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श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

by महर्षि वेदव्यास

DevanagariHindipublished833 pages

Page 143 of 834

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Page 143

अध्याय ३० ] शिवाराधनाके माहात्म्यमें श्वेतमुनिका आख्यान १४१


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
ततश्चोर्ध्वं चरेदेवं यतिः शिवविमुक्तये।<br>व्रतेनानशनेनापि तोयवृत्त्यापि वा पुनः॥ ७८<br><br>पर्णवृत्त्या पयोवृत्त्या फलवृत्त्यापि वा यतिः।<br>एवं जीवनमृतो नो चेत्षण्मासाद्द्वत्सरात्तु वा॥ ७९<br><br>प्रस्थानादिकमायासं स्वदेहस्य चरेद्यतिः।<br>शिवसायुज्यमाप्नोति कर्मणाप्येवमाचरन्॥ ८०<br><br>सद्योऽपि लभते मुक्तिं भक्तियुक्तो दृढव्रतः॥ ८१<br><br>त्यागेन वा किं विधिनाप्यनेन<br>भक्तस्य रुद्रस्य शुभैर्व्रतैश्च।<br>यज्ञैश्च दानैर्विविधैश्च होमै-<br>र्लब्धैश्च शास्त्रैर्विविधैश्च वेदैः॥ ८२<br><br>श्वेतेनैवं जितो मृत्युर्भवभक्त्या महात्मना।<br>वोऽस्तु भक्तिर्महादेवे शङ्करे परमात्मनि॥ ८३पाँच आहुति देनी चाहिये॥ ७७॥<br><br>इसके पश्चात् यतिको शिवसायुज्यरूपी विमुक्तिके लिये आगेकी भी साधना करनी चाहिये। इसके लिये छः माह अथवा वर्षपर्यन्त यति अनशन करे अथवा जल पीकर या पत्ते खाकर या दूध पीकर या फल खाकर जीवन-निर्वाह करे। ऐसा करनेपर यदि मृत्यु नहीं हुई और वह जीवित रहता है, तो उसे अपने देहके प्रस्थान आदि अर्थात् स्थूल शरीरके त्यागका प्रयास करना चाहिये। ऐसा आचरण करते हुए वह यति अपने कर्मसे भी शिवसायुज्य प्राप्त कर लेता है॥ ७८–८०॥<br><br>परंतु हे दृढव्रती मुनियो! शिवजीमें भक्ति रखनेवाला प्राणी शीघ्र ही मुक्ति प्राप्त कर लेता है। महादेवजीके भक्तको त्याग, विधि, महान् व्रतों, यज्ञों, विविध प्रकारके दानों, होमों, विविध शास्त्रों तथा वेदोंसे क्या प्रयोजन! महान् आत्मावाले श्वेतमुनिने महादेवकी भक्तिसे ही मृत्यूतकको जीत लिया था। अतएव परमेश्वर महादेव शिवजीके प्रति आपलोग भी भक्तिपरायण हों॥ ८१–८३॥

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे देवदारुवनवृत्तान्तवर्णनं नामैकोनत्रिंशोऽध्यायः ॥ २९ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'देवदारुवनवृत्तान्तवर्णन' नामक उनतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ २९ ॥


तीसवाँ अध्याय

शिवाराधनाके माहात्म्यमें श्वेतमुनिका आख्यान

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
शैलादिरुवाच<br>एवमुक्तास्तदा तेन ब्रह्मणा ब्राह्मणर्षभाः।<br>श्वेतस्य च कथां पुण्यामपृच्छन् परमर्षयः॥ १<br><br>पितामह उवाच<br>श्वेतो नाम मुनिः श्रीमान् गतायुर्गिरिगह्वरे।<br>सक्तो ह्याभ्यर्च्य यद्भक्त्या तुष्टाव च महेश्वरम्॥ २<br>रुद्राध्यायेन पुण्येन नमस्तेत्यादिना द्विजाः।<br>ततः कालो महातेजाः कालप्राप्तं द्विजोत्तमम्॥ ३<br>नेतुं सञ्चिन्त्य विप्रेन्द्राः सान्निध्यमकरोन्मुनेः।<br>श्वेतोऽपि दृष्ट्वा तं कालं कालप्राप्तोऽपि शङ्करम्॥ ४नन्दिकेश्वर बोले— तत्पश्चात् उन ब्रह्माजीके इस प्रकार कहनेपर द्विजश्रेष्ठ महर्षियोंने उनसे श्वेतमुनिकी पुण्यप्रद कथा पूछी—॥ १॥<br><br>पितामह बोले— समाप्त आयुवाले श्वेत नामक एक श्रीयुक्त मुनि गिरिकी गुफामें शिवाराधनमें रत थे। हे द्विजो! 'नमस्ते रुद्र मन्यवे' इत्यादि रुद्राध्यायसे भक्तिपूर्वक महेश्वरकी आराधना करके श्वेतमुनिने उन्हें प्रसन्न कर लिया॥ २ ½ ॥<br><br>हे विप्रेन्द्रो! तदनन्तर द्विजोंमें श्रेष्ठ श्वेतमुनिको समाप्त आयुवाला जानकर उन्हें ले जानेके लिये महातेजस्वी काल मुनिके पास पहुँचा॥ ३ ½ ॥
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