श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished833 पृष्ठ
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| १४८ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| विश्वेश्वर महादेव योऽसि सोऽसि नमोऽस्तु ते।<br>स्तुवन्ति त्वां महात्मानो देवदेवं महेश्वरम्॥ ३६ | विश्वेश्वर! हे महादेव! आप जो कोई भी हों, आपको नमस्कार है। हम मुनिगण आप देवदेव महेश्वरकी स्तुति करते हैं॥ ३५-३६॥ |
| नमो भवाय भव्याय भावनायोद्भवाय च।<br>अनन्तबलवीर्याय भूतानां पतये नमः॥ ३७ | भव, भव्य, भावन तथा उद्भवको नमस्कार है। अनन्त बल एवं वीर्यवाले और भूतोंके पतिको नमस्कार है॥ ३७॥ |
| संहर्त्रे च पिशङ्गाय अव्ययाय व्ययाय च।<br>गङ्गासलिलधाराय आधाराय गुणात्मने॥ ३८<br><br>त्र्यम्बकाय त्रिनेत्राय त्रिशूलवरधारिणे।<br>कन्दर्पाय हुताशाय नमोऽस्तु परमात्मने॥ ३९ | जगत्के संहारकर्ता, पिशंग वर्णवाले, अव्यय, व्यय, गंगाजलकी धारा धारण करनेवाले, जगत्के आधार, गुणात्मा, त्र्यम्बक, त्रिनेत्र, उत्तम त्रिशूल धारण करनेवाले, कन्दर्पस्वरूप तथा अग्निरूप परमात्मा शिवको नमस्कार है॥ ३८-३९॥ |
| शङ्कराय वृषाङ्काय गणानां पतये नमः।<br>दण्डहस्ताय कालाय पाशहस्ताय वै नमः॥ ४० | हाथमें दण्ड तथा पाश धारण करनेवाले, कालरूप, गणोंके पति एवं वृषभध्वज शंकरको नमस्कार है॥ ४०॥ |
| वेदमन्त्रप्रधानाय शतजिह्वाय वै नमः।<br>भूतं भव्यं भविष्यं च स्थावरं जङ्गमं च यत्॥ ४१<br><br>तव देहात्समुत्पन्नं देव सर्वमिदं जगत्।<br>पासि हंसि च भद्रं ते प्रसीद भगवंस्ततः॥ ४२<br><br>अज्ञानाद्यदि विज्ञानाद्यत्किञ्चित्कुरुते नरः।<br>तत्सर्वं भगवानेव कुरुते योगमायया॥ ४३ | वेदमन्त्रोंमें प्रधान रूपसे निरूपित तथा शत जिह्वावाले आप शिवको नमस्कार है। हे देव! भूत, भविष्य तथा वर्तमान जो कुछ भी है एवं स्थावर-जंगममय यह सम्पूर्ण जगत् आपकी ही देहसे उत्पन्न हुआ है। आप ही जगत्का पालन तथा संहार करते हैं। अतएव हे भगवन्! आपका मंगल हो और आप हमपर प्रसन्न हों। ज्ञान अथवा अज्ञानमें मनुष्य जो कुछ भी करता है, वह सब स्वयं आप परमेश्वर ही अपनी योगमायासे सम्पन्न करते हैं॥ ४१-४३॥ |
| एवं स्तुत्वा तु मुनयः प्रहृष्टैरन्तरात्मभिः।<br>याचन्त तपसा युक्ताः पश्यामस्त्वां यथा पुरा॥ ४४ | इस प्रकार तपस्यासे युक्त वे मुनिगण पुलकित अन्तरात्मासे शिवजीका स्तवन करके उनसे याचना करने लगे कि हे भगवन्! हम लोगोंने आपको पहले जिस रूपमें देखा था, उसी रूपमें आपका दर्शन करना चाहते हैं॥ ४४॥ |
| ततो देवः प्रसन्नात्मा स्वमेवास्थाय शङ्करः।<br>रूपं त्र्यक्षं च सन्द्रष्टुं दिव्यं चक्षुरदात्प्रभुः॥ ४५ | तब उनकी स्तुतिसे प्रसन्न मनवाले प्रभु शिवने अपना त्रिनेत्र-रूप दिखानेके लिये उन्हें दिव्य-दृष्टि प्रदान की॥ ४५॥ |
| लब्धदृष्ट्या तया दृष्ट्वा देवदेवं त्रियम्बकम्।<br>पुनस्तुष्टुवुरीशानं देवदारुवनौकसः॥ ४६ | देवदारुवनमें निवास करनेवाले उन मुनियोंने उस प्राप्त दिव्य दृष्टिसे तीन नेत्रवाले देवाधिदेव शिवका दर्शन करके पुनः उनकी स्तुति की॥ ४६॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे मुनिकृतं शिवस्तोत्रवर्णनं नामैकत्रिंशोऽध्यायः॥ ३१॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'मुनिकृतशिवस्तोत्रवर्णन' नामक इकतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ३१॥