भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

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( १६० ) ब्रह्म में फिर रही क्या जाता है, वह तो एक तुच्छ वस्तु रह जायगा। यदि प्रकाश रहता है, तो सच्चिदानन्दैकरस ब्रह्म में कौन सा अंश छिपा रहता है, और कौन सा प्रकाशित रहता है ? अखंड निर्विशेष प्रकाश- मात्र ब्रह्म में आवरण और प्रकाश ये दो वस्तुएं एक साथ नहीं रह सकतीं यदि सच्चिदानन्द ब्रह्म अविद्या से आवृत होकर मलिन दीखता है तो, एक मात्र प्रकाश स्वरूप उसमें विशदता और मलिनता कैसी ? कहने का तात्पर्य यह है कि—जो वस्तु अंशयुक्त, सविशेष, अन्य प्रकाश होती है, वही पूर्ण या अपूर्ण प्रकाश वाली हो सकती है। विशेष प्रकाश से रहित, सूक्ष्म अविशद प्रकाश भी उसी का हो सकता है। उसका जो अंश अविकसित है, उसी में प्रकाश का अभाव होने से प्रकाश की विशदता नहीं रहती और जो अंश विकसित है, उसमें उसका विशद प्रकाश रहता है। इस प्रकार सभी जगह प्रकाशांश का वैशद्य संभव नहीं है। जो वस्तु स्वरूप से प्रतीति का विषय होती है, उसका जो अंश प्रतीतिगम्य नहीं होता, उसी के प्रकाश को अविशद कहा जा सकता है। इन्द्रियों का अविषय, निर्विशेष प्रकाशमात्र ब्रह्म जब स्वयं प्रकाश है तो उसके किसी विशेष अंश की अप्रतीतिजन्य अविशदता का कोई प्रश्न ही नहीं उठता (अज्ञान जन्य आवरण उसमें संभव ही नहीं है) अपि च—इदमविद्याकार्यमवैशद्यं तत्वज्ञानोदयान्निवर्त्तते न वा ? अनिवृत्तावपवर्गाभावः । निवृत्तौ च वस्तु किं रूपमिति विवेचनीयम् विशदस्वरूपमिति चेत् तद्विशद स्वरूपं प्रागस्ति न वा ? अस्ति चेत्, अविद्याकार्यमवैशद्यम् तन्निवृत्तिश्च न स्याताम् नोचेत् मोक्षस्य कार्यतया अनित्यता स्यात् । एक बात और भी है कि—यह अविद्या जन्य अविशदता, तत्वज्ञान से निवृत्त होती है या नहीं ? यदि नहीं होती तो मोक्ष नहीं हो सकता यदि होती है, तो उस वस्तु का क्या स्वरूप होता है यह विवेचनीय है। यदि वह निवृत्त वस्तु विशद होती है तो निवृत्ति के पूर्व वह विशद थी या नहीं ? यदि थी तो, अविद्या का कार्य अविशदता और उसकी निवृत्ति ये दोनों ही होना असंभव है, इनका तो प्रश्न ही नहीं उठता। यदि नहीं ankurnagpal108@gmail.com