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श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

by महर्षि वेदव्यास

DevanagariHindipublished833 pages

Page 766 of 834

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Page 766

७६४ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ परिशिष्ट

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
श्रुत्वा कलियुगं घोरमल्पायुषमधार्मिकम्।<br>सिद्धक्षेत्रं न सेवन्ते जायन्ते च म्रियन्ति च॥ २४कलियुगको भयंकर, अल्पायु तथा अधार्मिक समझकर भी जो लोग इस सिद्धक्षेत्रका सेवन नहीं करते हैं, वे ही बार-बार जन्म लेते हैं और मृत्युको प्राप्त होते हैं।
लिङ्गरूपधरास्तीर्थे दृगिचण्डेश्वरादयः।<br>अविमुक्ते स्थिताः सर्वे शुद्ध्यन्ते पापकर्मिणः॥ २५लिङ्गरूपधारी दृगिचण्डेश्वर आदि इस अविमुक्त तीर्थमें स्थित रहते हैं; पापकर्म करनेवाले सभी लोग यहाँ शुद्ध हो जाते हैं॥ २४-२५॥
अविमुक्तं परं क्षेत्रमविमुक्ते परा गतिः।<br>अविमुक्ते परा सिद्धिरविमुक्ते परं पदम्॥ २६अविमुक्त परम क्षेत्र है; [इस] अविमुक्तक्षेत्रमें परा गति प्राप्त होती है, अविमुक्तक्षेत्रमें परा सिद्धि मिलती है और अविमुक्तक्षेत्रमें परमपद प्राप्त होता है॥ २६॥
अन्तकाले मनुष्याणां भिद्यमानेषु मर्मसु।<br>वायुना प्रेर्यमाणानां स्मृतिर्नैवोपजायते॥ २७मृत्युके समय मर्मोंके भेदे जानेपर वायुके द्वारा प्रेरित किये गये मनुष्योंको स्मृति नहीं रह जाती है॥ २७॥
येऽविमुक्ते स्थिता रुद्रा भक्तानां प्रीतिदायकाः।<br>कर्णजापं प्रयच्छन्ति दृगिचण्डेश्वरादयः॥ २८भक्तोंको प्रीति प्रदान करनेवाले जो दृगिचण्डेश्वर आदि रुद्र अविमुक्तमें स्थित हैं, वे [भक्तोंके] कानमें तारक मन्त्र प्रदान करते हैं॥ २८॥
अविमुक्तं महत्क्षेत्रं पुण्यकृद्भिर्निषेवितम्।<br>सर्वपापक्षयकरं साक्षाच्छिवपुरं महत्॥ २९<br><br>श्मशानं परमं विद्धि क्षेत्राणां परमं तथा।<br>पाप्मानमुत्सृजत्याशु प्रविष्टस्तत्र वै पुमान्॥ ३०अविमुक्तक्षेत्र महान्, पुण्य करनेवालोंके द्वारा सेवित, सभी पापोंका नाश करनेवाला तथा साक्षात् शिवका महान् पुर है। श्मशानको परम क्षेत्र जानिये; यह सभी क्षेत्रोंमें महान् है। वहाँ प्रविष्ट हुआ मनुष्य शीघ्र ही पापसे मुक्त हो जाता है॥ २९-३०॥
वारणस्यां तु यः कश्चित् प्रविष्टो ब्रह्मघातकः।<br>तिष्ठते क्षेत्रबाह्ये तु निर्गते गृह्यते पुनः॥ ३१जो कोई भी ब्रह्मघाती वाराणसीमें प्रवेश करता है, तो उसी समय उसकी ब्रह्महत्या क्षेत्रके बाहर ही रह जाती है और पुनः उस व्यक्तिके इस क्षेत्रसे बाहर चले जानेपर वह ब्रह्महत्या उसे पुनः घेर लेती है॥ ३१॥
लिङ्गरूपधरा मूर्ताः सप्तकोट्यस्तु सर्वतः।<br>अविमुक्ते स्थिता रुद्रा भक्तानां सिद्धिदायकाः॥ ३२लिङ्गरूप धारण किये हुए मूर्तिमान् सात करोड़ रुद्र अविमुक्तक्षेत्रमें सभी ओर स्थित हैं; वे भक्तोंको सिद्धि देनेवाले हैं॥ ३२॥
कृत्तिवाससमारभ्य क्रोशं क्रोशं चतुर्दिशम्।<br>योजनं तत्र तत्क्षेत्रं गणै रुद्रैश्च संवृतम्॥ ३३<br><br>तस्य मध्ये यदा लिङ्गं भूमिं भित्त्वा समुत्थितम्।<br>मध्यमेश्वरनामाख्यं ख्यातं सर्वसुरासुरैः॥ ३४कृत्तिवाससे आरम्भ करके कोस-कोसकी दूरीपर चारों दिशाओंमें योजन-परिमाणमें वह क्षेत्र गणों तथा रुद्रोंसे घिरा हुआ है। उसके मध्यमें भूमिको भेदन करके जो लिङ्ग प्रकट हुआ है, उसे सभी देवता तथा असुर मध्यमेश्वर नामवाला कहते हैं॥ ३३-३४॥
अस्मादारभ्य लिङ्गात्तु क्रोशं क्रोशं चतुर्ष्वपि।<br>योजनं विद्धि तत्क्षेत्रं मृत्युकालेऽमृतप्रदम्॥ ३५<br><br>एवं क्षेत्रस्य संन्यासः पुराणे परिकीर्तितः।<br>अस्मात्तु परतो देवि विहारो नैव विद्यते॥ ३६इस लिङ्गसे आरम्भ करके चारों दिशाओंमें कोस-कोसकी दूरीपर योजनभर उस [अविमुक्त] क्षेत्रको जानिये; वह क्षेत्र मृत्युकालमें अमरता प्रदान करनेवाला है। इस प्रकार पुराणमें इस क्षेत्रका माहात्म्य बताया गया है; हे देवि! इस क्षेत्रसे बढ़कर [कोई भी] आनन्दका स्थान नहीं है॥ ३५-३६॥