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श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

by महर्षि वेदव्यास

DevanagariHindipublished833 pages

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८२२श्रीलिङ्गमहापुराण[ परिशिष्ट

| ईप्सितं फलमाप्नोति मातृणां च प्रसादतः।<br>अगस्त्येशाद्दक्षिणतो लिङ्गं पूर्वामुखं स्थितम्॥ ३३<br><br>पुलस्त्येश्वरनामानं सर्वरोगविवर्धनम्।<br>तस्य दक्षिणदिग्भागे लिङ्गमन्यच्च तिष्ठति॥ ३४ | मनुष्य, चाहे वह स्त्री हो अथवा पुरुष हो, स्नान करता है, वह मातृकाओंकी कृपासे वांछित फल प्राप्त करता है। अगस्त्येशके दक्षिणमें सभी प्रकारके आरोग्यकी वृद्धि करनेवाला पुलस्त्येश्वर नामक पूर्वाभिमुख लिङ्ग स्थित है॥ ३१-३३१/२॥ | | पुष्पदन्तेश्वरं नाम सर्वसिद्धिप्रदायकम्।<br>तस्यैवाग्रे तु कोणे तु लिङ्गानि सुमहन्ति च॥ ३५<br><br>देवर्षिगणपुष्टानि सर्वसिद्धिकराणि च।<br>तस्यैव पूर्वदिग्भागे महदाश्चर्यदायकम्॥ ३६<br><br>पञ्चोपचारपूजायां स्वप्नसिद्धिं करिष्यति।<br>लिङ्गं सिद्धेश्वरं नाम पूर्वाभिमुखसंस्थितम्॥ ३७ | उसके दक्षिण दिशाभागमें सभी सिद्धियाँ प्रदान करनेवाला पुष्पदन्तेश्वर नामक एक अन्य लिङ्ग स्थित है। उसीके आगे कोणमें महान् लिङ्ग विद्यमान हैं; वे देवर्षियोंके द्वारा स्थापित किये गये हैं और सभी प्रकारकी सिद्धियाँ देनेवाले हैं। उसीके पूर्व दिशाभागमें महान् आश्चर्यजनक लिङ्ग विद्यमान हैं। सिद्धेश्वर नामक पूर्वाभिमुख स्थित वह लिङ्ग पंचोपचारपूजाके द्वारा स्वप्नसिद्धि प्रदान करता है॥ ३४-३७॥ |

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे वाराणसीमाहात्म्ये गुह्यायतनावर्णनं नाम त्रयोदशोऽध्यायः॥ १३॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत वाराणसी-माहात्म्यमें 'गुह्यातनवर्णन' नामक तेरहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ १३॥


चौदहवाँ अध्याय

हरिश्चन्द्रेश्वर, नैर्ऋतेश्वर, अम्बरीषेश्वर, शंकुकर्णेश्वर, कपर्दीश्वर, अंगारेश्वर तथा छागलेश्वर आदि लिङ्गोंकी महिमाका वर्णन

ईश्वर उवाचईश्वर बोले—
अन्यच्चैव प्रवक्ष्यामि हरिश्चन्द्रेश्वरं शुभम्।<br>यत्र सिद्धो महात्मा वै हरिश्चन्द्रो महाबलः॥ १अब मैं हरिश्चन्द्रेश्वर नामक अन्य शुभ लिङ्गका वर्णन करूँगा, जहाँपर महाबली हरिश्चन्द्र सिद्ध महात्मा हुए थे॥ १॥
तं दृष्ट्वा मानवो देवि रुद्रस्य पदमाप्नुयात्।<br>पूर्वामुखं तु तल्लिङ्गं स्वर्गलोकप्रदायकम्॥ २हे देवि! उसका दर्शन करके मनुष्य रुद्रका पद प्राप्त करता है। वह पूर्वाभिमुख लिङ्ग स्वर्गलोक प्रदान करनेवाला है॥ २॥
हरिश्चन्द्रेश्वराद्देवि अन्यल्लिङ्गं तु पश्चिमे।<br>पूर्वामुखं तु तं देवि नाम्ना वै नैर्ऋतेश्वरम्॥ ३<br><br>तस्य सन्दर्शनाद्देवि कैवल्यं ज्ञानमाप्नुयात्।<br>तस्यैव दक्षिणे लिङ्गं पूर्वामुखमवस्थितम्॥ ४<br><br>नाम्ना ह्याङ्गिरसेशं तद्वैराग्यसुखदायकम्।<br>तस्यैव दक्षिणे देवि क्षेमेश्वरमनुत्तमम्॥ ५हे देवि! हरिश्चन्द्रेश्वरके पश्चिममें दूसरा पूर्वाभिमुख एक लिङ्ग स्थित है। हे देवि! वह नैर्ऋतेश्वर नामसे प्रसिद्ध है। हे देवि! उसके दर्शनसे मनुष्य कैवल्यज्ञान प्राप्त करता है। उसीके दक्षिणमें आंगिरसेश नामसे प्रसिद्ध पूर्वाभिमुख लिङ्ग स्थित है, वह वैराग्यसुख प्रदान करनेवाला है॥ ३-४१/२॥
तस्य दक्षिणदिग्भागे केदारं नाम विश्रुतम्।<br>तं दृष्ट्वा मनुजो देवि रुद्रस्यानुचरो भवेत्॥ ६हे देवि! उसीके दक्षिणमें अत्युत्तम क्षेमेश्वर [लिङ्ग] विद्यमान है। उसके दक्षिण दिशाभागमें केदार नामक प्रसिद्ध लिङ्ग है। हे देवि! उसका दर्शन