श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'
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| ९८ | श्रीरामकृष्णवचनामृत | २८ अक्टूबर, १८८२ |
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संसारी लोगों का स्वभाव। नाममाहात्म्य
श्रीरामकृष्ण – जिन्हें मैं देखता हूँ कि मन ईश्वर पर नहीं है, उनसे कहता हूँ 'तुम कुछ देर वहाँ जाकर बैठो' या कह देता हूँ, 'जाओ, इमारतें (रानी रासमणि के मन्दिर आदि) देखो।' (सब हँसे।)
“कभी तो देखा है कि भक्तों के साथ निकम्मे आदमी आए हैं। उनमें बड़ी विषयबुद्धि रहती है। ईश्वरी चर्चा नहीं सुहाती। भक्त तो बड़ी देर तक मुझसे ईश्वरी वार्तालाप करते हैं, पर वे लोग उधर बैठे नहीं रह सकते; तड़फड़ाते हैं। बार बार कानों में फिसफिसाते हुए कहते हैं, 'कब चलोगे – कब चलोगे?' उन्होंने अगर कहा, 'ठहरो भी, जरा देर बाद चलते हैं', तो इन लोगों ने रूठकर कहा, 'तो तुम बातचीत करो, हम नाव पर चलकर बैठते हैं।' (सब हँसे।)
“संसारी मनुष्यों से यदि कहो कि सब छोड़-छाड़कर ईश्वर के पादपद्मों में मन लगाओ तो वे कभी न सुनेंगे। यही कारण है कि गौरांग और नित्यानन्द दोनों भाइयों ने आपस में विचार करके यह व्यवस्था की – 'मागुर माछेर झोल (मागुर मछली की रसदार तरकारी), युवती मेयेर कोल (युवती स्त्री का अंक), बोल हरि बोल।' प्रथम दोनों के लोभ से बहुत आदमी 'हरि बोल' में शामिल होते थे। फिर तो हरिनामामृत का कुछ स्वाद पाते ही वे समझ जाते थे कि 'मागुर माछेर झोल' और कुछ नहीं है, – ईश्वरप्रेम के जो आँसू उमड़ते हैं, वही है। और युवती स्त्री है पृथ्वी – 'युवती स्त्री का अंक' अर्थात् भगवत्-प्रेम के कारण धूलि में लोटपोट हो जाना।
“नित्यानन्द किसी तरह हरिनाम करा लेते थे। चैतन्यदेव ने कहा है, ईश्वर के नाम का बड़ा माहात्म्य है। फल जल्दी न मिलने पर भी कभी न कभी अवश्य प्राप्त होगा। जैसे, कोई पक्के मकान के आले में बीज रखा गया था। बहुत दिनों के बाद जब मकान गिर गया – मिट्टी में मिल गया, तब भी उस बीज से पेड़ पैदा हुआ और उसमें फल भी लगे।”
मनुष्यप्रकृति तथा तीन गुण। भक्ति का सत्त्व, रज, तम।
श्रीरामकृष्ण – जैसे संसारियों में सत्त्व, रज और तम – ये तीनों गुण हैं, भक्ति में भी सत्त्व, रज और तम तीन गुण हैं।
“संसारियों का सत्त्वगुण कैसा होता है, जानते हो? घर यहाँ टूटा है, वहाँ टूटा है – मरम्मत नहीं कराते। पूजागृह के बरामदे में कबूतरों की विष्ठा पड़ी है। आँगन में काई जम गयी है। होश तक नहीं। असबाब सब पुराने हो गए हैं। ठीक-ठाक करने की कोशिश नहीं करते। कपड़ा जो मिला वही सही। देखने में सीधेसादे, शान्त, दयालु, मिलनसार, कभी किसी का बुरा नहीं चाहते।
“और फिर संसारियों के रजोगुण के भी लक्षण हैं। जेब-घड़ी, चेन, उँगलियों में
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