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श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

by भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य)

DevanagariHindipublished696 pages

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२६ ९. कृत्स्न प्रसक्ति अधिकरण (सूत्र २६-३१) १. पूर्वपक्ष—निरवयव ब्रह्म के सर्वांश की जगदाकार परिणति की संभावना में संशय तथा उसकी निरा- कारता स्वीकारने में आपत्ति । २. (सिद्धान्त)—ब्रह्म की निराकारता के होते हुए भी शास्त्रानुसार असंपूर्ण परिणाम का समर्थन । ब्रह्म- निष्‍ठ शक्ति वैचित्र्य के आधार पर परिणाम वैचित्र्य का उपपादन । त्रिगुणात्मिका प्रकृति कारणतावादी सांख्यमत में दोष प्रसक्ति परमेश्वर की सर्वशक्तिमत्ता बोधक श्रुति का दिग्दर्शन उपयुक्त साधनों के अभाव में भी ब्रह्म की सर्वकारणता का पुष्टि पुष्ट समाधान । —पृ० ७३३-३८ १०. प्रयोजनवत्त्वाधिकरण (सूत्र ३२-३६) १. निष्प्रयोजन सृष्टि कार्य में पूर्ण काम ब्रह्म की अप्रवृत्ति का समर्थन । ब्रह्म कृत जागतिक सृष्टि की लीलारूपता का वर्णन । २. सृष्टि कार्य में ब्रह्म की विषम दर्शिता और निर्दयता की शंका । जीव के कर्मानुसार जगत् सृष्टि वैचित्र्य के सिद्धान्त से ब्रह्म प्रसक्त वैषम्य और नैर्घृण्य दोषों का परिहार । सृष्टि के आदि में कर्माभाव की शंका । सृष्टि की अनादिता के हेतु से कर्म के सद्भाव का प्रतिपादन । ब्रह्म सृष्टि की अनादिता के हेतु से कर्म के कारणत्वोपपादक धर्म सद्भाव का निरूपण । —पृ० ७३८-४३, [द्वितीय पाद] १ रचनानुपपत्त्यधिकरण (सूत्र १-६) १. सांख्यमत तत्त्व वर्णन और प्रकृति की जगत् कारणता का समर्थन स्वमतानुसार प्रकृति की जगत्कारणता की अनुपपत्ति दिखलाते हुए सांख्य मत खंडन । ankurnagpal108@gmail.com