श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
by महर्षि वेदव्यास
DevanagariHindipublished833 pages
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अध्याय १] अविमुक्तक्षेत्रकी महिमा और वहाँ स्थित लिङ्गायतनोंका वर्णन ७६५
| देव्युवाच | देवी बोलीं— |
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| वाराणस्यां तु किं गुह्यं स्थानं किं च तव प्रियम्।<br>किं रहस्यं च लिङ्गानां के ह्रदास्तत्र विश्रुताः॥ ३७॥<br><br>के कूपाः कानि कुण्डानि लिङ्गानां स्थापकाश्च के।<br>कस्मिन् स्थाने कृतं कर्म ज्ञाननिष्ठं प्रजायते।<br>एतदाचक्ष्व मे सर्वं यदनुग्रहभागहम्॥ ३८॥ | वाराणसीमें कौन-सा गुह्य स्थान है, कौन-सा स्थान आपको प्रिय है, लिङ्गोंका क्या रहस्य है, वहाँ कौन-से प्रसिद्ध सरोवर हैं, कौन-कौन कूप हैं, कौन-कौन कुण्ड हैं, लिङ्गोंके स्थापक कौन हैं और किस स्थानमें किया गया कर्म ज्ञानमें निष्ठा उत्पन्न करनेवाला होता है? यदि मैं अनुग्रहकी भागिनी होऊँ, तो मुझे यह सब बतायें॥ ३७—३८॥ |
| देवदेव उवाच<br>रुचिरं स्थानमासाद्य अविमुक्तं तु मे गृहम्।<br>न कदाचिन्मया मुक्तमविमुक्तं ततः स्मृतम्॥ ३९॥<br><br>अनेनैव प्रकारेण अविमुक्तं तु कथ्यते।<br>अविशब्देन पापं तु कथ्यते वेदवादिभिः।<br>तेन पापेन तत् क्षेत्रं वर्जितं वरवर्णिनि॥ ४०॥ | **देवदेव बोले—**मैंने इस सुन्दर अविमुक्तक्षेत्रको प्राप्तकर इसे अपना गृह (निवासस्थान) बनाया। मैंने कभी भी इसका त्याग नहीं किया, इसलिये इसे अविमुक्त कहा गया है। वेदवादियोंके द्वारा 'अवि' शब्दसे पापको कहा जाता है। हे वरवर्णिनि! वह क्षेत्र उस पापसे रहित है; इस प्रकारसे यह अविमुक्त कहा जाता है॥ ३९-४०॥ |
| सिद्धाः पाशुपताः श्रेष्ठास्तन्निष्ठास्तत्परायणाः।<br>उपासते च मां नित्यं तस्मिन् स्थाने स्थिताः सदा॥ ४१॥ | सिद्धजन तथा श्रेष्ठ पाशुपत भक्त मेरे प्रति निष्ठावान् तथा परायण होकर उस स्थानमें रहकर नित्य मेरी उपासना करते हैं॥ ४१॥ |
| पूर्वोत्तरे दिग्विभागे तस्मिन् क्षेत्रे तु सुन्दरि।<br>सुरासुरैः स्तुतश्चाहं तत्र स्थाने यशस्विनि॥ ४२॥<br><br>दिव्यं वर्षसहस्त्रं तु स्तुतोऽहं विविधैः स्तवैः।<br>उत्पन्नं मम लिङ्गं तु भित्त्वा भूमिं यशस्विनि॥ ४३॥<br><br>तेषामनुग्रहार्थाय लोकानां भक्तिभावतः।<br>वाराणस्यां महादेवि तत्र स्थाने स्थितो ह्यहम्॥ ४४॥<br><br>तं दृष्ट्वा मनुजो देवि पशुपाशैर्विमुच्यते॥ ४५ | हे सुन्दरि! उस क्षेत्रमें पूर्वोत्तर दिशामें देवताओं तथा असुरोंके द्वारा मेरी स्तुति की गयी थी। हे यशस्विनि! उस स्थानमें दिव्य हजार वर्षोंतक अनेक प्रकारके स्तोत्रोंसे मेरी स्तुति की गयी थी; तब हे यशस्विनि! उन सभीके भक्तिभावसे प्रसन्न होकर उनपर अनुग्रह करनेहेतु भूमिका भेदन करके मेरा लिङ्ग प्रकट हुआ और हे महादेवि! वाराणसीमें उस स्थानपर मैं स्थित हो गया। हे देवि! उस लिङ्गका दर्शन करके मनुष्य भवबन्धनसे मुक्त हो जाता है॥ ४२—४५॥ |
| कूपस्तत्रैव संल्लग्नो महादेवस्य चैव हि।<br>तत्रोपस्पर्शनाद्देवि लभेद्वैागीश्वरीं गतिम्॥ ४६॥ | हे देवि! वहींपर महादेवके समीप एक कूप है; वहाँ स्नान करनेसे मनुष्य वागीश्वरी गति (सारस्वतलोक) प्राप्त करता है॥ ४६॥ |
| तत्र वाराणसी देवी स्थिता विग्रहरूपिणी।<br>मानवानां हितार्थाय स्थिता कूपस्य पश्चिमे॥ ४७॥ | वहाँपर कूपके पश्चिमभागमें मनुष्योंके कल्याणके लिये विग्रहरूप धारणकर देवी वाराणसी विराजमान हैं॥ ४७॥ |
| वाराणसीं तु यो दृष्ट्वा भक्त्या चैव नमस्यति।<br>तस्य तुष्टा च सा देवी वसतिं च प्रयच्छति॥ ४८ | [देवी] वाराणसीका दर्शन करके जो मनुष्य भक्तिपूर्वक उन्हें नमस्कार करता है, उसके ऊपर प्रसन्न होकर वे देवी उसे काशीवास प्रदान करती हैं॥ ४८॥ |
| महादेवस्य पूर्वेण गोप्रेक्षमिति विश्रुतम्।<br>तेन दृष्टेन सुश्रोणि पूर्वोक्तं फलमाप्नुयात्॥ ४९ | हे सुश्रोणि! महादेवके पूर्वमें गोप्रेक्ष नामक स्थान प्रसिद्ध है, जिसके दर्शनसे मनुष्य पूर्वोक्त फल प्राप्त |