श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
by भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य)
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Read in context७ आचार्य चरण ने प्रपत्ति भक्ति की महत्ता के साथ पूर्व मीमांसा को भी जब उत्तर मीमांसा का ही अंग माना है तब कर्मकाण्ड की महत्ता भी तो उनको स्वीकृत थी, अतः दोनों ही धारायें प्राचीन हैं यह तो कालान्तर में तिलक धारण आदि कुछ परिवर्त्तनों के साथ दोनों ने अपने को पृथक् करके विवाद प्रारम्भ कर दिया है। सही बात तो यह है कि वैष्णव संप्रदायों की नींव तो रागात्मिका भक्ति ही है उसी पर इनके प्रासाद खड़े हैं, आचार्य श्री रामानुज के प्रथम जितने भी आलवार सन्त हुए वे सभी गाढानुरागी थे आचार्य चरण उनसे पूर्णतः प्रभावित थे। कुमारिल आदि मीमांसकों के मत जब प्रबल हुए तो कर्मकाण्ड की अर्हता भक्तों को स्वीकारनी पड़ी। पंद्रहवीं सोलहवीं शताब्दी में पूरे भारत में सभी वैष्णव संप्रदायों में पुनः उनकी असली प्रकृति उभड़ी और वे सारे के सारे प्रभु चरणों की गाढानुरक्ति में निमग्न हो गए अतः कर्मकाण्ड में शिथिलता आना स्वाभाविक ही था। भक्तिमार्ग तो समन्वयात्मक है उसमें सभी का निर्वाह सदा से होता रहा है इसलिए भगवान ने स्वयं ही श्रीमद्भागवत में उद्धव को उपदेश देते हुए भक्ति मार्ग के इस वैशिष्ट्य का स्पष्ट उल्लेख किया है—“न निर्विण्णः नाऽतिसक्तः भक्तियोगोऽस्य सिद्धिदः” अर्थात् भक्ति योग उसी को लाभदायी होता है जो कि न तो एकदम ही कर्म का त्याग कर देता है और न एकदम ही कर्म में आसक्त हो जाता है। इस भगवदाज्ञा को मानकर पारस्परिक मतभेद को त्यागकर मित्रतापूर्वक प्रभु कृपा प्राप्त करने के लिए प्रयास करना चाहिए, यही भक्ति मार्ग की शोभा है विशिष्टाद्वैत तो माया को भी भगवान का ही अंग मानता है, तभी तो वह वास्तविक अद्वैत वादी होने का दावा करता है इसमें भेद भाव का अवसर ही नहीं है। आचार्य चरण ने अपने सिद्धान्त और उपासना की पुष्टि के लिए लगभग पचास ग्रन्थों की रचना की है जो कि इस प्रकार हैं— (१) श्री भाष्य (२) विशिष्टाद्वैत भाष्य (३) वेदान्त संग्रह (४) वेदान्त सार (५) वेदान्त दीप · ६) वेदान्त तत्त्वसार (७) वेदार्थ संग्रह (८) गीताभाष्य (६) श्वेताश्वतरोपनिषद् भाष्य (१०) मुण्डकोपनिषद् भाष्य (११) प्रश्नोपनिषद् भाष्य (१२) ईशोपनिषद् भाष्य (१३) विष्णु सहस्रनाम भाष्य (१४) न्यास परि शुद्धि (१५) न्याय सिद्धाञ्जन (१६) पाञ्चरात्र रक्षा (१७) योग सूत्र भाष्य (१८) मणि दर्पण (१६) रत्न प्रदीप (२०) न्याय रत्नमाला (२१) गुण रत्नकोष (२२) मति मानुष (२३) देवता पारम्य (२) चक्रोल्लास (२५) कूट संदोह (२६) वार्त्ता माला (२७) शत दूषणी (२८) गद्य त्रय (२६) शरणागति गद्य (३०) ankurnagpal108@gmail.com