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श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

by महर्षि वेदव्यास

DevanagariHindipublished833 pages

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| १२४ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग | | :--- | :--- |

श्लोकअर्थ
अङ्गुल्यग्रेण वै धीमांस्तर्पयेद्देवतर्पणम्।<br>ऋषींन् कनिष्ठाङ्गुलिना श्रोत्रियः सर्वसिद्धये ॥ १३<br>पितॄंस्तु तर्पयेद्विद्वान् दक्षिणाङ्गुष्ठकेन तु।सभी सिद्धियोंकी प्राप्तिके लिये बुद्धिमान् तथा विद्वान् वेदज्ञ ब्राह्मणको चाहिये कि वह अंगुलिके अग्रभागसे देवतर्पण, कनिष्ठ अँगुलीसे ऋषितर्पण एवं दाहिने अँगूठेसे पितृतर्पण सम्पन्न करे ॥ १३<sup></sup>/<sub></sub>
तथैवं मुनिशार्दूल ब्रह्मयज्ञं यजेद् द्विजः॥ १४<br>देवयज्ञं च मानुष्यं भूतयज्ञं तथैव च।<br>पितृयज्ञं च पूतात्मा यज्ञकर्मपरायणः॥ १५हे मुनिश्रेष्ठ! इसी प्रकार यज्ञकर्मपरायण तथा पवित्रात्मा द्विजको ब्रह्मयज्ञ, देवयज्ञ, मनुष्ययज्ञ, भूतयज्ञ एवं पितृयज्ञ करना चाहिये ॥ १४-१५ ॥
स्वशाखाध्ययनं विप्रा ब्रह्मयज्ञ इति स्मृतः।<br>अग्नौ जुहोति यच्चान्नं देवयज्ञ इति स्मृतः ॥ १६<br>सर्वेषामेव भूतानां बलिदानं विधानतः।<br>भूतयज्ञ इति प्रोक्तो भूतिदः सर्वदेहिनाम् ॥ १७<br>सदारान् सर्वतत्त्वज्ञान् ब्राह्मणान् वेदपारगान्।<br>प्रणम्य तेभ्यो यद्दत्तन्नं मानुष उच्यते ॥ १८<br>पितॄनुद्दिश्य यद्दत्तं पितृयज्ञः स उच्यते।<br>एवं पञ्च महायज्ञान् कुर्यात्सर्वार्थसिद्धये ॥ १९हे विप्रो! अपनी शाखाका अध्ययन करना ब्रह्मयज्ञ कहा गया है तथा अग्निमें अन्न आदिका हवन देवयज्ञ कहा गया है। उसी प्रकार सभी भूतोंके लिये विधिपूर्वक बलि देना भूतयज्ञ कहा जाता है; यह भूतयज्ञ प्राणियोंको ऐश्वर्य प्रदान करनेवाला है। वेदवेत्ता एवं तत्त्वज्ञ ब्राह्मणोंको उनकी भार्यासहित सभीको प्रणाम करके उन्हें अन्नका दान करना मनुष्ययज्ञ कहा जाता है। पितरोंके निमित्त जो श्राद्ध आदि सम्पन्न किया जाता है, उसे पितृयज्ञ कहते हैं। इस प्रकार सभी मनोरथोंकी सिद्धिके लिये इन पाँच महायज्ञोंको करना चाहिये ॥ १६-१९ ॥
सर्वेषां शृणु यज्ञानां ब्रह्मयज्ञः परः स्मृतः।<br>ब्रह्मयज्ञरतो मर्त्यो ब्रह्मलोके महीयते ॥ २०<br>ब्रह्मयज्ञेन तृप्यन्ति सर्वे देवाः सवासवाः।<br>ब्रह्मा च भगवान् विष्णुः शङ्करो नीललोहितः ॥ २१<br>वेदाश्च पितरः सर्वे नात्र कार्या विचारणा।सुनिये, ब्रह्मयज्ञ सभी यज्ञोंसे श्रेष्ठ यज्ञ कहा गया है। ब्रह्मयज्ञ करनेवाला मनुष्य ब्रह्मलोकमें वास करते हुए आनन्दित होता है। ब्रह्मयज्ञसे इन्द्रसमेत सभी देवता, ब्रह्मा, भगवान् विष्णु, नीललोहित शंकरजी, सभी वेद तथा पितृगण संतुष्ट हो जाते हैं; इसमें किसी प्रकारकी शंका नहीं करनी चाहिये ॥ २०-२१<sup></sup>/<sub></sub>
ग्रामाद् बहिर्गंतो भूत्वा ब्राह्मणो ब्रह्मयज्ञवित् ॥ २२<br>यावच्चदृष्टमभवदुटजानां छदं नरः।<br>प्राच्यामुदीच्यां च तथा प्रागुदीच्यामथापि वा ॥ २३<br>पुण्यमाचमनं कुर्याद् ब्रह्मयज्ञार्थमेव तत्।ब्रह्मयज्ञ करनेके लिये ब्रह्मयज्ञवेत्ता ब्राह्मणको गाँवसे उतनी दूर बाहर चले जाना चाहिये, जहाँसे झोपड़ियोंकी छततक दिखायी न दे। वहाँ बैठकर पूर्व, उत्तर अथवा ईशान दिशाकी ओर मुख करके शुद्धिके लिये आचमन करना चाहिये ॥ २२-२३<sup></sup>/<sub></sub>
प्रीत्यर्थं च ऋचां विप्राः त्रिः पीत्वा प्लाव्य प्लाव्य च ॥ २४<br>यजुषां परिमृज्यैवं द्विः प्रक्षाल्य च वारिणा।<br>प्रीत्यर्थं सामवेदानामुपस्पृश्य च मूर्धनि ॥ २५<br>स्पृशेदथर्ववेदानां नेत्रे चाङ्गिरसां तथा।<br>नासिके ब्राह्मणोऽङ्गानां क्षाल्य क्षाल्य च वारिणा ॥ २६हे ब्राह्मणो! ऋग्वेदाधिष्ठातृ देवताकी प्रीतिकाके लिये तीन बार चुलुकभर जल पीकर, यजुर्वेदाधिष्ठातृ देवताकी प्रीतिके लिये जलद्वारा दो बार प्रक्षालन एवं परिमार्जन करके, सामवेदाधिष्ठातृ देवताकी प्रीतिके लिये आचमन करके मूर्धाका स्पर्श करे। आंगिरससम्बन्धी अथर्ववेदके अधिष्ठातृ देवताकी प्रीतिकाके लिये नेत्रोंका स्पर्श करे। ब्राह्मणग्रन्थों, शिक्षा-कल्प आदि वेदांगोंकी प्रीतिके लिये
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