भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

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किं च--ब्रह्मणोऽज्ञानानुभवः किं स्वतोऽन्यतो वा ? स्वतः- चेत् अज्ञानानुभवस्य स्वरूपप्रयुक्तत्वेनानिर्मोक्षस्स्यात् । अनुभूति- स्वरूपस्य ब्रह्मणोऽज्ञानानुभव स्वरूपत्वेन मिथ्या रजतबाधक ज्ञानेन रजतानुभवस्यापि, निवृत्तिवत् निवर्त्तक ज्ञानेनाज्ञानानुभूतिरूप ब्रह्म स्वरूपनिवृत्तिर्वा । अन्यतश्चेत् किं तदन्यत् ? अज्ञानान्तरमिति- चेत् अनवस्था स्यात् ब्रह्म तिरस्कृत्यैव स्वयमनुभवविषयो भवतीति तथा सतीदमज्ञानं काचादिवत् स्वसत्तया ब्रह्मतिरस्करोति, इति ज्ञानबाध्यत्वं अज्ञानस्य न स्यात् । यह बतावें कि--ब्रह्म की उक्त अज्ञानानुभूति स्वतः होती है या दूसरे के द्वारा होती है ? यदि स्वतः होती है तो वह सदा होती रहेगी कभी छूटेगी ही नही जिसके फलस्वरूप, अज्ञानानुभव स्वरूप से प्रतीत होने वाला वह ब्रह्म शुक्ति रजत की तरह, अज्ञान निवर्त्तक तत्वज्ञान के द्वारा अज्ञान के साथ ही साथ तदनुभवरूप होने से स्वरूपतः समाप्त हो जायगा। यदि कहो कि नहीं उसकी वह अज्ञानानुभूति परतः होती है, तो वह परवस्तु क्या है ? यदि वह अज्ञान से भिन्न कोई और दूसरा अज्ञान है, तो फिर अनवस्था दोष उपस्थित होगा (अज्ञान के लिए अज्ञानों की ही कल्पना करते रह जाओगे) यदि कहो कि--अज्ञान ब्रह्म को आवृत करने के बाद अनुभूत होता है, तो काच आदि नेत्र रोगों की तरह जो कि--नेत्रों को आवृत कर दर्शन शक्ति समाप्त कर प्रतीत होते हैं, वैसे ही यह भी हुआ । ऐसा अज्ञान तो, तत्त्वज्ञान के द्वारा हटाया नहीं जा सकता । अथेदमज्ञानं स्वयमनादि ब्रह्मणः स्वसाक्षित्वं ब्रह्मस्वरूपति- रस्कृतिं च युगपदेव करोति, अतो नानवस्थादयो दोषा इति नैतत् । स्वानुभवस्वरूपस्य ब्रह्मणः स्वरूपतिरस्कृतिमंतरेण साक्षित्वापादना- योगात् । हेत्वंतरेण तिरस्कृतमिति चेत् तर्हि अस्यानादित्वं मपा- स्तम् । अनवस्था च पूर्वोक्ता । अतिरस्कृत स्वरूपस्यैव साक्षित्वा- पादेन ब्रह्मणः स्वानुभवैकतानता न स्यात् । ankurnagpal108@gmail.com