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श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

by महर्षि वेदव्यास

DevanagariHindipublished833 pages

Page 765 of 834

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Page 765

अध्याय १ ] अविमुक्तक्षेत्रकी महिमा और वहाँ स्थित लिङ्गायतनौंका वर्णन [ ७६३

देवदेव उवाचभगवान् शम्भुने उस समय इस प्रकार वर प्रदान किया था॥ १०-११॥<br><br> **देवदेव बोले—**जो मनुष्य उस अविमुक्त स्थानका सदा स्मरण करेंगे, वे सभी पापोंसे मुक्त हो जायेंगे और मेरे गणोंके तुल्य हो जायेंगे॥ १२॥
ये स्मरिष्यन्ति तत्स्थानमविमुक्तं सदा नराः।<br>निर्धूतसर्वपापास्ते भविष्यन्ति गणोपमाः॥ १२
आगमिष्यन्ति ये द्रष्टुं ये जना योजनेन तु।<br>ते ब्रह्महत्यां मोक्ष्यन्ति भविष्यन्ति ममानुगाः॥ १३जो लोग मेरा दर्शन करनेके लिये [यहाँ] आयेंगे, वे एक योजन दूर रहनेपर ही ब्रह्महत्याके पापसे मुक्त हो जायेंगे और मेरे अनुचर बन जायेंगे॥ १३॥
विदित्वा भङ्गुरं लोकं येऽस्मिन्वत्स्यन्ति मे पुरे।<br>अन्तकालेऽपि वत्स्यन्ति तेषां भवति मोक्षदम्॥ १४संसारको विनाशशील जानकर जो लोग मेरे इस पुरमें निवास करेंगे अथवा मृत्युके समय ही [यहाँ] निवास करेंगे, उनके लिये यह मोक्षप्रद होगा॥ १४॥
मोक्षः सुदुर्लभो यस्मात् संसारश्चातिभीषणः।<br>अश्मना चरणौ भित्त्वा वाराणस्यां वसेन्नरः॥ १५चूँकि मोक्ष अत्यन्त दुर्लभ है और संसार अति भयंकर है, अतः पत्थरसे [अपने] दोनों पैरोंको भंग करके मनुष्यको वाराणसीमें निवास करना चाहिये॥ १५॥
सर्वावस्थोऽपि यो मर्त्यो वाराणस्यां वसेत्सदा।<br>स यां गतिमवाप्नोति पुण्यदानैर्न सा गतिः॥ १६किसी भी अवस्थावाला जो मनुष्य सदा वाराणसीमें निवास करता है, वह जो गति प्राप्त करता है, वह गति पुण्य तथा दानोंसे भी सम्भव नहीं है। हे मुनिश्रेष्ठ! वह [गति] मनुष्योंके लिये तपस्यासे भी परम दुर्लभ है॥ १६ १/२ ॥
दुर्लभा तपसा सा च मर्त्यानां मुनिसत्तम।<br>तत्र विप्र व्रज शीघ्रं मनस्स्थैर्यं यदीच्छसि॥ १७अतः हे विप्र! यदि आप मनकी स्थिरता [शान्ति] चाहते हैं, तो शीघ्र ही वहाँ जाइये; [वहाँ जानेसे] मनकी स्थिरताका कारण सुनिये; मैं बता रहा हूँ॥ १७ १/२ ॥
मनसः स्थैर्यहेतुत्वं शृणुष्व गदतो मम।<br>दक्षिणं चोत्तरं चैव तस्मिन् स्थाने स्थितं सदा॥ १८उस पुरमें दक्षिण तथा उत्तर स्थान स्थित हैं; उसके मध्यमें विषुवक्षेत्र स्थित है, जो देवताओंको भी दुर्लभ है। कलियुगमें तो यह स्थान मनुष्योंके लिये मोक्षका साधनस्वरूप है; आराधना, स्नान, पूजन तथा तर्पणके द्वारा यहाँ [शिवकी] भक्ति करनी चाहिये। चारों वर्णोंमेंसे कोई भी व्यक्ति यहाँ इस ईश्वरपदको प्राप्त कर लेता है॥ १८-२०॥
विषुवं चैव मध्यस्थं देवानामपि दुर्लभम्।<br>कलौ युगे तु मर्त्यानां स्थानं मोक्षावहेतुकम्॥ १९
भक्तिमाराधनेनैव स्नानपूजनतर्पणैः।<br>चातुर्वर्ण्यविभागस्य शरीरं वैश्वरं पदम्॥ २०
पिङ्गला नाम या नाडी आग्नेयी सा प्रकीर्तिता।<br>शुष्का सरिच्च सा ज्ञेया लोलार्को यत्र तिष्ठति॥ २१पिंगला नामक जो नाडी है, वह आग्नेयी कही गयी है; उसे शुष्क सरित् (नदी) जानना चाहिये, जहाँ लोलार्क-कुण्ड स्थित है॥ २१॥
इडानाम्नी च या नाडी सा सौम्या सम्प्रकीर्तिता।<br>वरणा नाम सा ज्ञेया केशवो यत्र संस्थितः॥ २२इडा नामक जो नाडी है, वह सौम्य कही गयी है; उसे वरणा नामवाली जानना चाहिये, जहाँ केशव विराजमान हैं। इन दोनों [पिंगला, इडा]-के मध्यमें जो नाडी है, वह सुषुम्ना कही गयी है; उसे मत्स्योदरी नामवाली जानना चाहिये, उसे विषुव कहा गया है॥ २२-२३॥
आभ्यां मध्ये तु या नाडी सुषुम्ना च प्रकीर्तिता।<br>मत्स्योदरी च सा ज्ञेया विषुवं तत्प्रकीर्तितम्॥ २३