भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

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( १६६ ) के उपादान भी मिथ्या होते हैं, इस कथन को भी "न विलक्षणत्वात्" सूत्र के अनुसार परिष्कृत करेगे अनिर्वचनीय अज्ञान की प्रतीति किसी भी प्रकार नही हो सकती। केवल प्रतीति या भ्रांति की बाधा से भी अज्ञान को स्वीकारा नही जा सकता क्यों कि जो वस्तु, प्रतीति या भ्रांति की बाधा के योग्य होती है, वह प्रतीयमान और विशेषोल्लेखनीय होती है। प्रतीति, भ्रांति या और भी किसी भी प्रकार की प्रतीति से, किसी ऐसी वस्तु की कल्पना नही की जा सकती जिसके प्रकाश की उपलब्धि न होती हो। शुक्त्यादिषु रजतादि प्रतीतेः, प्रतीतिकालेऽपि तन्नास्तीति बाधेन चान्यस्यान्यथामानायोगाच्च सदसदनिर्वचनीयमपूर्वमेवेदं रजतं दोषवशात् प्रतीयत इति, कल्पनीयमितिचेन्न, तत्कल्पनायमपि अन्यस्य अन्यथा भानस्य अवर्जनीयत्वात् अन्यथाभानाभ्युपगमादेव ख्यातिप्रवृत्तिबाधभ्रमत्वानां उपपत्ते रत्यन्तापरिदृष्टाकारणकवस्तु कल्पनायोगात् कल्प्यमानं हि इदमनिर्वचनीयम् । न तावदनिर्वनीय मिति प्रतीयते, अपितु परमार्थ रजतमित्येव । अनिर्वचनीयमित्येव चेत्, भ्रांतिबाधयोः प्रवृत्ते रप्यसंभवः । अतोऽन्यस्यान्यथाभानविरहे प्रतीतिवृत्तिबाधभ्रमत्वानाम्रनुपपत्ते`स्तस्यापरिहार्यत्वाच्च, शुक्त्या- दिरेव रजताद्याकारेण अवभासते, इति भवताभ्युपगंतव्यम् । शुक्ति आदि में रजत आदि की प्रतीति के समय ही "यह वह नहीं है" ऐसा बाधक ज्ञान हो जाता है, क्योकि-अन्य वस्तु का अन्य वस्तु में अन्य प्रकार का ज्ञान हुआ नहीं करता। सद् असद् अनिर्वचनीय अपूर्व को, रजत माना जाता हो अथवा रजत के रूप में इसकी कल्पना की जाती हो, सो बात नहीं है; अनिर्वचनीय कल्पना में भी अन्य वस्तु में अन्यथा ज्ञान अनिवार्य होता है; अन्यथा ज्ञान के स्वीकारने से ही, ख्याति, प्रवृत्ति, बाध, भ्रम आदि की उपपत्ति होती है, जिससे नितान्त अदृष्ट वस्तु की कल्पना होती है जिसके फलस्वरूप ही यह कल्पित अनिर्वचनी यता होती है। उस समय वह अनिर्वचनीय रूप से प्रतीत नही होती अपितु वास्तविक रजत के रूप में ही उसकी प्रतीति होती है। यदि ankurnagpal108@gmail.com