श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
by महर्षि वेदव्यास
DevanagariHindipublished833 pages
Page 796 of 834
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| श्रीलिङ्गमहापुराण | [ परिशिष्ट |
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| ७९४ |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| ईश्वर उवाच<br>एतद्दारुवनस्थानं कलौ देवस्य गीयते।<br>परात्परं तु यज्ज्ञानं मोक्षमार्गप्रदायकम्॥ ३०<br>प्राप्यते द्विजशार्दूल कृत्तिवासे न संशयः।<br>कृते तु त्र्यम्बकं प्रोक्तं त्रेतायां कृत्तिवाससम्॥ ३१ | **ईश्वर बोले—**यह दारुवन स्थान कलियुगमें शिवका स्थान कहा जाता है। हे द्विजश्रेष्ठ! जो मोक्षमार्ग देनेवाला परात्पर ज्ञान है, वह कृत्तिवासमें प्राप्त हो जाता है, इसमें सन्देह नहीं है। सत्ययुगमें [शिवका नाम] त्र्यम्बक तथा त्रेतामें कृत्तिवास कहा गया है॥ ३०-३१॥ |
| माहेश्वरं तु देवस्य द्वापरे नाम गीयते।<br>हस्तिपालेश्वरं नाम कलौ सिद्धैस्तु गीयते॥ ३२ | द्वापरमें शिवका नाम माहेश्वर कहा जाता है। कलियुगमें सिद्धोंके द्वारा शिवका नाम हस्तिपालेश्वर कहा जाता है॥ ३२॥ |
| दण्डिरूपधरेणैव देवदेवेन शम्भुना।<br>द्विजेष्वनुग्रहश्चात्र तत्र स्थाने कृतः पुरा॥ ३३<br>युगे युगे तु तत्त्वज्ञा ब्राह्मणाः शान्तचेतसः।<br>उपासते च मां नित्यं जपन्ति शतरुद्रियम्॥ ३४ | पूर्वकालमें देवदेव शम्भुने दण्डीका रूप धारण करके उस स्थानपर द्विजोंपर अनुग्रह किया था। शान्त चित्तवाले तत्त्वज्ञ ब्राह्मण प्रत्येक युगमें [वहाँ] नित्य मेरी उपासना करते हैं और शतरुद्रिय मन्त्रका जप करते हैं॥ ३३-३४॥ |
| आदेहपतनाद्विप्रास्तस्मिन् क्षेत्र उपासकाः।<br>जपन्ति रुद्राध्यायं ते स शिवः कृत्तिवाससम्॥ ३५<br>तेषां देवः सदा तुष्टो दिव्यान् लोकान् प्रयच्छति।<br>ये ते जप्ता मया रुद्राः शङ्कुकर्णालये पुरा॥ ३६<br>तेऽविमुक्ते तु तिष्ठन्ति कृत्तिवासे न संशयः।<br>द्वारं यत् सांख्ययोगानां सा तेषां वसतिः स्मृता॥ ३७ | वे उपासक विप्र देहके पतनपर्यन्त (मृत्युकालतक) उस क्षेत्रमें रुद्राध्यायका जप करते हैं, वे कृत्तिवासेश्वर भगवान् शिव उनके ऊपर प्रसन्न होकर उन्हें सदा दिव्य लोक प्रदान करते हैं। मैंने पूर्वकालमें शंकुकर्णालयमें जिन रुद्रोंका जप किया था, वे अविमुक्त [क्षेत्र] कृत्तिवासमें स्थित हैं, इसमें संशय नहीं है। जो सांख्ययोगोंका द्वार है, वह उन सबका निवासस्थान कहा गया है॥ ३५–३७॥ |
| श्यामास्तु पुरुषा रौद्रा विद्युता हरिपिङ्गलाः।<br>अशरीराः शरीरा ये ते च सृष्टा मया पुरा॥ ३८<br>नीलकण्ठाः श्वेतमुखा बिम्बोष्ठाश्च कपर्दिनः।<br>हरित्केशाः शृङ्गिणश्च लम्बोष्ठास्तिग्महेतयः॥ ३९<br>असंख्याः परिसंख्यातास्तान्यन्ये च सहस्रशः।<br>तेऽविमुक्ते तु तिष्ठन्ति कृत्तिवाससमीपतः॥ ४० | मैंने पूर्वकालमें श्याम, रौद्र, वैद्युत, हरिपिंगल, अशरीरी, शरीरी, नीलकण्ठ, श्वेतमुख, बिम्बोष्ठ, कपर्दी, हरित्केश, शृंगी, लम्बोष्ठ, तिग्महेति नामवाले जिन असंख्य तथा अन्य हजारों पुरुषोंकी सृष्टि की थी, वे कृत्तिवासके समीप अविमुक्तमें रहते हैं॥ ३८—४०॥ |
| रुद्राणां तु शिवो ज्ञेयं कृत्तिवासेश्वरं परम्।<br>तेन तैः प्रेरिता यान्ति दुष्प्रापमकृतात्मभिः॥ ४१ | श्रेष्ठ कृत्तिवासेश्वरको रुद्रोंका शिव जानना चाहिये, अतः उन [रुद्रों]-के द्वारा प्रेरित किये गये भक्त पुण्यरहित आत्मावालोंके द्वारा दुष्प्राप्य लोकको जाते हैं॥ ४१॥ |
| अशाश्वतमिदं ज्ञात्वा मानुष्यं बहुकिल्बिषम्।<br>अविमुक्ते तु वस्तव्यं जप्तव्यं शतरुद्रियम्॥ ४२<br>कृत्तिवासेश्वरो देवो द्रष्टव्यश्च पुनः पुनः। | [इसलिये] अनेक पापोंसे युक्त इस मानवशरीरको नश्वर समझकर अविमुक्तमें वास करना चाहिये, शतरुद्रियमन्त्रका जप करना चाहिये और बार-बार कृत्तिवासेश्वरदेवका दर्शन करना चाहिये॥ ४२<sup>१</sup>/<sub>२</sub>॥ |
| यदिच्छेत्तारकं ज्ञानं शाश्वतं चामृतप्रदम्॥ ४३<br>एतत्सर्वं प्रकर्तव्यं यदिच्छेन्मामकं पदम्॥ ४४ | यदि कोई शाश्वत तथा अमृत प्रदान करनेवाले तारक ज्ञानकी इच्छा करता हो और यदि मेरे लोककी इच्छा करता हो, तो उसे यह सब करना चाहिये॥ ४३-४४॥ |
| गजवक्त्रः स्वयम्भूतस्तिष्ठत्यत्र विनायकः।<br>कूष्माण्डराजशम्भुश्च जयन्तश्च मदोत्कटः॥ ४५ | यहाँपर स्वयम्भू गजानन, विनायक, कूष्माण्डराज- |