भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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१४४श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग
ऊपर अनुग्रह करके भगवान् शंकर तत्काल गुप्त शरीरमें समाविष्ट हो गये॥ २७॥
तस्मान्मृत्युञ्जयं चैव भक्त्या सम्पूजयेद् द्विजाः।<br>मुक्तिदं भुक्तिदं चैव सर्वेषामपि शङ्करम्॥ २८अतएव हे द्विजो! सभीको मोक्ष तथा भोग प्रदान करनेवाले मृत्युंजय महादेवकी भक्तिपूर्वक पूजा करनी चाहिये॥ २८॥
बहुना किं प्रलापेन संन्यस्याभ्यर्च्य वै भवम्।<br>भक्त्या चापरया तस्मिन् विशोका वै भविष्यथ॥ २९[हे मुनियो!] अधिक क्या कहूँ; संन्यासधर्मका पालन करते हुए परम श्रद्धाके साथ उन महादेवकी आराधना करनेसे तुम सब सन्तापरहित हो जाओगे॥ २९॥
शैलादिरुवाच<br>एवमुक्तास्तदा तेन ब्रह्मणा ब्रह्मवादिनः।<br>प्रसीद भक्तिर्देवेशे भवेद्रुद्रे पिनाकिनि॥ ३०<br><br>केन वा तपसा देव यज्ञेनाप्यथ केन वा।<br>व्रतैर्वा भगवद्भक्ता भविष्यन्ति द्विजातयः॥ ३१नन्दीश्वर बोले—[हे सनत्कुमारजी!] तत्पश्चात् उन ब्रह्माके इस प्रकार कहनेपर ब्रह्मवेत्ता मुनिगण बोले—हे देव! आप प्रसन्न हों और हमें बतायें कि किस तपस्या, किस यज्ञ अथवा किन व्रतोंसे पिनाकधारी देवेश्वर रुद्रके प्रति हमलोगोंमें भक्ति उत्पन्न होगी तथा हम द्विजगण शिवभक्त हो सकेंगे?॥ ३०-३१॥
पितामह उवाच<br>न दानेन मुनिश्रेष्ठास्तपसा च न विद्यया।<br>यज्ञैर्होमैर्व्रतैर्वेदैर्योगशास्त्रैर्निरोधनैः ॥ ३२<br><br>प्रसादेनैव सा भक्तिः शिवे परमकारणे।ब्रह्माजी बोले—हे मुनिवरो! दान, तप, विद्या, यज्ञ, होम, व्रत, वेदाध्ययन, शास्त्रपारायण, योगसाधन तथा इन्द्रिय-नियन्त्रण आदि उपायोंसे शिव-भक्ति सम्भव नहीं है। केवल उनकी कृपासे ही जगत्‌के परम कारण महादेवके प्रति वह भक्ति उत्पन्न होती है॥ ३२ १/२॥
अथ तस्य वचः श्रुत्वा सर्वे ते परमर्षयः॥ ३३<br><br>सदारतनयाः श्रान्ताः प्रणेमुश्च पितामहम्।इसके बाद उन ब्रह्माका वचन सुनकर परिश्रान्त हुए उन सभी श्रेष्ठ ऋषियोंने स्त्री तथा पुत्रोंसहित ब्रह्माजीको प्रणाम किया॥ ३३ १/२॥
तस्मात्पाशुपती भक्तिर्धर्मकामार्थसिद्धिदा॥ ३४<br><br>मुनेर्विजयदा चैव सर्वमृत्युजयप्रदा।<br>दधीचस्तु पुरा भक्त्या हरिं जित्वामरैर्विभुम्॥ ३५<br><br>क्षुपं जघान पादेन वज्रास्थित्वं च लब्धवान्।<br>मयापि निर्जितो मृत्युर्महादेवस्य कीर्तनात्॥ ३६<br><br>श्वेतेनापि गतेनास्यं मृत्योर्मुनिवरेण तु।<br>महादेवप्रसादेन जितो मृत्युर्यथा मया॥ ३७अतएव [हे सनत्कुमार!] यह शैवी भक्ति धर्म, काम, अर्थ तथा सभी सिद्धियाँ प्रदान करनेवाली है और सभी प्रकारकी मृत्युसे विजय दिलानेवाली है। यह शिव-भक्ति मुनि दधीचके लिये विजयदायिनी सिद्ध हुई थी। पूर्व कालमें दधीचमुनिने शिवकी भक्तिसे ही देवताओंसहित सर्वशक्तिमान् विष्णुको जीतकर अपने चरणसे राजा क्षुपपर प्रहार किया और अपनी हड्डियोंमें वज्रत्व प्राप्त कर लिया था। महादेवकी आराधनासे मैंने भी मृत्युपर विजय प्राप्त कर ली है और जिस प्रकार मैंने मृत्युको जीता है, उसी प्रकार मृत्युके मुखमें गये हुए मुनिवर श्वेतने भी शिवजीकी कृपासे मृत्युको जीत लिया था॥ ३४—३७॥

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे शिवाराधनमहिमवर्णनं नाम त्रिंशोऽध्यायः॥ ३०॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'शिवाराधनमहिमवर्णन' नामक तीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ३०॥

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