श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १६८ ) सकते है। चक्षु आदि इन्द्रियगत दोष, रजतोत्पादक हों, ऐसा भी समझ में नहीं आता, क्योंकि वह द्रष्टा पुरुष के आश्रय से ही हो सकता है, किसी वस्तु में किसी अन्य वस्तु को पैदा कर देने की सामर्थ्य दृष्टा पुरुष में तो होती नहीं। केवल इन्द्रियों में भी ऐसी सामर्थ्य नहीं है, वे तो केवल ज्ञानोत्पादक हो होती है। विकृत इन्द्रियाँ भी नई वस्तु पैदा नहीं कर सकती, वे तो अपने कार्य (ज्ञान) में ही वैचित्र्य प्रतीति कराती हैं। अनादिमिथ्या ज्ञान तो ऐसे उत्पादन का उपादान हो नहीं सकता, ऐसा पहिले भी कह चुके हैं। किञ्च—अपूर्वमनिर्वचनीयमिदंवस्तुजातं रजतादिबुद्धि शब्दा- भ्यां कथमिव विषयी क्रियते, न घटादि बुद्धिशब्दाभ्याम् ? रजता- दिसादृश्यादिति चेत् तर्हि तत्सदृशमित्येवप्रतीति शब्दौस्याताम् । रजतादिजातियोगादिति चेत्, सा किं परमार्थ,भूता अपरमार्थभूता वा ? न तावत् परमार्थभूता, तस्या अपरमार्थान्वयायोगात् । नाप्यपरमार्थभूता, परमार्थान्वियायोगात् । अपरमार्थे परमार्थबुद्धि शब्दयो र्निर्वाहकत्वायोगाच्चेत्यलमपरिणत कुतर्क निरसनेन । एकबात और हे – जब जागतिक सभी वस्तुएं अनिर्वचनीय हैं तो सीप मे रजत शब्द का ही प्रयोग क्यों किया जाता है तथा रजत प्रतीति ही क्यों होती है सीप को घट, प्याला आदि क्यों नहीं कहा जाता, घट क्यों नहीं समझा जाता ? यदि कहो कि – रजत आदि के सादृश्य से ऐसा होता है; तो यह कहना चाहिए कि “यह उसके समान है” यदि रजत आदि जाति के योग से उक्त प्रकार की प्रतीति होती है, तो वह वास्तविक होती है या अवास्तविक ? वास्तविक तो हो नहीं सकती क्योंकि – उसे असत्य नहीं कहा जा सकता। अवास्तविक भी नहीं हो सकती, क्योकि – उसे फिर सत्य नहीं कहा जा सकता । अयथार्थ वस्तु में यथार्थ साधन की क्षमता भी नहीं होती । अस्तु तत्त्वहीन कुतर्कों के निराकरण से अब विरत होते हैं । अथवा—यथार्थ सर्वविज्ञानमिति वेदविदांमतम्, श्रुतिस्मृ- तिभ्यः सर्वस्य सर्वात्मत्वप्रतीतिः । बहुस्यामिति संकल्प पूर्वसृष्ट्- ankurnagpal108@gmail.com