । इस अज्ञान के आश्रय का निरूपण करना ही जब असंभव है, तो अज्ञान की कल्पना भी असम्भव ही है, यह प्रथम ही कह चुके हैं। तथा जो लोग, भ्रम के मूल दोष को अपारमार्थिक मानते हैं, वह भी, असंगत है, क्योंकि—निराश्रित असत्य वस्तु पर भ्रम कभी आधारित रही नहीं सकता । भ्रम का मूल कारण दोष ही यदि असत्यस्वरूप दोषान्तर पर आश्रित होगा और असत्य अधिष्ठान में ही जब भ्रम होगा तो सब कुछ शून्य हो जायगा (यही तो बौद्धों का सर्वशून्यवाद का सिद्धान्त है) यदुक्तमनुमानेनापि भावरूपमज्ञानं सिध्यतीति, तदयुक्तम्, अनुमा- नासंभवात् । ननूक्तमनुमानम् ? सत्यमुक्तम्, दुरुक्तं तु तत्, अज्ञानेऽ- प्यनभिमताज्ञानान्तरसाधनेन विरुद्धत्वाद् हेतोः । तत्राज्ञानान्तरा साधने हेतोरनेकान्त्यम् । साधने च तदज्ञानमज्ञानसाक्षित्वं निवार- यति । ततश्चाज्ञान कल्पना निष्फला स्यात् । जो यह कहा कि—अनुमान से भी भावरूप अज्ञान की सिद्धि होती है, यह कथन असंगत है—ऐसा अनुमान कभी नहीं हो सकता । यदि कहो कि—उक्त बात भी अनुमान ही तो है ? ठीक कहते हो, अनुमान का अनुमान करना भी युक्ति विरुद्ध ही है । अज्ञान में अज्ञानान्तर की कल्पना तो आपको भी अभिमत नहीं है । अज्ञानान्तर के साधन में अनेक हेतु हैं, और उस साधन में, अज्ञान साक्षिता की निवृत्ति हो जाती है, जिससे अज्ञान की कल्पना ही निष्फल हो जाती है । दृष्टान्तश्च साधन विकलः, दीपप्रभायाअप्रकाशितार्थप्रकाश त्वाभावात् । सर्वत्र ज्ञानस्यैव हि प्रकाशत्वम् । सत्यपि दीपे ज्ञानेन

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( १६२ ) विना विषयप्रकाशाभावात् । इन्द्रियाणामपि ज्ञानोत्पत्ति हेतुत्वमेव न प्रकाशकत्वम् । प्रदीपप्रभायास्तु चक्षुरिन्द्रियस्य ज्ञानमुत्पादयतो- विरोधि तमोनिरसनद्वारेणोपकारकत्वमात्रमेव । प्रकाशकज्ञानोत्पत्तौ व्याप्रीयमाण चक्षुरिन्द्रियोपकारक हेतुत्वमपेक्ष्य दीपस्य प्रकाशकत्व व्यवहारः । पूर्वोक्त प्रदीप दृष्टान्त भी अज्ञान के अस्तित्व के विपरीत सिद्ध होता है । प्रदीप प्रभा कभी अप्रकाशित वस्तु को प्रकाशित नही कर सकती, ज्ञात वस्तु का प्रकाश ही उससे संभव है । दीप के रहते हुए भी, वस्तु ज्ञान के बिना, उस वस्तु का प्रकाश नही होता । इन्द्रियां भी ज्ञानोत्पत्ति का ही कारण होती है, प्रकाशक तो वो भी नही होती । दीप प्रभा केवल चाक्षुष ज्ञान के प्रतिबंधक अधकार को ही दूर करती है, इस प्रकार वह चक्षुष ज्ञान की उपकारक मात्र है। वस्तु प्रकाशक ज्ञान के समुत्पादन में चक्षुरिन्द्रिय ही कार्य करती है, दीप की प्रभा स्थानगत अंधकार का निवारण कर साहाय्य प्रदान करती है, इसलिए व्यवहार

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( १६३ ) केवल ज्ञान प्रतिबन्धक के निवारण को ही प्रकाशता नहीं कहते अपितु जिस वस्तु का जो स्वरूप हो उसका निरूपण करते हुए लोक व्यवहारो- पयोगी बनाने का नाम प्रकाशता है। ऐसी प्रकाशता ज्ञान के अतिरिक्त किसी में नहीं है । यदि ज्ञानोपकारक विषयों को भी अप्रकाशित विषयों का प्रकाशक मानेंगे तो ज्ञानोत्पत्ति की प्रधान साधन इन्द्रियों को भी अप्रका- शित वस्तुओं का प्रकाशक मानना पड़ेगा, जिसके फलस्वरूप तुम्हारा अभिमत अनैकान्त्य का सिद्धान्त दूषित हो जायगा, क्योंकि इन्द्रियों के कार्य के पूर्व कार्य निवारक कोई नहीं होता। अस्तु अब इस प्रसंग को यहीं समाप्त करते हैं। प्रतिप्रयोगाश्च विवादाध्यसितमज्ञानं न ज्ञानमात्रब्रह्माश्रयम्, अज्ञानत्वात् ; शुक्तिकादि अज्ञानवत् । ज्ञानाश्रयं हि तत् विवादाध्य- सितमज्ञानं न ज्ञानमात्रब्रह्मावरणम्, अज्ञानत्वात् शुक्तिकादि अज्ञानवत् । विषयावरणं हि तत् विवादाध्यसितमज्ञानं न ज्ञाननि- वर्त्यम् । ज्ञानविषयानावरणत्वात् , यत् , ज्ञाननिवर्त्यम् अज्ञानं तत् ज्ञानविषयावरणम् । यथा शुक्तिकादि अज्ञानम् । ब्रह्म न अज्ञाना- स्पदं ज्ञातृत्वविरहात् धरादिवत् । ब्रह्म न अज्ञानावरणं ज्ञान अविषयत्वात् । यदि अज्ञानावरणं तर्हि तद् ज्ञानविषयभूतम्, यथा शुक्तिकादि । ब्रह्म न ज्ञान निवर्त्याज्ञानम् ज्ञान अविषयत्वात् । यत् ज्ञान निवर्त्याज्ञानं तद् ज्ञानविषयभूतं यथा शुक्तिकादि । विवादा- ध्यसितं प्रमाणज्ञानं स्वप्रागभावातिरिक्त अज्ञानपूर्वकं न भवति प्रमाणज्ञानत्वात् , भवदभिमताज्ञानसाधन प्रमाणज्ञानवत् । अज्ञान की भावरूपता के साधन के लिए जैसा अनुमान किया गया, उसके प्रतिकूल भी अनुमान किया जा सकता है जैसे कि-विवा- दास्पद अज्ञान कभी शुद्ध ज्ञान ब्रह्म का आश्रय नहीं हो सकता, क्योंकि वह शुक्ति आदि अज्ञान की तरह मिथ्या अज्ञान है। जो कि-भ्रांत ज्ञान के आश्रय में रहता है। विवादास्पद अज्ञान, ज्ञान का आवरण भी नहीं हो सकता, क्योंकि वह शुक्ति अज्ञान की तरह मिथ्या है, जो

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( १६४ ) । व-विषय (शुक्ति) का ही आवरण कर सकता है। विवादास्पद अज्ञान, ज्ञान से निवत्र्त्य भी नहीं है, क्योंकि वह ज्ञान के विषय (ज्ञेय) का आवरण नहीं करता। जो अज्ञान, ज्ञान द्वारा निवर्त्य होता है, वह ज्ञान के विषय का आवरक होता है, जैसे शुक्ति आदि का अज्ञान। घट आदि पदार्थों में जैसे ज्ञातृता नहीं रहती, वैसे ही ब्रह्म में भी ज्ञातृता का अभाव है, इसलिये वह अज्ञान का आश्रय नहीं हो सकता। अज्ञान कभी ब्रह्म को आवृत नहीं कर सकता, क्योंकि वह ज्ञान का विषय (ज्ञेय) नहीं है। जो अज्ञान से आवृत होता है, वह निश्चित ही ज्ञान का विषय होता है जैसे कि-शुक्ति। ब्रह्मविषयक अज्ञान ज्ञान से निवर्त्य नहीं है, क्योंकि वह ज्ञान का विषय नहीं है जो अज्ञान, ज्ञान से निवर्त्य होता है, वह निश्चित ही ज्ञान का विषय होता है जैसे कि शुक्ति। विवादास्पद प्रमाणरूप ज्ञान कभी अपने प्रागभाव के अतिरिक्त, अज्ञानपूर्वक नहीं हो सकता, क्यों कि वह, आपके अभिमत अज्ञान साधक, प्रमाण ज्ञान की तरह, प्रमाण जन्य होता है। ज्ञानं न वस्तुनो विनाशकम्, शक्तिविशेषोपबृंहण विरहे सति ज्ञानत्वात् । यद्वस्तुनो विनाशकं तत् शक्ति विशेषोपबृंहितं ज्ञान- मज्ञानं च दृष्टम्, यथेश्वरयोगिप्रभृतिज्ञानं, यथा च मुद्गरादि । भावरूपमज्ञानं न ज्ञानविनाश्यम्, भावरूपत्वात् घटादिवदिति । अथोच्येत-बाधक ज्ञानेन पूर्वज्ञानोत्पन्नानां भयादीनां विनाशो दृश्यते इति । नैवम् नहि ज्ञानेन तेषां विनाशः क्षणिकत्वेन तेषां स्वयमेव विनाशात् । कारणनिवृत्या च पश्चादनुत्पत्तेः । क्षणिकत्वं च तेषां ज्ञानवदुत्पत्तिकारणसन्निधानएवोपलब्धेः अन्यथानुपलब्धेश्चाव- गम्यते । अक्षणिकत्वे च भयादीनां भयादि हेतुभूतज्ञानसन्तताव- विशेषेण सर्वेषां ज्ञानानां भयादुत्पत्ति हेतुत्वेनानेकभयोपलब्धि प्रसंगाच्च । ज्ञान स्वभावतः किसी वस्तु का विनाशक नहीं होता, क्यों कि- वह अन्यशक्ति की सहायता से रहित स्वतः सिद्ध है। जिससे वस्तु का ankurnagpal108@gmail.com

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( १६५ ) विनाश होता है, वह चाहे ज्ञान हो या अज्ञान, निश्चित ही वह शक्ति विशेष से उपबृंहित (बलप्राप्त) होता है, जैसे ईश्वर और योगियों का ज्ञान या मुद्गर आदि। भाव पदार्थ घट आदि जैसे ज्ञान से विनाश्य नहीं हैं, वैसे ही भावरूप अज्ञान भी, ज्ञान से विनाश्य नहीं है। यदि कहो कि-बाधक ज्ञान की उपस्थिति में, बाधक ज्ञान की उत्पत्ति पूर्व के भ्रम जन्य भय कम्पन आदि का विनाश देखा जाता है; सो ऐसी बात नहीं है कि ज्ञान से भय आदि का विनाश होता है अपितु भय आदि तो क्षणिक होते हैं, वे स्वतः ही विनष्ट हो जाते हैं, भय के कारण की निवृत्ति हो जाने पर फिर भय आदि की उत्पति होती ही नहीं। ज्ञान की तरह भय आदि भी, उत्पत्ति के कारण की स्थिति में ही रहते हैं, अनुपस्थिति में नही, इसलिए उनकी क्षणिकता सहज ही अवगत हो जाती है। भय आदि को यदि क्षणिक नहीं मानेंगे तो भय आदि का कारण मिथ्या ज्ञान जब धारावाहिक रूप से चलता रहता है, तो सभी ज्ञानों को भय आदि का हेतु मानना होगा, जिससे अनेक भय उपस्थित हो जावेंगे। स्वप्रागभावव्यतिरिक्तवस्त्वन्तरपूर्वकमिति व्यर्थविशेषणो- पादानेन प्रयोगकुशलताचाविष्कृता। अतोऽनुमानेनापि न भावरूपा- ज्ञान सिद्धिः। श्रुतितदर्थापत्तिभ्यामज्ञानासिद्धिरनन्तरमेव वक्ष्येत। मिथ्यार्थस्य हि मिथ्यैवोपादानं भवितुमर्हतीत्येतदपि “न विलक्षण- त्वात् इत्यधिकरणन्यायेन परिह्रियते। अतोऽनिर्वचनीयाज्ञानविषया न काचिदपि प्रतीतिरस्ति। प्रतीतिभ्रांतिबाधैरपि न तथाऽभ्यु- पगमनीयम्। प्रतीयमानमेव हि प्रतीतिभ्रांति बाधविषयः। आभिः प्रतीतिभिः प्रतीत्यन्तरेण चानुपलब्धामासां विषय इति न युज्यते कल्पयितुम्। भय को क्षणिक न मानने से अज्ञान के लिए किया गया “स्व प्रागभाव वरत्वन्तर पूर्वक” यह विशेषण व्यर्थ हो जायगा, केवल प्रयोग कुशलता का नमूना मात्र रह जायगा इससे सिद्ध होता है कि, अनुमान से अज्ञान के अस्तित्व की सिद्धि नहीं हो सकती। श्रुति और अर्थापत्ति प्रमाण भी उसे सिद्ध नहीं कर सकते, इसे आगे बतलावेंगे। मिथ्या पदार्थ ankurnagpal108@gmail.com

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( १६६ ) के उपादान भी मिथ्या होते हैं, इस कथन को भी "न विलक्षणत्वात्" सूत्र के अनुसार परिष्कृत करेगे अनिर्वचनीय अज्ञान की प्रतीति किसी भी प्रकार नही हो सकती। केवल प्रतीति या भ्रांति की बाधा से भी अज्ञान को स्वीकारा नही जा सकता क्यों कि जो वस्तु, प्रतीति या भ्रांति की बाधा के योग्य होती है, वह प्रतीयमान और विशेषोल्लेखनीय होती है। प्रतीति, भ्रांति या और भी किसी भी प्रकार की प्रतीति से, किसी ऐसी वस्तु की कल्पना नही की जा सकती जिसके प्रकाश की उपलब्धि न होती हो। शुक्त्यादिषु रजतादि प्रतीतेः, प्रतीतिकालेऽपि तन्नास्तीति बाधेन चान्यस्यान्यथामानायोगाच्च सदसदनिर्वचनीयमपूर्वमेवेदं रजतं दोषवशात् प्रतीयत इति, कल्पनीयमितिचेन्न, तत्कल्पनायमपि अन्यस्य अन्यथा भानस्य अवर्जनीयत्वात् अन्यथाभानाभ्युपगमादेव ख्यातिप्रवृत्तिबाधभ्रमत्वानां उपपत्ते रत्यन्तापरिदृष्टाकारणकवस्तु कल्पनायोगात् कल्प्यमानं हि इदमनिर्वचनीयम् । न तावदनिर्वनीय मिति प्रतीयते, अपितु परमार्थ रजतमित्येव । अनिर्वचनीयमित्येव चेत्, भ्रांतिबाधयोः प्रवृत्ते रप्यसंभवः । अतोऽन्यस्यान्यथाभानविरहे प्रतीतिवृत्तिबाधभ्रमत्वानाम्रनुपपत्ते`स्तस्यापरिहार्यत्वाच्च, शुक्त्या- दिरेव रजताद्याकारेण अवभासते, इति भवताभ्युपगंतव्यम् । शुक्ति आदि में रजत आदि की प्रतीति के समय ही "यह वह नहीं है" ऐसा बाधक ज्ञान हो जाता है, क्योकि-अन्य वस्तु का अन्य वस्तु में अन्य प्रकार का ज्ञान हुआ नहीं करता। सद् असद् अनिर्वचनीय अपूर्व को, रजत माना जाता हो अथवा रजत के रूप में इसकी कल्पना की जाती हो, सो बात नहीं है; अनिर्वचनीय कल्पना में भी अन्य वस्तु में अन्यथा ज्ञान अनिवार्य होता है; अन्यथा ज्ञान के स्वीकारने से ही, ख्याति, प्रवृत्ति, बाध, भ्रम आदि की उपपत्ति होती है, जिससे नितान्त अदृष्ट वस्तु की कल्पना होती है जिसके फलस्वरूप ही यह कल्पित अनिर्वचनी यता होती है। उस समय वह अनिर्वचनीय रूप से प्रतीत नही होती अपितु वास्तविक रजत के रूप में ही उसकी प्रतीति होती है। यदि ankurnagpal108@gmail.com

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( १६७ ) अनिर्वचनीय प्रतीति हो तो, भ्रांति और बाधा का प्रश्न ही नहीं उठता । भ्रमस्थल में अन्यथा भान न होने से तथा प्रतीति, वृत्ति, बाधा, भ्रम आदि की अनुपपत्ति से अनिवार्य शुक्ति ही, रजत की आकृति में अवभा- सित होती है, यह तो आपको भी मानना पड़ेगा । ख्यात्यन्तरवादिनां च सुदूरमपि गत्वाऽन्यथाभासोऽवश्याश्र- णीयः, असत्ख्याति पक्षे सदात्मना, आत्मख्यातिपक्षे अर्थात्मना, अख्यातिपक्षेऽपि अन्यविशेषणं अन्यविशेषणत्वेन, ज्ञानद्वयमेकत्वेन च, विषयासद्भावपक्षेऽपि विद्यमानत्वेन । अन्यान्य ख्याति वादियों को भी अनेक तर्कवितर्कों के बाद अन्त में अन्यथावभास (अन्यथा ख्याति) का आश्रय लेना पड़ता है । वह अवभास असत् ख्याति के पक्ष में सत् स्वरूप, आत्म ख्याति के पक्ष में ज्ञेय पदार्थ स्वरूप, अख्याति के पक्ष में भी अन्यविशेषण का अन्यविशेषण के रूप तथा दो ज्ञानों की एकता के रूप, एवं ज्ञेयविषय का अस्तित्व न स्वीकारने वालों के पक्ष में ज्ञेयवस्तु की विद्यमानता के रूप से होता है । किंच अनिर्वचनीयमपूर्वरजतमत्रजातमिति वदता तस्य जन्म- कारणं वक्तव्यम् , न तावत् प्रतीतिः, तस्यास्तद् विषयत्वेन तदुत्पत्तेः प्रागात्मलाभायोगात् । निर्विषया जाता तदुत्पाद्य तदेव विषयी करोतीति महतामिदमुपपादनम् । अथेन्द्रियादिगतो दोषः, तन्न तस्य पुरुषाश्रयत्वेनार्थगतकार्यस्योत्पादकत्वायोगात् । नापीन्द्रियाणि तेषां ज्ञानकारणत्वात् । नापि दुष्टानीन्द्रियाणि, तेषामपि स्वकार्यभूते ज्ञान एवहि विशेषकरत्वम् , अनादिमिथ्याज्ञानोपादानत्वं तु पूर्वमेव निरस्तम् । जो लोग “अनिर्वचनीयमपूर्वरजतमत्र जातम्” ऐसा कहते हैं उन्हें वैसी रजतोत्पत्ति का कारण बतलाना होगा । वे रजत की प्रतीति को तो रजतोत्पादक कही नहीं सकते, क्योंकि-उत्पत्ति की पूर्व उसकी प्रतीति संभव नहीं है । प्रतीति पहले निर्विषयक होती है, बाद में रजतोत्पत्ति करके उस रजत को अपना विषय बनाती है ऐसा तो बड़े लोग ही कह

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( १६८ ) सकते है। चक्षु आदि इन्द्रियगत दोष, रजतोत्पादक हों, ऐसा भी समझ में नहीं आता, क्योंकि वह द्रष्टा पुरुष के आश्रय से ही हो सकता है, किसी वस्तु में किसी अन्य वस्तु को पैदा कर देने की सामर्थ्य दृष्टा पुरुष में तो होती नहीं। केवल इन्द्रियों में भी ऐसी सामर्थ्य नहीं है, वे तो केवल ज्ञानोत्पादक हो होती है। विकृत इन्द्रियाँ भी नई वस्तु पैदा नहीं कर सकती, वे तो अपने कार्य (ज्ञान) में ही वैचित्र्य प्रतीति कराती हैं। अनादिमिथ्या ज्ञान तो ऐसे उत्पादन का उपादान हो नहीं सकता, ऐसा पहिले भी कह चुके हैं। किञ्च—अपूर्वमनिर्वचनीयमिदंवस्तुजातं रजतादिबुद्धि शब्दा- भ्यां कथमिव विषयी क्रियते, न घटादि बुद्धिशब्दाभ्याम् ? रजता- दिसादृश्यादिति चेत् तर्हि तत्सदृशमित्येवप्रतीति शब्दौस्याताम् । रजतादिजातियोगादिति चेत्, सा किं परमार्थ,भूता अपरमार्थभूता वा ? न तावत् परमार्थभूता, तस्या अपरमार्थान्वयायोगात् । नाप्यपरमार्थभूता, परमार्थान्वियायोगात् । अपरमार्थे परमार्थबुद्धि शब्दयो र्निर्वाहकत्वायोगाच्चेत्यलमपरिणत कुतर्क निरसनेन । एकबात और हे – जब जागतिक सभी वस्तुएं अनिर्वचनीय हैं तो सीप मे रजत शब्द का ही प्रयोग क्यों किया जाता है तथा रजत प्रतीति ही क्यों होती है सीप को घट, प्याला आदि क्यों नहीं कहा जाता, घट क्यों नहीं समझा जाता ? यदि कहो कि – रजत आदि के सादृश्य से ऐसा होता है; तो यह कहना चाहिए कि “यह उसके समान है” यदि रजत आदि जाति के योग से उक्त प्रकार की प्रतीति होती है, तो वह वास्तविक होती है या अवास्तविक ? वास्तविक तो हो नहीं सकती क्योंकि – उसे असत्य नहीं कहा जा सकता। अवास्तविक भी नहीं हो सकती, क्योकि – उसे फिर सत्य नहीं कहा जा सकता । अयथार्थ वस्तु में यथार्थ साधन की क्षमता भी नहीं होती । अस्तु तत्त्वहीन कुतर्कों के निराकरण से अब विरत होते हैं । अथवा—यथार्थ सर्वविज्ञानमिति वेदविदांमतम्, श्रुतिस्मृ- तिभ्यः सर्वस्य सर्वात्मत्वप्रतीतिः । बहुस्यामिति संकल्प पूर्वसृष्ट्- ankurnagpal108@gmail.com

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( १६६ )

यदि उपक्रमे, तासां त्रिवृतमेकैकामिति श्रुत्यैव चोदितम्। त्रिवृत्- करणमेवंहि प्रत्यक्षेणोपलभ्यते, यदग्नेरोहितं रूपं तेजसस्तद पामपि शुक्लं कृष्णं पृथिव्याश्चेत् अग्नावेव त्रिरूपता, श्रुत्यैव दर्शितात्तस्मात् सर्वे सर्वत्र संगताः पुराणे चैवमेवोक्तं वैष्णवे सृष्ट्- युपक्रमे। नानावीर्याः पृथग्भूतास्ततस्ते संहतिं बिना, नाशक्नुवन् प्रजास्स्रष्टुमसमागम्य कृत्स्नशः। समेत्यान्योन्यसंयोगं परस्पर समाश्रयः, “महदाद्या विशेषान्ता हि अण्डम्” इत्यादिना ततः। सूत्रकारोऽपिभूतानां त्रिरूपत्वं तथाऽवदत् , “त्र्यात्मकत्वात्तु भूयस्त्वात् ” इति तेनाभिधाभिदा। सोमाभावे च पूतीक ग्रहणं श्रुति चोदितम्, सोमावयवसद्भावाद इति न्यायविदो विदुः। ब्रीह्यभावे च नीवार ग्रहणं व्रीहिभावतः, तदेव सदृशं तस्य, यत्तद्द्रव्यैकदेशभाक्। शुक्त्यादौ रजतादेश्च भावः श्रुत्यैव बोधितः रूप्यशुक्त्यादि निर्देशभेदो भूयस्त्वहेतुकः। रूप्यादिसदृशश्चायं शुक्त्यादिरुपलभ्यते, अतस्तस्यात्र सद्भावः प्रतीतिरपि निश्चितः। कदाचिच्चक्षुरादेस्तु दोषाच्छुक्त्यंशवर्जितः, रजतांशो गृहीतोऽतो रजतार्थी प्रवर्त्तते। दोषहानौतु शुक्त्यंशे गृहीते तन्निवर्त्तते, अतोयथार्थं रूप्यादिविज्ञानं शुक्तिकादिषु। बाध्यबाधकभावोऽपि भूयस्त्वेनो- पपद्यते, शुक्तिभूयस्त्ववैकल्यसाकल्य ग्रहरूपतः। नातो मिथ्यार्थं सत्यार्थविषयत्वनिबन्धनः एवं सर्वस्य सर्वत्वे व्यवहार व्यवस्थितिः। वेदवेत्ता विद्वानों (बोधायन, नाथमुनि, यामुनाचार्य और द्रविडा चार्य) का मत है कि—श्रुति स्मृति शास्त्रानुसार सभी वस्तुएं ब्रह्मात्मक होने से यथार्थ सत्य हैं। सृष्टि के उपक्रम में सृष्टा ने जो “बहुस्यां” और “तासांत्रिवृतमेकैकाम्” का संकल्प किया था उसी से जगत् की ब्रह्मात्म- कता की पुष्टि होती है। त्रिवृत्करण और परस्पर मिश्रण का भाव प्रत्यक्ष दीखता है, अग्नि की रक्तिमा, जल की शुभ्रता तथा पृथिवी की

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( १७० )

श्यामता उसी के उदाहरण हैं। इसी प्रकार एक ही अग्नि में भी तीन रूप देखें जाते है। श्रुति ने बतलाया है, कि सारे भूत सभी में मिश्रित है। विष्णु पुराण के सृष्टि प्रकरण मे भी बतलाया गया कि विभिन्न शक्ति वाले भूत बिना एक साथ मिले प्रजा की सृष्टि करने मे असमर्थ है। सारे ही भूत परस्पर मिलकर एक दूसरे के आश्रय से, महत्तत्व से लेकर अंतिम स्थूल ब्रह्माण्ड तक की सृष्टि करते है। “त्र्यात्मकत्वात्तु भूयस्त्वाद्” सूत्र में सूत्रकार भी इसी तथ्य की पुष्टि करते हैं। वेदों में सोमलता के अभाव में पुतीक ग्रहण का विधान बतलाया गया है, मीमांसको का मत है कि, पुतीक में सोमलता अंश विद्यमान है इसीलिए उसके ग्रहण का विधान है। इसी प्रकार व्रीहि के अभाव में, व्रीहि अंश युक्त नीवार के ग्रहण का विधान है। शुक्ति आदि पदार्थ मे जो रजत आदि का भ्रम होता है, वह भी रजतांश के सद्भाव के कारण ही है, यह श्रुतिसम्मत विचार है। बाहुल्य के कारण रजत की, शुक्ति से पृथक प्रतीति होती है। शुक्ति में जो रजत की सदृशता दीखती है, उससे ही शुक्ति मे रजतांश का सद्भाव निश्चित होता है। कभी चक्षु इन्द्रिय के दोष के कारण शुक्ति का शुक्तिभाव तिरोहित हो जाता है, चक्षु केवल रजतांश को ग्रहण करते है, जिसके फलस्वरूप हम उस वस्तु को प्राप्त करने के लिए उद्यत होते हैं। उक्त दृष्टि दोष के नष्ट हो जाने पर शुक्ति का शुक्तित्व सुस्पष्ट परिलक्षित होने लगता है, तब हताश होकर लौट आते है। इस प्रकार रजत की होने वाली प्रतीति यथार्थ ही है, केवल शुक्ति अंश के आधिक्य के कारण बाध्य बाधक व्यवस्था होती है। जब शुक्ति के लघु अंश रजतभाव का ग्रहण होता है उसे ही भ्रम कहना चाहिए, जब उसके बहुलांश का ग्रहण होता है, उसे सत्य कहते है, प्रथम ज्ञान बाध्य और द्वितीय ज्ञान बाधक है। मिथ्या या असत्य की प्रतीति से बाध्य बाधक भाव होता हो सो बात नहीं है। हर वस्तु हर में मिश्रित है ऐसी व्यवहार की व्यवस्था करना समीचीन है। स्वप्ने च प्राणिनां पुण्यपापानुगुणं भगवतैव तत्तत्पुरुषमात्रा- नुभाव्याः तत्तत्कालावसानाः तथाभूताश्चार्थाः सृज्यन्ते तथा हि श्रुति स्वप्न विषय “न तत्र रथाःन रथयोगाः न पंथानो भवंति, ankurnagpal108@gmail.com