श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| अध्याय ३० ] | शिवाराधनाके माहात्म्यमें श्वेतमुनिका आख्यान | १४३ |
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| मया बद्धोऽसि विप्रर्षे श्वेतं नेतुं यमालयम्।<br>अद्य वै देवदेवेन तव रुद्रेण किं कृतम्॥ १६<br><br>क्व शर्वस्तव भक्तिश्च क्व पूजा पूजया फलम्।<br>क्व चाहं क्व च मे भीतिः श्वेत बद्धोऽसि वै मया॥ १७<br><br>लिङ्गेऽस्मिन् संस्थितः श्वेत तव रुद्रो महेश्वरः।<br>निश्चेष्टोऽसौ महादेवः कथं पूज्यो महेश्वरः॥ १८ | पाशको बार-बार फटकारते हुए काल-प्राप्त मुनिको बाँध दिया और पुनः उनसे कहा— ॥ १४-१५॥<br>हे विप्रर्षे! तुम श्वेतको यमलोक ले जानेके निमित्त मैंने बाँध दिया है; किंतु तुम्हारे देवाधिदेव रुद्रने इस समय तुम्हारी क्या सहायता की? कहाँ शिव, कहाँ तुम्हारी भक्ति तथा पूजा, कहाँ पूजाका फल और कहाँ मैं एवं मेरा भय! हे श्वेत! अब तुम मेरे द्वारा बाँध दिये गये हो। हे श्वेत! तुम्हारा महेश्वर रुद्र जो इस लिङ्गमें स्थित है, वह महादेव तो निश्चेष्ट है; तो फिर तुम उस महेश्वरकी पूजा क्यों करते हो? ॥ १६-१८॥ | | ततः सदाशिवः स्वयं द्विजं निहन्तुमागतम्।<br>निहन्तुमन्तकं स्मयन् स्मरारि यज्ञहा हरः॥ १९<br><br>त्वरन् विनिर्गतः परः शिवः स्वयं त्रिलोचनः।<br>त्रियम्बकोऽम्बया समं सनन्दिना गणेश्वरैः॥ २० | तत्पश्चात् मुनिका प्राण हरनेके निमित्त आये हुए कालका संहार करनेके लिये कामदेवके शत्रु, दक्ष-यज्ञके विध्वंसक तथा त्रिनेत्र सदाशिव महादेव शंकर अपने नन्दी, गणेश्वरों और पार्वतीसहित मुसकराते हुए शीघ्रतापूर्वक शिवलिङ्गसे साक्षात् प्रकट हुए॥ १९-२०॥ | | ससर्ज जीवितं क्षणाद्द्रवं निरीक्ष्य वै भयात्।<br>पपात चाशु वै बली मुनेस्तु सन्निधौ द्विजाः॥ २१<br><br>ननाद चोर्ध्वमुच्चधीर्निरीक्ष्य चान्तकान्तकम्।<br>निरीक्षणेन वै मृतं भवस्य विप्रपुङ्गवाः॥ २२ | हे द्विजो! शिवजीको देखते ही उसी क्षण भयके कारण वह बलवान् काल श्वेतमुनिके पास शीघ्र ही गिर पड़ा और कालका भी अन्त करनेवाले शिवजीको देखकर जोरसे चिल्लाया। हे उत्तम विप्रो! मृतप्राय उस कालको शिवजीने अपने कृपावलोकनसे जीवन प्रदान कर दिया॥ २१-२२॥ | | विनेदुरुच्चमीश्वराः सुरेश्वरा महेश्वरम्।<br>प्रणेमुरम्बिकामुमां मुनीश्वरास्तु हर्षिताः॥ २३<br><br>ससर्जुरस्य मूर्ध्नि वै मुनेर्भवस्य खेचराः।<br>सुशोभनं सुशीतलं सुपुष्पवर्षमम्बरात्॥ २४ | सभी महान् देवतागण तथा मुनिवृन्द महेश्वर एवं माता पार्वतीको प्रणाम करने लगे और हर्षित होकर उच्च स्वरमें ‘जय हो-जय हो’ ऐसा बोलने लगे। नभोमण्डलमें स्थित देवसमुदाय इन श्वेतमुनि तथा शंकरजीके सिरपर आकाशसे अत्यन्त सुन्दर, शीतल तथा सुगन्धित पुष्पोंकी वर्षा करने लगे॥ २३-२४॥ | | अहो निरीक्ष्य चान्तकं मृतं तदा सुविस्मितः।<br>शिलाशनात्मजोऽव्ययं शिवं प्रणम्य शङ्करम्॥ २५<br><br>उवाच बालधीर्मृतः प्रसीद चेति वै मुने।<br>महेश्वरं महेश्वरस्य चानुगो गणेश्वरः॥ २६ | तत्पश्चात् शिलादके पुत्र तथा शिवजीके अनुचर गणेश्वर नन्दीजी कालको मरा हुआ देखकर अत्यन्त विस्मित हुए और उन्होंने अविनाशी महेश्वर शिवको प्रणामकर उनसे कहा कि यह अल्पबुद्धि काल मर चुका है; अब आप इस काल और मुनि—दोनोंपर अनुग्रह कीजिये॥ २५-२६॥ | | ततो विवेश भगवाननुगृह्य द्विजोत्तमम्।<br>क्षणाद् गूढशरीरं हि ध्वस्तं दृष्ट्वान्तकं क्षणात्॥ २७ | तत्पश्चात् क्षणभरमें ही मृत होकर पृथ्वीपर गिरे कालको देखकर उसके तथा द्विजश्रेष्ठ श्वेत—दोनोंके |