श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
by महर्षि वेदव्यास
DevanagariHindipublished833 pages
Page 795 of 834
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अध्याय ८ ] कृत्तिवासेश्वर तथा उसके समीपस्थ लिङ्गोंका वर्णन ७९३
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| दशकोटिसहस्त्राणि तीर्थान्यत्रैव वै मुने।<br>कृत्तिवासेश्वरो यत्र तत्र सर्वे व्यवस्थिताः॥ १५<br>तस्मिँल्लिङ्गे तु सान्निध्यं त्रिकालं नात्र संशयः।<br>ब्रह्मविष्णुसुरेन्द्राणामप्रकाशयं कृतं मया॥ १६<br>यत्र तीर्थान्यनेकानि कृतानि बहुभिर्द्विजैः।<br>पुलस्त्याद्यैर्महाभागैर्लोमशाद्यैर्महात्मभिः।<br>कृत्तिवासेश्वरं लिङ्गं न जानन्ति सुरासुराः॥ १७ | वहाँ अनेक तीर्थ हैं, उनकी संख्या नहीं बतायी जा सकती है, हे मुने! वहींपर दस हजार करोड़ तीर्थ हैं। जहाँ कृत्तिवासेश्वरलिङ्ग है, वहाँ वे सभी [तीर्थ] विद्यमान हैं॥ १४-१५॥<br><br>उस लिङ्गमें त्रिकाल उनका सान्निध्य रहता है, इसमें सन्देह नहीं है। मैंने ब्रह्मा, विष्णु तथा सुरेन्द्रसे भी इसे प्रकाशित नहीं किया॥ १६॥<br><br>जहाँ बहुत-से द्विजोंने तथा पुलस्त्य, लोमश आदि भाग्यशाली महात्माओंके द्वारा अनेक तीर्थ निर्मित किये गये हैं, उस कृत्तिवासेश्वरलिङ्गको देवता तथा असुर भी नहीं जानते हैं॥ १७॥ |
| भृगुरुवाच<br>कृते त्रेताद्वापरे च कलौ च परमेश्वरम्।<br>महागुह्यातिगुह्यं च संसारार्णवतारकम्॥ १८<br>केन कार्येण देवेश त्वयेदं न प्रकाशितम्।<br>कृत्तिवासेश्वरं लिङ्गमविमुक्ते तु संस्थितम्॥ १९ | भृगु बोले—सत्ययुग, त्रेता, द्वापर तथा कलियुगमें यह परम ऐश्वर्यसम्पन्न और गुह्य-से-गुह्य लिङ्ग संसारसागरसे पार करनेवाला है, हे देवेश! आपने अविमुक्त [क्षेत्र]-में स्थित इस कृत्तिवासेश्वर लिङ्गको किस कारणसे प्रकाशित नहीं किया?॥ १८-१९॥ |
| ईश्वर उवाच<br>दशकोटिसहस्त्राणि आगच्छन्ति दिने दिने।<br>धर्मक्रियाविनिर्मुक्ताः सत्यशौचविवर्जिताः॥ २०<br>देवद्विजगुरून्नित्यं निन्दन्तो भक्तिवर्जिताः।<br>मायामोहसमायुक्ता दम्भमोहसमन्विताः॥ २१<br>शूद्रान्ननिरता विप्रा विह्वला रतिलालसाः।<br>कृत्तिवासेश्वरं प्राप्य ते सर्वे विगतज्वराः॥ २२<br>संसारभयनिर्मुक्ताः सर्वपापविवर्जिताः।<br>सुखेन मोक्षमायान्ति यथा सुकृतिनस्तथा॥ २३<br>दिव्यैर्विमानैरारूढाः किङ्किणीरवकान्वितैः।<br>देवानां भुवनं लभ्यं ते यान्ति परमं पदम्॥ २४<br>जन्मान्तरसहस्रेण मोक्षो लभ्येत वा न वा।<br>एकेन जन्मना तत्र कृत्तिवासे तु लभ्यते॥ २५ | ईश्वर बोले—दस हजार करोड़ तीर्थ यहाँ प्रतिदिन आते हैं, धर्मक्रियासे विहीन, सत्य-शौचसे रहित, देवताओं, द्विजों तथा गुरुओंकी सदा निन्दा करनेवाले, भक्तिहीन, मायामोहसे युक्त, दम्भ-मोहसे समन्वित, शूद्रोंके अन्नका सेवन करनेवाले, विह्वल तथा रतिकी लालसावाले सभी विप्र कृत्तिवासेश्वरमें आकर सन्तापरहित हो जाते हैं॥ २०-२२॥<br><br>संसारके भयसे मुक्त तथा सभी पापोंसे रहित होकर वे पुण्यात्माओंकी भाँति सुखपूर्वक मोक्ष प्राप्त करते हैं॥ २३॥<br><br>सुन्दर किंकिणियोंकी ध्वनिसे समन्वित दिव्य विमानोंमें बैठकर वे देवताओंके लिये सुलभ परम पद प्राप्त करते हैं। हजारों जन्मोंमें मोक्ष मिले अथवा नहीं, किंतु कृत्तिवासमें एक ही जन्ममें [मोक्ष] प्राप्त हो जाता है॥ २४-२५॥ |
| पूर्वजन्मकृतं पापं तस्य लिङ्गस्य दर्शनात्।<br>तत्र सिद्धेश्वरं नाम मुखलिङ्गं तु संस्थितम्॥ २६<br>अन्तकेश्वरदेवस्य स्थितं चैवोत्तेरेण तु।<br>आलयं सर्वसिद्धानां तत्स्थानं परमं महत्॥ २७<br>अव्ययं शाश्वतं दिव्यं विरजं ब्रह्मणालयम्।<br>शक्तिमूर्तिस्थितं शांतं शिवं परमकारणम्॥ २८<br>अव्यक्तं शाश्वतं सूक्ष्मं सूक्ष्मात् सूक्ष्मतरं महत्॥ २९ | उस लिङ्गके दर्शनसे पूर्वजन्ममें किया गया पाप नष्ट हो जाता है। वहाँ सिद्धेश्वर नामक मुखलिङ्ग भी स्थित है, वह अन्तकेश्वरदेवके उत्तरमें है। वह स्थान सभी सिद्धोंका आलय, अति महान्, अव्यय, शाश्वत, दिव्य, विशुद्ध, ब्रह्माका आलय, शक्ति-मूर्तिस्थित, शान्त, कल्याणमय, परमकारणस्वरूप, अव्यक्त, सनातन, सूक्ष्म तथा सूक्ष्मसे भी परम सूक्ष्म है॥ २६-२९॥ |