भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

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( १५६ ) यह अज्ञान स्वयं अनादि है अतः ब्रह्म की स्वयं प्रकाशता और ब्रह्म- स्वरूपतिरस्कृति दोनों को एक साथ करता है, इसलिए अनवस्था आदि दोष नहीं हो सकते; ऐसा कथन भी असंगत है। स्वानुभवस्वरूप ब्रह्म की स्वरूप तिरस्कृति के बाद उसकी स्वयं प्रकाशता की संभावना की बात एक कल्पना मात्र है। यदि कहो कि—अज्ञान के अतिरिक्त किसी अन्य वस्तु से ब्रह्मस्वरूप की तिरस्कृति होती है; तो अज्ञान की अनादिता की बात कट जाती है और वही पूर्वोक्त अनवस्था दोष आ जाता है। ब्रह्म के अनावृत स्वरूप की ही अज्ञान साक्षिता मानते हो तो, ब्रह्म की अनुभवरूपता समाप्त हो जाती है अपि च—अविद्यया ब्रह्मणि तिरोहिते तद्ब्रह्म न किंचिदपि प्रकाशते ? उत् किंचित् प्रकाशते ? पूर्वस्मिन्कल्पे प्रकाशमात्र स्वरूपस्य ब्रह्मणोऽप्रकाशे तुच्छतापत्तिरसकृदुक्ता। उत्तरस्मिन् कल्पे सच्चिदानन्दैकरसे ब्रह्मणि कोऽयमंशस्तिरस्कृते, को वा प्रका- शते ? निरंशे निर्विशेषे प्रकाशमात्रे वस्तुन्याकारद्वयासम्भवेन तिर- स्कारः प्रकाशश्च युगपत् न संगच्छेते। अथ सच्चिदानन्दैकरसंब्रह्म अविद्यया तिरोहितस्वरूपमविशदमिवलक्ष्यत इति प्रकाशमात्र स्वरूपस्य विशदताऽविशदता वा किं रूपा। एतदुक्तं भवति यस्सां श विशेषः प्रकाशविषयः तस्य सकलावभासो विशदावभासः। कति- पय विशेषरहितावभासश्चाविशदाभासः। तत्र च आकारोऽप्रति- पन्नस्तस्मिन्नंशे प्रकाशाभावादेव प्रकाशावैशद्यं न विद्यते। यच्चांशः प्रतिपन्नस्तस्मिन्नंशे तद्विषय प्रकाशो विशद एव। अतः सर्वत्र प्रका शांशेऽवैशद्यं न संभवति। विषयेऽपि स्वरूपे प्रतीयमाने तद्गत कतिपय विशेषाप्रतीतिरेवावैशद्यम्। तस्मादविषयं निर्विशेषे प्रकाशमात्रे ब्रह्मणि स्वरूपे प्रकाशमाने तद्गत कतिपय विशेषाप्रतीतिरूपावैशद्यं नानाज्ञानकार्यं न संभवति। एक बात और विचारणीय है—अविद्या से तिरोहित ब्रह्म में कुछ प्रकाश रहता है या नहीं ? यदि नहीं रहता तो एक मात्र प्रकाश स्वरूप ankurnagpal108@gmail.com