श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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अध्याय ३१ ] देवदारुवननिवासी मुनिगणोंद्वारा शिवाराधना १४७
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| दन्तोलूखलिनस्त्वन्ये अश्मकुट्टास्तथापरे।<br>स्थानवीरासनास्त्वन्ये मृगचर्यारताः परे॥ २५ | पैरके अँगुठेके अग्रभागपर स्थित होकर, कोई दाँतोंको ही उलूखल बनाकर उनसे पिसे अन्नको खाकर, कुछ पाषाणपर पिसे अन्नको ही खाकर, कुछ वीरासनमें बैठकर, कुछ मृगचर्यापरायण होकर—इस प्रकार तपस्या तथा पूजनके द्वारा उन महाबुद्धिमान् मुनियोंने समय व्यतीत किया॥ २३—२५ १/२॥ |
| कालं नयन्ति तपसा पूजया च महाधियः।<br>एवं संवत्सरे पूर्णे वसन्ते समुपस्थिते॥ २६<br><br>ततस्तेषां प्रसादार्थं भक्तानामनुकम्पया।<br>देवः कृतयुगे तस्मिन् गिरौ हिमवतः शुभे॥ २७ | इस प्रकार उन मुनियोंको तप करते हुए एक वर्ष पूर्ण होनेपर वसन्त ऋतु आनेपर परमेश्वर शिव अपनी दयासे उन भक्तोंपर अनुग्रह करनेके निमित्त कृतयुगमें हिमालयके उस पर्वतपर स्थित देवदारुवनमें प्रसन्नतापूर्वक आये॥ २६-२७ १/२॥ |
| देवदारुवनं प्राप्तः प्रसन्नः परमेश्वरः।<br>भस्मपांसूपदिग्धाङ्गो नग्नो विकृतलक्षणः॥ २८<br><br>उल्मुकव्यग्रहस्तश्च रक्तपिङ्गललोचनः।<br>क्वचिच्च हसते रौद्रं क्वचिद् गायति विस्मितः॥ २९<br><br>क्वचिन्नृत्यति शृङ्गारं क्वचिद्रौति मुहुर्मुहुः।<br>आश्रमे ह्यटते भैक्ष्यं याचते च पुनः पुनः॥ ३०<br><br>मायां कृत्वा तथारूपां देवस्तद्वनमागतः। | उस समय वे भस्म-धूलिसे भूषित शरीरवाले, दिगम्बर वेशवाले, विकृत स्वरूपवाले, उल्मुक (जलता हुआ काष्ठ) धारण किये हुए, व्यग्रहस्तवाले तथा रक्त-पिंगल नेत्रोंवाले थे। वे कभी रौद्ररूपमें हँसते थे, कभी विस्मित होकर गाते थे, कभी शृङ्गार-नृत्य करते थे तथा कभी रोते थे—इस रूपमें वे आश्रमोंमें बार-बार भिक्षा माँगते हुए इधर-उधर घूमने-फिरने लगे। इस प्रकारकी माया रचकर महादेवजी उस वनमें आये हुए थे॥ २८—३० १/२॥ |
| ततस्ते मुनयः सर्वे तुष्टुवुश्च समाहिताः॥ ३१<br><br>अद्भिर्विविधमाल्यैश्च धूपैर्गन्धैस्तथैव च।<br>सपत्नीका महाभागाः सपुत्राः सपरिच्छदाः॥ ३२ | तदनन्तर वे सभी महाभाग मुनिगण अपनी स्त्रियों, पुत्रों तथा बन्धु-बान्धवोंसहित शुद्ध जल, विविध पुष्प-मालाओं, धूप, गन्ध आदि उपचारोंसे महादेवजीका एकाग्रचित्त होकर पूजन करके उनकी स्तुति करने लगे॥ ३१-३२॥ |
| मुनयस्ते तथा वाग्भिरीश्वरं चेदमब्रुवन्।<br>अज्ञानाद्देवदेवेश यदस्माभिरनुष्ठितम्॥ ३३ | पुनः वे सभी मुनि मधुर वाणीमें भगवान् शिवसे बोले—हे देवदेवेश! हम लोगोंने मन, वचन तथा कर्मसे जो भी आपके प्रति किया है, वह सब अज्ञानतावश किया है; अतएव आप सभी अपराधोंको क्षमा कीजिये॥ ३३ १/२॥ |
| कर्मणा मनसा वाचा तत्सर्वं क्षन्तुमर्हसि।<br>चरितानि विचित्राणि गुह्यानि गहनानि च॥ ३४ | हे हर! आपके चरित्र अत्यन्त अद्भुत, गूढ़ तथा कठिन हैं। वे चरित्र ब्रह्मा आदि देवताओंके लिये भी दुर्ज्ञेय हैं॥ ३४ १/२॥ |
| ब्रह्मादीनां च देवानां दुर्विज्ञेयानि ते हर।<br>अगर्तिं ते न जानीमो गतिं नैव च नैव च॥ ३५ | हम आपकी अगति तथा गति कुछ भी नहीं जानते हैं और जान पाना सम्भव भी नहीं है। हे |