श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १६७ ) अनिर्वचनीय प्रतीति हो तो, भ्रांति और बाधा का प्रश्न ही नहीं उठता । भ्रमस्थल में अन्यथा भान न होने से तथा प्रतीति, वृत्ति, बाधा, भ्रम आदि की अनुपपत्ति से अनिवार्य शुक्ति ही, रजत की आकृति में अवभा- सित होती है, यह तो आपको भी मानना पड़ेगा । ख्यात्यन्तरवादिनां च सुदूरमपि गत्वाऽन्यथाभासोऽवश्याश्र- णीयः, असत्ख्याति पक्षे सदात्मना, आत्मख्यातिपक्षे अर्थात्मना, अख्यातिपक्षेऽपि अन्यविशेषणं अन्यविशेषणत्वेन, ज्ञानद्वयमेकत्वेन च, विषयासद्भावपक्षेऽपि विद्यमानत्वेन । अन्यान्य ख्याति वादियों को भी अनेक तर्कवितर्कों के बाद अन्त में अन्यथावभास (अन्यथा ख्याति) का आश्रय लेना पड़ता है । वह अवभास असत् ख्याति के पक्ष में सत् स्वरूप, आत्म ख्याति के पक्ष में ज्ञेय पदार्थ स्वरूप, अख्याति के पक्ष में भी अन्यविशेषण का अन्यविशेषण के रूप तथा दो ज्ञानों की एकता के रूप, एवं ज्ञेयविषय का अस्तित्व न स्वीकारने वालों के पक्ष में ज्ञेयवस्तु की विद्यमानता के रूप से होता है । किंच अनिर्वचनीयमपूर्वरजतमत्रजातमिति वदता तस्य जन्म- कारणं वक्तव्यम् , न तावत् प्रतीतिः, तस्यास्तद् विषयत्वेन तदुत्पत्तेः प्रागात्मलाभायोगात् । निर्विषया जाता तदुत्पाद्य तदेव विषयी करोतीति महतामिदमुपपादनम् । अथेन्द्रियादिगतो दोषः, तन्न तस्य पुरुषाश्रयत्वेनार्थगतकार्यस्योत्पादकत्वायोगात् । नापीन्द्रियाणि तेषां ज्ञानकारणत्वात् । नापि दुष्टानीन्द्रियाणि, तेषामपि स्वकार्यभूते ज्ञान एवहि विशेषकरत्वम् , अनादिमिथ्याज्ञानोपादानत्वं तु पूर्वमेव निरस्तम् । जो लोग “अनिर्वचनीयमपूर्वरजतमत्र जातम्” ऐसा कहते हैं उन्हें वैसी रजतोत्पत्ति का कारण बतलाना होगा । वे रजत की प्रतीति को तो रजतोत्पादक कही नहीं सकते, क्योंकि-उत्पत्ति की पूर्व उसकी प्रतीति संभव नहीं है । प्रतीति पहले निर्विषयक होती है, बाद में रजतोत्पत्ति करके उस रजत को अपना विषय बनाती है ऐसा तो बड़े लोग ही कह