भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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अध्याय ३२ ] मुनियोंद्वारा की गयी शिवस्तुति १४९


बत्तीसवाँ अध्याय

मुनियोंद्वारा की गयी शिवस्तुति

ऋषय ऊचुःऋषिगण बोले—
नमो दिग्वाससे नित्यं कृतान्ताय त्रिशूलिने।<br>विकटाय करालाय करालवदनाय च॥ १—दिशाओंको वस्त्ररूपमें धारण करनेवाले, शाश्वत, प्रलयके कारण, त्रिशूलधारी, विकट रूपवाले, कराल (संसाररूपी वृक्षके लिये कुठार स्वरूप) तथा भीषण वदनवाले शिवको नमस्कार है॥ १॥
अरूपाय सुरूपाय विश्वरूपाय ते नमः।<br>कटङ्कटाय रुद्राय स्वाहाकाराय वै नमः॥ २बिना रूपवाले, सुन्दर रूपवाले, विश्वरूप आपको नमस्कार है। गजाननरूप, स्वाहा करनेवाले यजमानरूप रुद्रको नमस्कार है॥ २॥
सर्वप्रणतदेहाय स्वयं च प्रणतात्मने।<br>नित्यं नीलशिखण्डाय श्रीकण्ठाय नमो नमः॥ ३<br><br>नीलकण्ठाय देवाय चिताभस्माङ्गधारिणे।<br>त्वं ब्रह्मा सर्वदेवानां रुद्राणां नीललोहितः॥ ४सभी लोगोंसे नमस्कृत देहवाले, स्वयं विनीत आत्मावाले, निरन्तर नील जटाजूट धारण करनेवाले, अपने शरीरमें चिताकी भस्मको धारण करनेवाले, श्रीकण्ठ, नीलकण्ठ शिवको बार-बार नमस्कार है। हे प्रभो! आप सभी देवताओंमें ब्रह्मा हैं तथा रुद्रोंमें नीललोहित हैं॥ ३-४॥
आत्मा च सर्वभूतानां सांख्यैः पुरुष उच्यते।<br>पर्वतानां महामेरुर्नक्षत्राणां च चन्द्रमाः॥ ५आप समस्त भूतोंकी आत्मा हैं। सांख्यविद् आपको पुरुष कहते हैं। आप पर्वतोंमें विशाल मेरु पर्वत तथा नक्षत्रोंमें चन्द्रमा हैं॥ ५॥
ऋषीणां च वसिष्ठस्त्वं देवानां वासवस्तथा।<br>ॐकारः सर्ववेदानां श्रेष्ठं साम च सामसु॥ ६ऋषियोंमें आप वसिष्ठ हैं तथा देवताओंमें देवराज इन्द्र हैं, सभी वेदोंमें साररूपसे आप ओंकार हैं एवं सभी गेयस्वरोंमें आप सामगान हैं॥ ६॥
आरण्यानां पशूनां च सिंहस्त्वं परमेश्वरः।<br>ग्राम्याणामृषभश्चासि भगवान् लोकपूजितः॥ ७आप परमेश्वर वन्य पशुओंमें सिंह हैं और ग्राम्य पशुओंमें आप ऐश्वर्यसम्पन्न तथा लोकपूज्य वृषभ हैं॥ ७॥
सर्वथा वर्तमानोऽपि यो यो भावो भविष्यति।<br>त्वामेव तत्र पश्यामो ब्रह्मणा कथितं तथा॥ ८हे प्रभो! आप वैसा कीजिये कि आपका जो भी विद्यमान स्वरूप हो, उसमें हम ब्रह्माद्वारा कथित आपके सर्वस्वरूपका दर्शन कर सकें॥ ८॥
कामः क्रोधश्च लोभश्च विषादो मद एव च।<br>एतदिच्छामहे बोद्धुं प्रसीद परमेश्वर॥ ९हे परमेश्वर! आप प्रसन्न होइये। हम यह जानना चाहते हैं कि काम, क्रोध, लोभ, विषाद तथा मद—ये पाँचों विकार सभीको दग्ध क्यों करते हैं?॥ ९॥
महासंहरणे प्राप्ते त्वया देव कृतात्मना।<br>करं ललाटे संविध्य वह्निरुत्पादितस्त्वया॥ १०हे देव! महासंहार उपस्थित होनेपर शुद्ध चित्तवाले आप परमेश्वरने ललाटपर हाथ घर्षितकर अग्नि उत्पन्न की थी॥ १०॥
तेनाग्निना तदा लोका अर्चिर्भिः सर्वतो वृताः।<br>तस्मादग्निसमा ह्येते बहवो विकृतानग्नयः॥ ११तब उसी अग्निकी ज्वालाओंसे समस्त लोक