श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
by भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य)
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Read in context५५ ५. बद्ध, मुक्त आदि अवस्थाओं वाले जीव की आनन्द- मयता से अनुपपत्ति तथा आनन्दमय से उसका भेद दिग्दर्शन । सृष्टि विषयक संकल्प वाले सृष्टा का आनन्दमय के रूप में समर्थन और उसी हेतु से जीवात्मा की पृथकता का प्रतिपादन । आनन्दमय ब्रह्म की प्राप्ति से जीव के आनन्दी होने के आधार पर जीव की भिन्नता का उपपादन । —पृ ३०६-५४ ७ अन्तराधिकरण (सूत्र २१-२२) १. पूर्वपक्ष--आदित्य मण्डलस्थ और नेत्रस्थ पुरुष की जीवभाव और देवभाव आदि रूपों में संभावना । २. (सिद्धान्त)--आदित्य और नेत्रमध्यवर्ती पुरुष की परब्रह्मता की उपस्थापना । परब्रह्म की सगुणता तथा भक्तानुग्रह से विचित्र जगदाकार के रूप में आविर्भावता का वर्णन । भेदोक्ति के आधार पर अक्षि और आदित्यपुरुष की जीव से पृथकता का विवेचन । —पृ०३५४-६३ ८ आकाशाधिकरण (सूत्र २३) १. पूर्वपक्ष--आकाश शब्द की भूताकाश रूपक शंका । २. (सिद्धान्त) आकाश शब्द की परब्रह्मता का प्रतिपादन । —पृ०३६३-७० ९ प्राणाधिकरण (सूत्र २४) आकाश के दृष्टान्त से प्राण शब्द की परमार्थता का निरूपण । —पृ०३७०-७१ १० ज्योतिरधिकरण (सूत्र २५-२८) १. ज्योति शब्द की आदित्य आदि अर्थों में शंका । २. (सिद्धान्त) ज्योति शब्द की परब्रह्मता का उपपादन । गायत्री छन्दोल्लेख्य ज्योति शब्द की अब्रह्मता की शंका का निरास । भूत, पृथिवी, शरीर और हृदय ankurnagpal108@gmail.com