श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| अध्याय ३१ ] | देवदारुवननिवासी मुनिगणोंद्वारा शिवाराधना | १४५ |
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इकतीसवाँ अध्याय
देवदारुवननिवासी मुनिगणोंद्वारा शिवाराधना
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| सनत्कुमार उवाच<br>कथं भवप्रसादेन देवदारुवनौकसः।<br>प्रपन्नाः शरणं देवं वक्तुमर्हसि मे प्रभो॥ १ | सनत्कुमार बोले— हे प्रभो! देवदारुवनके निवासी [तपस्वीगण] भगवान् शिवके अनुग्रहसे किस प्रकार उन महादेवके शरणको प्राप्त हुए? कृपा करके मुझे बतायें॥ १॥ |
| शैलादिरुवाच<br>तानुवाच महाभागान् भगवानात्मभूः स्वयम्।<br>देवदारुवनस्थांस्तु तपसा पावकप्रभान्॥ २ | शैलादि बोले— स्वयम्भू भगवान् ब्रह्माने देवदारुवनमें निवास करनेवाले तथा अपनी तपस्यासे अग्नितुल्य प्रभाववाले उन महाभाग मुनियोंसे कहा॥ २॥ |
| पितामह उवाच<br>एष देवो महादेवो विज्ञेयस्तु महेश्वरः।<br>न तस्मात्परमं किञ्चित्पदं समधिगम्यते॥ ३ | पितामह बोले— इन भगवान् महादेव महेश्वरको अवश्य जानना चाहिये; क्योंकि उनसे बढ़कर कोई भी ऐसा पद नहीं है, जो प्राप्त करनेयोग्य हो॥ ३॥ |
| देवानां च ऋषीणां च पितॄणां चैव स प्रभुः।<br>सहस्रयुगपर्यन्ते प्रलये सर्वदेहिनः॥ ४<br><br>संहरत्येष भगवान् कालो भूत्वा महेश्वरः।<br>एष चैव प्रजाः सर्वाः सृजत्येकः स्वतेजसा॥ ५ | वे ही समस्त देवताओं, ऋषियों तथा पितरोंके प्रभु हैं। हजार युगोंके अन्तमें प्रलयकाल आनेपर वे ही भगवान् शिव काल बनकर सभी देहधारियोंका संहार करते हैं और एकमात्र ये भगवान् शिव ही अपने तेजसे सभी प्रजाओंका सृजन करते हैं॥ ४-५॥ |
| एष चक्री च वज्री च श्रीवत्सकृतलक्षणः।<br>योगी कृतयुगे चैव त्रेतायां क्रतुरुच्यते॥ ६<br><br>द्वापरे चैव कालाग्निर्धर्मकेतुः कलौ स्मृतः।<br>रुद्रस्य मूर्तयस्त्वेता येऽभिध्यायन्ति पण्डिताः॥ ७ | अपने वक्षःस्थलपर ‘श्री’ चिह्न धारण करनेवाले चक्रधारी विष्णु तथा वज्रधारी इन्द्र आदिके रूपमें ये शिव ही विराजमान हैं। ये सत्ययुगमें योगी, त्रेतामें यज्ञस्वरूप, द्वापरमें कालाग्नि एवं कलियुगमें धर्मकेतु नामसे कहे जाते हैं। भगवान् रुद्रकी ये ही मूर्तियाँ हैं, जिनका पण्डितजन ध्यान करते हैं॥ ६-७॥ |
| चतुरस्रं बहिश्चान्तरष्टास्रं पिण्डिकाश्रये।<br>वृत्तं सुदर्शनं योग्यमेवं लिङ्गं प्रपूजयेत्॥ ८ | बाहरसे चौकोर एवं भीतरसे अष्टकोणवाले पिण्डिका-स्थानमें वृत्ताकार, दर्शनीय तथा श्रेष्ठ लिङ्गकी विधिवत् पूजा करनी चाहिये॥ ८॥ |
| तमो ह्यग्नी रजो ब्रह्मा सत्त्वं विष्णुः प्रकाशकम्।<br>मूर्तिरेका स्थिता चास्य मूर्तयः परिकीर्तिताः॥ ९ | तमोगुणरूप अग्नि, रजोगुणरूप ब्रह्मा तथा प्रकाशक सत्त्वगुणरूप विष्णु आदिकी मूर्तियाँ एकमात्र इन्हीं शिवकी मूर्तिमें स्थित कही जाती हैं॥ ९॥ |
| यत्र तिष्ठति तद् ब्रह्म योगेन तु समन्वितम्।<br>तस्माद्विद्ध देवदेवेशमीशानं प्रभुमव्ययम्॥ १०<br><br>आराधयन्ति विप्रेन्द्रा जितक्रोधा जितेन्द्रियाः।<br>लिङ्गं कृत्वा यथान्यायं सर्वलक्षणसंयुतम्॥ ११ | जीवके भीतर समाधियोगसे स्थित जो शिवरूप है, वही ब्रह्म है। अतएव क्रोधको जीत लेनेवाले तथा इन्द्रियोंको वशमें रखनेवाले उत्तम विप्रगण विधानके अनुसार सभी लक्षणोंसे युक्त लिङ्ग बनाकर अविनाशी, देवाधिदेव, ईशान एवं सबके स्वामी शिवकी आराधना करते हैं॥ १०-११॥ |