श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
by महर्षि वेदव्यास
DevanagariHindipublished833 pages
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| ८०४ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ परिशिष्ट |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| पश्चान्मुखं तु तल्लिङ्गं सर्वशास्त्रप्रदायकम्।<br>व्यासेश्वरस्य पूर्वेण द्वौ लिङ्गौ तत्र सुव्रते॥ ४६<br><br>स्थापितौ देवदेवेशि शङ्खेन लिखितेन च।<br>तौ दृष्ट्वा मानवो भद्रे ऋषिलोकमवाप्नुयात्॥ ४७ | अत्रिके द्वारा वह लिङ्ग स्थापित किया गया है। पश्चिमकी ओर मुखवाला वह लिङ्ग सभी शास्त्रोंका ज्ञान देनेवाला है॥ ४५ १/२ ॥<br><br>हे सुव्रते! हे देवदेवेशि! व्यासेश्वरके पूर्वमें वहाँ शंख तथा लिखित [मुनिद्वय]-के द्वारा दो लिङ्ग स्थापित किये गये हैं, हे भद्रे! उन दोनोंका दर्शन करके मनुष्य ऋषिलोक प्राप्त करता है॥ ४६-४७॥ |
| अन्यच्च देवदेवस्य स्थानं गुह्यं यशस्विनि।<br>लिङ्गं विश्वेश्वरं नाम सर्वदेवैस्तु वन्दितम्॥ ४८<br><br>तेन दृष्टेन लभ्येत व्रतात्पाशुपतात्फलम्। | हे यशस्विनि! देवदेवका अन्य गुह्य स्थान भी है, विश्वेश्वर नामक वह लिङ्ग सभी देवताओंद्वारा वन्दित है। उसके दर्शनसे मनुष्य पाशुपतव्रतसे होनेवाला फल प्राप्त करता है॥ ४८ १/२ ॥ |
| पूर्वोत्तरदिशाभागे तस्य देवस्य सुन्दरि॥ ४९<br><br>अवधूतं महत्तीर्थं सर्वपापापनुत्तमम्।<br>तस्य पूर्वेण संल्लग्नं नाम्ना पशुपतीश्वरम्॥ ५०<br><br>तस्य दर्शनमात्रेण पशुयोनिं न गच्छति।<br>चतुर्मुखं तु तल्लिङ्गं पश्चिमाभिमुखं स्थितम्॥ ५१ | हे सुन्दरि! उस लिङ्गके पूर्वोत्तर दिशाभागमें सभी पापोंका नाश करनेवाला अवधूत नामक उत्तम महातीर्थ विद्यमान है। उसके पूर्वमें समीपमें ही पशुपतीश्वर नामक लिङ्ग है, उसके दर्शनमात्रसे मनुष्य पशुयोनिमें नहीं जाता है। वह लिङ्ग चतुर्मुख है तथा पश्चिमकी ओर मुख किये स्थित है॥ ४९-५१॥ |
| तस्य दक्षिणदिग्भागे लिङ्गं पञ्चमुखं स्थितम्।<br>ऋषिणा स्थापितं भद्रे गोभिलेन महात्मना॥ ५२<br><br>तं दृष्ट्वा मानवो देवि ऋषिलोकं स गच्छति।<br>तस्यैव पश्चिमे देवि लिङ्गं पश्चान्मुखं स्थितम्॥ ५३<br><br>विद्याधराधिपतिना कृतं जीमूतवाहिना॥ ५४ | हे भद्रे! उसके दक्षिण दिशाभागमें पंचमुख लिङ्ग स्थित है, महान् आत्मावाले ऋषि गोभिलने उसे स्थापित किया है। हे देवि! उसका दर्शन करके मनुष्य ऋषिलोकको जाता है। हे देवि! उसीके पश्चिममें विद्याधरोंके अधिपति जीमूतवाहीके द्वारा स्थापित किया गया पश्चिमकी ओर मुखवाला लिङ्ग स्थित है॥ ५२-५४॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे गुह्यायतनवर्णनं नाम नवमोऽध्यायः॥ ९॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणमें 'गुह्यायतनवर्णन' नामक नौवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ९॥
दसवाँ अध्याय
गभस्तीश्वर तथा उसके समीपस्थ लिङ्गोंका माहात्म्य एवं कलशेश्वरलिङ्गकी उत्पत्ति-कथा
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| ईश्वर उवाच<br>अन्यदायतनं देवि वाराणस्यां मम प्रिये।<br>गभस्तीश्वरनामानं लिङ्गं पश्चान्मुखं स्थितम्॥ १<br>सूर्येण स्थापितं भद्रे मम भक्तिपरेण वै।<br>तस्मिन् ममापि सान्निध्यं नित्यमेव यशस्विनि॥ २ | **ईश्वर बोले—**हे प्रिये! वाराणसीमें मेरा दूसरा आयतन भी है। गभस्तीश्वर नामक वह लिङ्ग पश्चिमाभिमुख स्थित है, हे भद्रे! मेरी भक्तिसे युक्त होकर सूर्यने उसे स्थापित किया है। हे यशस्विनि! उसमें भी सर्वदा मेरा सान्निध्य रहता है॥ १-२॥ |