भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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पृष्ठ 148
१४६श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
अङ्गुष्ठमात्रं सुशुभं सुवृत्तं सर्वसम्मतम्।<br>समनाभं तथाष्टास्रं षोडशास्रमथापि वा॥ १२<br><br>सुवृत्तं मण्डलं दिव्यं सर्वकामफलप्रदम्।<br>वेदिका द्विगुणा तस्य समा वा सर्वसम्मता॥ १३वह लिङ्ग अंगुष्ठ परिमाणके बराबर, अत्यन्त सुन्दर, वर्तुलाकार तथा शास्त्रसम्मत हो। उसका मण्डल समान नाभिवाला, अष्ट अथवा षोडश कोणोंवाला पूर्णतः गोलाकार तथा दिव्य होना चाहिये; वह सभी मनोरथोंको पूर्ण करनेवाला होता है॥ १२१/२॥
गोमुखी च त्रिभागैका वेद्या लक्षणसंयुता।<br>पट्टिका च समन्ताद्वै यवमात्रा द्विजोत्तमाः॥ १४<br><br>सौवर्णं राजतं शैलं कृत्वा ताम्रमयं तथा।<br>वेदिकायाश्च विस्तारं त्रिगुणं वै समन्ततः॥ १५<br><br>वर्तुलं चतुरस्रं वा षडस्रं वा त्रिस्रकम्।<br>समन्तान्निर्व्रणं शुभ्रं लक्षणैस्तत्सुलक्षितम्॥ १६<br><br>प्रतिष्ठाप्य यथान्यायं पूजालक्षणसंयुक्तम्।<br>कलशं स्थापयेत्तस्य वेदिमध्ये तथा द्विजाः॥ १७<br><br>सहिरण्यं सबीजं च ब्रह्मभिश्चाभिमन्त्रितम्।<br>सेचयेच्च ततो लिङ्गं पवित्रैः पञ्चभिः शुभैः॥ १८<br><br>पूजयेच्च यथालाभं ततः सिद्धिमवाप्स्यथ।<br>समाहिताः पूजयध्वं सपुत्रा सह बन्धुभिः॥ १९<br><br>सर्वे प्राञ्जलयो भूत्वा शूलपाणिं प्रपद्यत।<br>ततो द्रक्ष्यथ देवेशं दुर्दर्शमकृतात्मभिः॥ २०<br><br>यं दृष्ट्वा सर्वमज्ञानमधर्मश्च प्रणश्यति।<br>ततः प्रदक्षिणं कृत्वा ब्रह्माणममितौजसम्॥ २१लिङ्गकी वेदिका उसकी दुगुनी, समान तथा शास्त्रसम्मत हो। गोमुखीको उसकी एक तिहाई एवं समस्त लक्षणोंसे युक्त जानना चाहिये। हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! उसके चारों ओर जौके परिमाणके बराबर पट्टिका होनी चाहिये। वेदिकाका विस्तार चारों ओर तिगुना, वर्तुलाकार, त्रिकोण, चौकोर अथवा षट्कोण होना चाहिये। सोनेका, चाँदीका, ताँबेका अथवा पाषाणका लिङ्ग बनाना चाहिये। हे द्विजो! इस प्रकार सभी ओरसे छिद्र आदिसे रहित, सुन्दर तथा सभी लक्षणोंसे युक्त लिङ्गको विधिपूर्वक प्रतिष्ठित करके उसकी वेदीके मध्यमें पूजालक्षणोंसे समन्वित, स्वर्णसहित, पंचाक्षरमन्त्र एवं सद्योजात आदि पाँच मन्त्रोंसे अभिमन्त्रित कलशकी स्थापना करनी चाहिये। तत्पश्चात् उन्हीं पाँच शुभ तथा पवित्र मन्त्रोंसे लिङ्गका अभिषेक करना चाहिये एवं यथोपलब्ध उपचारोंसे पूजन करना चाहिये। ऐसा करनेसे तुमलोग सिद्धि प्राप्त कर लोगे। [हे मुनियो!] तुम लोग अपने पुत्रों तथा बन्धु-बान्धवोंसहित एकाग्रचित्त होकर महादेवजीका पूजन करो और हाथ जोड़कर शूलपाणिकी शरणमें जाओ। तत्पश्चात् तुमलोग असंयत आत्मावाले लोगोंके लिये दुर्लभ दर्शनवाले देवेश शिवका दर्शन प्राप्त कर सकोगे; जिन्हें देखते ही समस्त अज्ञान तथा अधर्म नष्ट हो जाता है॥ १३-२०१/२॥
सम्प्रस्थिता वनौकास्ते देवदारुवनं ततः।<br>आराधयितुमारेभा ब्रह्मणा कथितं यथा॥ २२तत्पश्चात् अमित तेजवाले ब्रह्माजीकी प्रदक्षिणा करके वे वनवासी मुनि देवदारु वनके लिये प्रस्थित हुए और जैसा ब्रह्माजीने कहा था, तदनुसार वे महादेवकी आराधना करने लगे॥ २१-२२॥
स्थण्डिलेषु विचित्रेषु पर्वतानां गुहासु च।<br>नदीनां च विविक्तेषु पुलिनेषु शुभेषु च॥ २३<br><br>शैवालशोभनाः केचित्केचिद्दन्तर्जलेशयाः।<br>केचिद् दर्भावकाशास्तु पादाङ्गुष्ठाग्रधिष्ठिताः॥ २४कुछ मुनि विचित्र प्रकारके स्थण्डिलोंपर, पर्वतोंकी गुफाओंमें, नदियोंके पवित्र तथा एकान्त तटोंपर, कुछ मुनि शैवालपर विराजमान होकर, कुछ मुनि जलके भीतर बैठकर, कोई दर्भ-शय्या बिछाकर, कोई अपने