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श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

by महर्षि वेदव्यास

DevanagariHindipublished833 pages

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Page 805

अध्याय ९] व्याघ्रेश्वर, दण्डीश्वर, जैगीषव्येश्वर तथा शातातपेश्वर आदि लिङ्गोंका वर्णन ८०३


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
पूर्वामुखं तु तल्लिङ्गं देवलेन प्रतिष्ठितम्।<br>तेन दृष्टेन देवेशि ज्ञानवान् जायते नरः॥ ३३<br><br>तस्यैव च समीपस्थं शतकालप्रतिष्ठितम्।<br>तस्य दक्षिणदिग्भागे नातिदूरे तपस्विनि॥ ३४उसके पश्चिमभागमें एक सिद्धकूप है। उसके दक्षिणमें [महर्षि] देवलके द्वारा स्थापित एक पूर्वाभिमुख लिङ्ग है, हे देवेशि! उसके दर्शनसे मनुष्य ज्ञानवान् हो जाता है॥ ३२-३३॥<br><br>हे तपस्विनि! उसके दक्षिण दिशाभागमें अधिक दूरीपर नहीं, अपितु उसके समीपमें ही शतकालके द्वारा स्थापित एक लिङ्ग है॥ ३४॥
मुखलिङ्गं तु तद्भद्रे पश्चिमाभिमुखं शुभे।<br>शातातपेश्वरं नाम स्थापितं च महर्षिणा॥ ३५<br><br>तेन दृष्टेन लभते गतिमिष्टाञ्च शाश्वतीम्।<br>तस्य पश्चिमदिग्भागे महालिङ्गं च तिष्ठति॥ ३६<br><br>हेतुकेश्वरनामानं सर्वसिद्धिफलप्रदम्।<br>तस्यैव दक्षिणे भागे मुखलिङ्गं च तिष्ठति॥ ३७हे भद्रे! वह मुखलिङ्ग पश्चिमकी ओर मुखवाला है। हे शुभे! शातातपेश्वर नामक वह लिङ्ग महर्षि शातातपके द्वारा स्थापित किया गया है, उसके दर्शनसे मनुष्य वांछित तथा शाश्वत गति प्राप्त करता है। उसके पश्चिम दिशाभागमें सभी सिद्धियोंका फल प्रदान करनेवाला हेतुकेश्वर नामक महालिङ्ग स्थित है। उसीके दक्षिणभागमें मुखलिङ्ग स्थित है॥ ३५-३७॥
कणादेश्वरनामानं पश्चिमाभिमुखं स्थितम्।<br>सिद्धस्तत्र महाभागे कणादस्तु ऋषिः पुरा॥ ३८कणादेश्वर नामक वह लिङ्ग पश्चिमकी ओर मुख किये स्थित है। हे महाभागे! पूर्वकालमें ऋषि कणाद वहाँपर सिद्धिको प्राप्त हुए थे॥ ३८॥
कूपस्तत्र समीपस्थः पुण्यदः सर्वदेहिनाम्।<br>कणादेशाद्दक्षिणेन अन्यदायतनं शुभम्॥ ३९<br><br>पश्चान्मुखन्तु भूतीशं सर्वपापप्रणाशनम्।<br>तस्यैव पश्चिमे भागे लिङ्गं पश्चान्मुखं स्थितम्॥ ४०<br><br>चतुर्मुखं तु तल्लिङ्गमाषाढं नाम विश्रुतम्।<br>अन्यानि तत्र लिङ्गानि स्थापितानि महान्ति च॥ ४१वहाँ समीपमें ही सभी प्राणियोंको पुण्य प्रदान करनेवाला कूप विद्यमान है। कणादेश्वरके दक्षिणमें दूसरा शुभ आयतन है, वह पश्चिमकी ओर मुखवाला तथा सभी पापोंका नाश करनेवाला है। उसीके पश्चिम भागमें एक पश्चिमाभिमुख मुखलिङ्ग स्थित है, वह चतुर्मुखलिङ्ग आषाढ नामसे प्रसिद्ध है। वहाँ अन्य महालिङ्ग भी स्थापित किये गये हैं॥ ३९-४१॥
तेषां पूर्वेण लिङ्गं तु दैत्येन स्थापितं पुरा।<br>तेन दृष्टेन देवेशि पुत्रवान् जायते नरः॥ ४२उनके पूर्वमें प्राचीन कालमें [एक] दैत्यके द्वारा लिङ्ग स्थापित किया गया है, हे देवेशि! उसके दर्शनसे मनुष्य पुत्रवान् हो जाता है॥ ४२॥
भारभूतेश्वरं देवं तत्र दक्षिणतः स्थितम्।<br>पश्चान्मुखं तु तल्लिङ्गं भारभूतेश्वरं प्रिये॥ ४३उसके दक्षिणमें भारभूतेश्वर नामक लिङ्ग स्थित है। हे प्रिये! वह भारभूतेश्वरलिङ्ग पश्चिमकी ओर मुखवाला है॥ ४३॥
व्यासेश्वरस्य पूर्वेण लिङ्गं पश्चान्मुखं स्थितम्।<br>पराशरेण मुनिना स्थापितं मम भक्तितः॥ ४४व्यासेश्वरके पूर्वमें एक पश्चिमाभिमुख लिङ्ग स्थित है, उसे पराशरमुनिने मेरी भक्तिसे स्थापित किया है॥ ४४॥
पश्चान्मुखं तु तद्देवि मुखलिङ्गं च तिष्ठति।<br>अत्रिणा स्थापितं भद्रे मम भक्तिपरेण च॥ ४५हे देवि! वहाँ पश्चिमकी ओर मुखवाला एक मुखलिङ्ग स्थित है। हे भद्रे! मेरी भक्तिसे युक्त मुनि