भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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अध्याय २६ ] भगवती गायत्रीका आवाहन तथा जप····भस्मस्नान एवं मन्त्रस्नान १२५


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
अष्टादशपुराणानां ब्रह्माद्यानां तथैव च।<br>तथा चोपपुराणानां सौरादीनां यथाक्रमम्॥ २७<br><br>पुण्यानामितिहासानां शैवादीनां तथैव च।<br>श्रोत्रे स्पृशेद्धि तुष्ट्यर्थं हृद्देशं तु ततः स्पृशेत्॥ २८<br><br>कल्पादीनां तु सर्वेषां कल्पवित्कल्पवित्तमाः।नासिकाको जलसे पवित्रकर स्पर्श करे। क्रमशः ब्रह्म आदि अठारह पुराणों, सौर आदि उपपुराणों, पवित्र इतिहासग्रन्थों तथा शैवादि आगमग्रन्थोंकी तुष्टिके लिये कानका स्पर्श करे। तदनन्तर हृदयदेशका स्पर्श करे। हे श्रेष्ठ कल्पवेत्ताओ! सभी कल्पग्रन्थोंके लिये भी पूर्वोक्त क्रिया करनी चाहिये॥ २४—२८ १/२॥
एवमाचम्य चास्तीर्य दर्भपिञ्जूलमात्मनः॥ २९<br><br>कृत्वा पाणितले धीमानात्मनो दक्षिणोत्तरम्।<br>हेमाङ्गुलीयसंयुक्तो ब्रह्मबन्धुयुतोऽपि वा॥ ३०<br><br>विधिवद् ब्रह्मयज्ञं च कुर्यात्सूत्री समाहितः।<br>अकृत्वा च मुनिः पञ्च महायज्ञान् द्विजोत्तमः॥ ३१<br><br>भुक्त्वा च सूकराणां तु योनौ वै जायते नरः।<br>तस्मात्सर्वप्रयत्नेन कर्तव्याः शुभमिच्छता॥ ३२बुद्धिमान् एवं संयमी श्रोत्रियको समाहितचित्त होकर इस प्रकार आचमन करके अपने दक्षिणसे उत्तरकी ओर कुश बिछाकर उसपर हाथ रखकर अपने हाथकी अँगुलीमें कुशाकी पवित्री अथवा सोनेकी अँगूठी धारणकर विधिपूर्वक ब्रह्मयज्ञ करना चाहिये। मुनि तथा द्विज होकर जो मनुष्य इन पाँच महायज्ञोंको किये बिना भोजन करता है, वह सूकरकी योनिमें जन्म लेता है। अतः अपने कल्याणके इच्छुक व्यक्तिको विशेष प्रयत्नके साथ इन्हें सम्पन्न करना चाहिये॥ २९—३२॥
ब्रह्मयज्ञादथ स्नानं कृत्वादौ सर्वथात्मनः।<br>तीर्थं सङ्गृह्य विधिवत्प्रविशेच्छिविरं वशी॥ ३३<br><br>बहिरेव गृहात्पादौ हस्तौ प्रक्षाल्य वारिणा।<br>भस्मस्नानं ततः कुर्याद्विधिवद्देहशुद्धये॥ ३४<br><br>शोध्य भस्म यथान्यायं प्रणवेनाग्निहोत्रजम्।<br>ज्योतिः सूर्य इति प्रातर्जुहुयादुदिते यतः॥ ३५<br><br>ज्योतिर्गनिस्तथा सायं सम्यक् चानुदिते मृषा।<br>तस्मादुदितहोमस्थं भसितं पावनं शुभम्॥ ३६ब्रह्मयज्ञके पश्चात् डुबकी लगाकर स्नान करके इन्द्रियोंको वशमें रखनेवाले उस पुरुषको चाहिये कि तीर्थका जल लेकर विधिवत् शिविरमें प्रवेश करे। घरके बाहर जलसे हाथ-पैर धोकर पुनः देहकी शुद्धिके लिये विधिपूर्वक भस्मस्नान करना चाहिये। इसके लिये अग्निहोत्रका भस्म लेकर नियमानुसार प्रणवसे उसका शोधन कर लेना चाहिये। सूर्यके ज्योतिस्वरूप होनेसे सूर्योदयके पश्चात् प्रातःकाल 'ज्योतिः सूर्य०' इस मन्त्रसे और सायंकालमें 'ज्योतिराग्न०' इस मन्त्रसे हवन करना चाहिये। सूर्योदय हुए बिना किया गया अग्निहोत्र व्यर्थ होता है। इसलिये सूर्योदयके बाद किये गये हवनकी भस्म पवित्र तथा कल्याणप्रद होती है॥ ३३—३६॥
नास्ति सत्यसमं यस्मादसत्यं पातकं च यत्।<br>ईशानेन शिरोदेशं मुखं तत्पुरुषेण च॥ ३७<br><br>उरोदेशमघोरेण गुह्यं वामेन सुव्रताः।<br>सद्येन पादौ सर्वाङ्गं प्रणवेनाभिषेचयेत्॥ ३८सत्यके समान कुछ भी नहीं है और असत्यसे बड़ा कोई पाप नहीं होता है। हे सुव्रतो! ईशानमन्त्रसे सिर, तत्पुरुषसे मुख, अघोरसे वक्षःस्थल, वामदेवसे गुह्यस्थान, सद्योजातसे दोनों पैर तथा प्रणवसे सभी अंगोंका भस्माभिषेचन करना चाहिये॥ ३७-३८॥
ततः प्रक्षालयेत्पादं हस्तं ब्रह्मविदां वरः।<br>व्यपोह्य भस्म चादाय देवदेवमनुस्मरन्॥ ३९ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ पुरुषको इस भाँति भस्म-स्नान करके हाथ-पैर धोकर हाथमें कुश लेकर देवदेव