भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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१४२श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
पूजयामास पुण्यात्मा त्रियम्बकमनुस्मरन्।<br>त्रियम्बकं यजेदेवं सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्॥ ५<br><br>किं करिष्यति मे मृत्युर्मृत्योर्मृत्युरहं यतः।<br>तं दृष्ट्वा सस्मितं प्राह श्वेतं लोकभयङ्करः॥ ६सन्निकट मृत्युवाले पुण्यात्मा श्वेतमुनि भी उस कालको देखकर त्रिनेत्र शिवका स्मरण करते हुए उनकी आराधना करने लगे। वे ऐसा कहते हुए ध्यानपरायण थे कि जब मैं सुखकर सम्बन्धवाले तथा जगत्का पोषण करनेवाले त्रिनेत्र शिवका यजन कर रहा हूँ, तो मृत्यु मेरा क्या कर लेगी; क्योंकि मैं तो कालका भी काल हूँ॥ ४-५ १/२ ॥
एह्येहि श्वेत चानेन विधिना किं फलं तव।<br>रुद्रो वा भगवान् विष्णुर्ब्रह्मा वा जगदीश्वरः॥ ७<br><br>कः समर्थः परित्रातुं मया ग्रस्तं द्विजोत्तम।<br>अनेन मम किं विप्र रौद्रेण विधिना प्रभोः॥ ८<br><br>नेतुं यस्योत्थितश्चाहं यमलोकं क्षणेन वै।<br>यस्माद् गतायुस्त्वं तस्मान्मुने नेतुमिहोद्यतः॥ ९उन श्वेतमुनिको देखकर लोकोंको भयभीत करनेवाला वह काल मुसकराकर उनसे बोला—हे श्वेत! अब तुम मेरी ओर आओ; इस पूजा-पाठ आदिसे तुम्हें क्या लाभ! हे द्विजवर! भगवान् विष्णु, ब्रह्मा अथवा जगदीश्वर रुद्र—इनमें भला कौन मेरे द्वारा ग्रास बनाये गये जीवको बचा सकनेमें समर्थ है? हे विप्र! यह रुद्रपूजा मुझ शक्तिमान्का क्या कर सकती है? जिस किसीको भी ले जानेके लिये मैं उठ खड़ा होता हूँ, उसे क्षणभरमें यमलोक पहुँचा देता हूँ। हे मुने! क्योंकि तुम समाप्त आयुवाले हो चुके हो, अतः तुम्हें ले जानेहेतु मैं यहाँ आया हूँ॥ ६—९॥
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा भैरवं धर्ममिश्रितम्।<br>हा रुद्र रुद्र रुद्रेति ललाप मुनिपुङ्गवः॥ १०<br><br>तं प्राह च महादेवं कालं सम्प्रेक्ष्य वै दृशा।<br>नेत्रेण बाष्पमिश्रेण सम्भ्रान्तेन समाकुलः॥ ११उस कालका वह धर्ममिश्रित भयावह वचन सुनकर मुनिवर श्वेत 'हा रुद्र! हा रुद्र! हा रुद्र!' कहकर विलाप करने लगे और अश्रुपूरित तथा व्याकुल नेत्रोंसे एवं कातर दृष्टिसे शिवलिङ्गको निहारते हुए अत्यन्त व्यग्रचित्त होकर उस कालसे कहने लगे—॥ १०-११॥
श्वेत उवाच<br>त्वया किं काल नो नाथश्चास्ति चेद्दि वृषध्वजः।<br>लिङ्गेऽस्मिन् शङ्करो रुद्रः सर्वदेवभवोद्भवः॥ १२श्वेतमुनि बोले—हे काल! तुम मेरा क्या बिगाड़ सकते हो; क्योंकि सभी देवताओंको उत्पन्न करनेवाले हमारे स्वामी वृषभध्वज शंकर रुद्र इस लिङ्गमें विराजमान हैं॥ १२॥
अतीव भवभक्तानां मद्विधानां महात्मनाम्।<br>विधिना किं महाबाहो गच्छ गच्छ यथागतम्॥ १३विधिके विधान शिवजीके प्रति अतिशय भक्ति रखनेवाले मुझसदृश महात्माओंका क्या कर सकता है? अतएव हे महाबाहो! आप जिस प्रकार आये थे, उसी प्रकार चले जाइये॥ १३॥
ततो निशम्य कुपितस्तीक्ष्णदंष्ट्रो भयङ्करः।<br>श्रुत्वा श्वेतस्य तद्वाक्यं पाशहस्तो भयावहः॥ १४<br><br>सिंहनादं महत्कृत्वा चास्फोट्य च मुहुर्मुहुः।<br>बबन्ध च मुनिं कालः कालप्राप्तं तमाह च॥ १५तदनन्तर श्वेतमुनिका वैसा वचन सुनकर हाथमें पाश धारण किये, तीक्ष्ण दाढ़ोंवाले भयंकर कालने कुपित होकर सिंहके सदृश घोर गर्जना करते हुए तथा