श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
प्रारंभिक पृष्ठ, प्राक्कथन व प्रस्तावना
१
श्रीरामकृष्णवचनामृत
२०.४
गुप्त - श्री
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श्रीरामकृष्ण
वचनामृत
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२०-४
गुप्त - श्री
14,017
गुरुकुल काँगड़ी विश्वविद्यालय, हरिद्वार
कृपया पुस्तक के ऊपर कोई निशान
आदि न लगायें।
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पुस्तकालय
गुरुकुल काँगड़ी विश्वविद्यालय, हरिद्वार
वर्ग संख्या २०-४ / गुप्त-श्री \qquad आगत संख्या 141017
पुस्तक विवरण की तिथि नीचे अंकित है। इस तिथि सहित ३० वें दिन यह पुस्तक पुस्तकालय में वापस आ जानी चाहिए अन्यथा ५० पैसे प्रतिदिन के हिसाब से विलम्ब दण्ड लगेगा ।
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श्रीरामकृष्णवचनामृत
प्रथम भाग
श्री महेन्द्रनाथ गुप्त
(श्री ‘म’)
रामकृष्ण मठ
नागपुर
(GK)
141817
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प्रकाशक :
स्वामी ब्रह्मस्थानन्द
अध्यक्ष, रामकृष्ण मठ
रामकृष्ण आश्रम मार्ग
धन्तोली, नागपुर-४४० ०१२
अनुवादक :
पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'
श्रीरामकृष्ण-शिवानन्द-स्मृतिग्रन्थमाला
प्रथम पुष्प
(रामकृष्ण मठ, नागपुर द्वारा सर्वाधिकार स्वरक्षित)
[ व ०५ : प्र ३० ]
(इक्कीसवाँ संस्करण)
दि. २.८.२००५
मूल्य : रु. १२०.००
मुद्रक :
श्रीनिवास मुद्रणालय, नागपुर
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प्रस्तावना
(प्रथम संस्करण)
भगवान् श्रीरामकृष्ण परमहंसदेव का जीवन नितान्त आध्यात्मिक था। ईश्वरीय भाव उनके लिए ऐसा ही स्वाभाविक था जैसा किसी प्राणी के लिए श्वास लेना। उनके जीवन का प्रत्येक क्षण मनुष्य-मात्र के लिए आदेशप्रद कहा जा सकता है तथा उनके उपदेश विशेष रूप से अध्यात्म-गर्भित हैं और सार्वलौकिक होते हुए मानव जीवन पर अपना प्रभाव डालने में अद्वितीय हैं।
श्रीरामकृष्ण परमहंसदेव का संभाषण तथा उनके उपदेशों का सर्वप्रथम संकलन तथा संपादन उनके एक अनन्य गृहस्थ भक्त श्रीम (श्री महेन्द्रनाथ गुप्त) ने ५ जिल्दों में ‘श्रीरामकृष्ण कथामृत’ के नाम से किया था। कुछ समय बाद इन ग्रन्थों का अनुवाद किया गया तथा यह अनुवाद क्रमपूर्वक मासिक हिन्दी पत्रिका ‘समन्वय’ में प्रकाशित हुआ। अनुवाद में संभाषणों तथा उपदेशों का क्रम तारीखवार रखा गया। ‘समन्वय’ पत्रिका मायावती अद्वैत आश्रम, हिमालय से प्रकाशित होती थी और इसके कुशल संपादक थे श्री स्वामी माधवानन्दजी, जो आजकल श्रीरामकृष्ण मठ तथा मिशन के मंत्री हैं। इन ग्रन्थों के हिन्दी अनुवाद का श्रेय हिन्दी संसार के लब्धप्रतिष्ठ लेखक तथा सुविख्यात छायावादी कवि श्री पं. सूर्यकान्तजी त्रिपाठी ‘निराला’ को है। इस महत्त्वपूर्ण कार्य के लिए हम श्री ‘निराला’जी के विशेष आभारी हैं। बंगला भाषा का पूर्ण ज्ञान रखने के कारण श्री निरालाजी ने अनुवाद में केन्द्रीय भावों तथा शैली आदि को ज्यों का त्यों रखा है और साथ ही साथ साहित्यिक दृष्टि से भी उसे बहुत ऊँचा बनाया है।
श्री स्वामी पवित्रानन्दजी, अध्यक्ष, मायावती, अद्वैत आश्रम, के भी हम बड़े कृतज्ञ हैं जिन्होंने हमें उस पुस्तक की सारी सामग्री दी है तथा इसको पुस्तक रूप में प्रकाशित करने की अनुमति।
साहित्य-शास्त्री प्रोफेसर श्री पं. विद्याभास्करजी शुक्ल, एम्.एस्.सी., पी.ई.एस्., कॉलेज ऑफ साइन्स, (नागपुर यूनिवर्सिटी) नागपुर, के प्रति भी हम अपनी कृतज्ञता प्रकट किए बिना नहीं रह सकते हैं। प्रो. शुक्लजी ने निर्मल भक्ति-भाव से इस पुस्तक में दी हुई श्रीरामकृष्ण परमहंसदेव की सुन्दर, संक्षेप जीवनी लिखी है। यह जीवनी परमहंस महाराज के उपदेशों के लिए प्रस्तावना के रूप में विशेष लाभदायक होगी। श्री शुक्ल जी ने इस पुस्तक को आद्योपान्त ध्यान से देखा है तथा कई उपयुक्त सूचनाएँ भी दी
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(४)
हैं और इसके लिए हम उन्हें धन्यवाद देते हैं।
मौलिक बंगाली कथामृत का अनुवाद अन्य कई भाषाओं में हो चुका है और इसका पूर्ण रूप से तथा क्रमानुसार हिन्दी में अनुवाद होना बहुत समय से वांछनीय था। हमें आशा है हमारे इस प्रकाशन से हिन्दी जनता की एक बड़ी जरूरत की पूर्ति हो जाएगी। साथ ही यह पुस्तक श्रीरामकृष्ण आश्रम, धन्तोली, नागपुर, सी. पी. से प्रकाशित श्रीरामकृष्ण परमहंसदेव की विस्तृत जीवनी (श्रीरामकृष्ण लीलामृत भाग १ और २) के लिए परिपूरक के सदृश है।
हमारे इस प्रकाशन से यदि पाठकों को कुछ लाभ हुआ तो हमें बड़ी प्रसन्नता होगी और हम अपने यत्नों को सफल मानेंगे।
हमारी यह आन्तरिक एवं हार्दिक प्रार्थना है कि यह पुस्तक उन सज्जनों के लिए पथ-पदर्शक हो जो सत्य की खोज में दृढ़ मन से लगे हैं।
वैशाख, अक्षय तृतीया
ता. २९-४-१९४१
नागपुर, सी.पी.
— प्रकाशक
वक्तव्य
(सतरहवाँ संस्करण)
प्रस्तुत ग्रन्थ हिन्दी में प्रथम तीन भागों में हमने प्रकाशित किया था। पाठकों की सुविधा के लिए अब हम इसे दो भागों में प्रकाशित कर रहे हैं, जिसका प्रथम भाग आपके हाथ में है। इसमें २६ फरवरी १८८२ से ४ अक्टूबर १८८४ तक का वार्तालाप आया है। दूसरे भाग में अक्टूबर १८८४ से २४ अप्रैल १८८६ तक का वार्तालाप समाविष्ट है।
विश्वास है, यह पुस्तक पाठकों का सभी दृष्टि से हित करने में सफल होगी।
नागपुर
दि. २८.७.१९९९
— प्रकाशक
श्रीमाताजी का आशीर्वाद
भगवान् श्रीरामकृष्णदेव की लीलासहधर्मिणी परमआराध्या श्री माँ सारदादेवी ने ‘श्रीरामकृष्णकथामृत’ के सम्बन्ध में उसके रचयिता श्री महेन्द्रनाथ गुप्त (श्री ‘म’) को निम्नलिखित पत्र लिखा था :-
“बेटा,
उनके (श्रीरामकृष्णदेव के) निकट तुमने जो बातें सुनी थीं वही बातें सत्य हैं। इस विषय में तुम्हें कोई भय नहीं। किसी समय उन्होंने ही तुम्हारे निकट इन बातों को रख छोड़ा था। अब आवश्यकतानुसार वेही इन्हें प्रकट करा रहे हैं। जान रखो कि इन बातों को व्यक्त किये बिना लोगों का चैतन्य जागृत नहीं होगा। तुम्हारे पास उनकी जो बातें संचित हैं वे सभी सत्य हैं। एक दिन तुम्हारे मुँह से उन्हें सुनकर मुझे ऐसा प्रतीत हुआ मानो वे स्वयं ही ये सब बातें कह रहे हैं।”
तव कथामृतं तप्तजीवनं
कविभिरीडितं कल्मषापहम्।
श्रवणमंगलं श्रीमदाततं
भुवि गृणन्ति ये भूरिदा जनाः॥
– प्रभो, तुम्हारी लीलाकथा अमृतस्वरूप है। तापतप्त जीवों के लिए तो वह जीवनस्वरूप है। ज्ञानी महात्माओं ने उसका गुणगान किया है। वह पापपुंज को हरनेवाली है। उसके श्रवणमात्र से परम कल्याण होता है। वह परम मधुर तथा सुविस्तृत है। जो तुम्हारी इस प्रकार की लीलाकथा का गान करते हैं, वास्तव में इस भूतल में वे ही सर्वश्रेष्ठ दाता हैं।
(श्रीमद्भागवत, १०।३१।९)
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भगवान् श्रीरामकृष्णदेव की
संक्षिप्त जीवनी
हम यह देखते हैं कि श्रीरामचन्द्र तथा भगवान् बुद्ध को छोड़कर बहुधा अन्य सभी अवतारी महापुरुषों का जन्म संकटग्रस्त परिस्थितियों में ही हुआ है, और यह कहा जा सकता है कि भगवान् श्रीरामकृष्ण भी किसी विशेष प्रकार के सुखद वातावरण में इस संसार में अवतरित नहीं हुए।
श्रीरामकृष्ण का जन्म हुगली प्रान्त के कामारपुकुर गाँव में एक श्रेष्ठ ब्राह्मण परिवार में शकाब्द १७५७ फाल्गुन मास की शुक्लपक्ष द्वितीया तदनुसार बुधवार ता. १७ फरवरी १८३६ ई. को हुआ। कामारपुकुर गाँव बर्दवान से लगभग चौबीस-पचीस मील दक्षिण तथा जहानाबाद (आरामबाग) से लगभग आठ मील पश्चिम में है।
श्रीरामकृष्ण के पिता श्री क्षुदिराम चट्टोपाध्याय परम सन्तोषी, सत्यनिष्ठ एवं त्यागी पुरुष थे, और उनकी माता श्री चन्द्रमणि देवी सरलता तथा दयालुता की मूर्ति थीं। यह आदर्श दम्पति पहले देरे नामक गाँव में रहते थे, परन्तु वहाँ के अन्यायी जमींदार की कुछ जबरदस्तियों के कारण इन्हें वह गाँव छोड़कर करीब तीन मील की दूरी पर इसी कामारपुकुर गाँव में आ बसना पड़ा।
बचपन में श्रीरामकृष्ण का नाम गदाधर था। अन्य बालकों की भाँति वे भी पाठशाला भेजे गये, परन्तु एक ईश्वरी अवतार एवं संसार के पथ-प्रदर्शक को उस 'अ, आ, इ, ई' की पाठशाला में चैन कहाँ? बस, जी उचटने लगा, और मन लगा घर में स्थापित आनन्दकन्द सच्चिदानन्द भगवान् श्रीरामजी की मूर्ति में – स्वयं वे फूल तोड़ लाते और इच्छानुसार मनमानी उनकी पूजा करते।
कहते हैं कि अवतारी पुरुषों में कितने ही ऐसे गुण छिपे रहते हैं कि उनका अनुमान करना कठिन होता है। श्री गदाधर की स्मरणशक्ति विशेष तीव्र थी। साथ ही उन्हें गाने की भी रुचि थी और विशेषतः भक्तिपूर्ण गानों के प्रति।
साधु-संन्यासियो के जत्थों के दर्शन तो मानो इनकी जीवनी में संजीवनी का कार्य करते थे। अपने घर के पास लाहा की अतिथिशाला में जहाँ बहुधा संन्यासी उतरा करते थे, इनका काफी समय जाता था। मुहल्ले के बालक, वृद्ध, सभी ने न जाने इनमें कौनसा दैवी गुण परखा था कि वे सब इनसे बड़े प्रसन्न रहते थे। रामायण, महाभारत, गीता आदि के श्लोक ये केवल बड़ी भक्ति से सुनते ही नहीं थे, वरन् उनमें से बहुतसे उन्हें सहजरूप
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(८)
कण्ठस्थ भी हो जाया करते थे।
यह दैवी बालक अपनी करतूतें शुरू से ही दिखाते रहा और कह नहीं सकते कि उसके बचपन से ही कितनों ने उसे ताड़ा होगा।
छिपे हुए दैवी गुणों का विकास पहले-पहल उस बार हुआ जब यह बालक अपने गाँव के समीपवर्ती आनुड़ गाँव को जा रहा था। एकाएक इस बालक को एक विचित्र प्रकार की ज्योति का दर्शन हुआ और वह बाह्यज्ञानशून्य हो गया। कहना न होगा कि मायाग्रस्त सांसारिकों ने जाना कि गर्मी के कारण वह मूर्च्छा थी, परन्तु वास्तव में वह थी भावसमाधि।
अपने पिता की मृत्यु के बाद श्रीरामकृष्ण अपने ज्येष्ठ भ्राता के साथ, जो एक बड़े विद्वान् पुरुष थे, कलकत्ता आये। उस समय वे लगभग १७-१८ वर्ष के थे। कलकत्ते में उन्होंने एक दो स्थानों पर पूजन का कार्य किया। इसी अवसर पर रानी रासमणि ने कलकत्ते से लगभग पाँच मील पर दक्षिणेश्वर में एक मन्दिर बनवाया और श्रीकालीदेवी की स्थापना की। ता. ३१ मई १८५५ को इसी मन्दिर में श्रीरामकृष्ण के ज्येष्ठ भ्राता श्री रामकुमारजी कालीमन्दिर के पुजारीपद पर नियुक्त हुए, परन्तु यह कार्यभार शीघ्र ही श्रीरामकृष्ण पर आ पड़ा। श्रीरामकृष्ण उक्त मन्दिर में पूजा करते थे, परन्तु अन्य साधारण पुजारियों की भाँति वे कोरी पूजा नहीं करते थे, परन्तु पूजा करते समय ऐसे मग्न हो जाते थे कि उस प्रकार की अलौकिक मग्नता ‘देखा सुना कबहुँ नहीं कोई’ – और यह अक्षरशः सत्य भी क्यों न हो? ईश्वर ही ईश्वर की पूजा कर रहे थे! उस भाव का वर्णन कौन कर सकता है जिससे श्रीरामकृष्ण प्रेरित हो, ध्यानावस्थित हो श्रीकालीदेवी पर फूल चढ़ाते थे! आँखॊ में अश्रुधारा बह रही है, तन-मन की सुध नहीं, हाथ काँप रहे हैं , हृदय उल्लास से भरा है, मुख से शब्द नहीं निकलते हैं, पैर भूमि पर स्थिर नहीं रहते है और घण्टी, आरती आदि तो सब किनारे ही पड़ी रही – श्रीकालीजी पर पुष्प चढ़ा रहे हैं और थोड़ी ही देर में उन्हें ही उन्हें देखते हैं – स्वयं में भी उन्हीं को देख रहे हैं और कम्पित कर से अपने ही ऊपर फूल चढ़ाने लगते हैं, कहते हैं – माँ-माँ-तुम-मैं-मैं-तुम और ध्यानमग्न हो समाधिस्थ हो जाते हैं। देखनेवाले समझते हैं कुछ का कुछ, परन्तु ईश्वर मुसकराते हैं, बड़े ध्यान से सब देखते हैं और विचारते होंगे कि यह रामकृष्ण हूँ तो मैं ही!
उनके हृदय की व्याकुलता की पराकाष्ठा उस दिन हो गयी जब व्यथित होकर माँ के दर्शन के लिए एक दिन मन्दिर में लटकती हुई तलवार उन्होंने उठा ली और ज्यो ही उससे वे अपना शरीरान्त करना चाहते थे कि उन्हें जगन्माता का अपूर्व अद्भुत दर्शन हुआ और देहभाव भूलकर वे बेसुध हो जमीन पर गिर पड़े। तदुपरान्त बाहर क्या हुआ और वह दिन तथा उसके बाद का दिन कैसे व्यतीत हुआ, यह उन्हें कुछ भी नहीं मालूम पड़ा। अन्तःकरण में केवल एक प्रकार के अननुभूत आनन्द का प्रवाह बहने लगा।
बेचारा मायाग्रस्त पुरुष यह सब कैसे समझ सकता है? उसके लिए तो दिव्य चक्षु की आवश्यकता होती है। बस श्रीरामकृष्ण के घर के लोग समझ गये कि इनके मस्तिष्क
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(९)
में कुछ फेरफार हो गया है और विचार करने लगे उसके उपचार का। किसी ने सलाह दी कि इनका विवाह कर दिया जाय तो शायद मानसिक विकार (?) दूर हो जाय। विवाह का प्रबन्ध होने लगा और कामारपुकुर से दो कोस पर जयरामवाटी ग्राम में रहनेवाले श्री रामचन्द्र मुखोपाध्याय की कन्या श्रीसारदामणि से इनका विवाह करा दिया गया।
परन्तु इस बालिका के दक्षिणेश्वर में आने पर भी श्रीरामकृष्ण के जीवन में कोई अन्तर नहीं हुआ और श्रीरामकृष्ण ने उस बालिका में प्रत्यक्ष देखा उन्हीं श्रीकालीदेवी को। एक सांसारिक बन्धन सम्मुख आया और वह था पति का कर्तव्य। बालिका को बुलाकर शान्ति से पूछा, “क्या तुम मुझे सांसारिक जीवन की ओर खींचना चाहती हो?” परन्तु उस बालिका ने तुरन्त उत्तर दिया, “मेरी यह बिलकुल इच्छा नहीं कि आप सांसारिक जीवन व्यतीत करें, पर हाँ, आपसे मेरी यह प्रार्थना अवश्य है कि आप मुझे अपने ही पास रहने दें, अपनी सेवा करने दें तथा योग्य मार्ग बतलावें।”
कहा जा सकता है कि उस बालिका ने एक आदर्श अर्द्धांगिनी का धर्म पूर्ण रूप से निबाहा। अपने सर्वस्व पति को ईश्वर मानकर उनके सुख में अपना सुख देखा और उनके आदर्श जीवन की साथिन बनकर उनकी सहायता करने लगी। श्रीरामकृष्ण को तो श्रीसारदादेवी और श्रीकालीदेवी एक ही प्रतीत होने लगीं और इस भाव की चरम सीमा उस दिन हुई जब उन्होंने श्रीसारदादेवी का साक्षात् श्रीजगदम्बाज्ञान से षोड़शोपचार पूजन किया। पूजाविधि पूर्ण होते ही श्रीसारदादेवी को समाधि लग गयी। अर्ध-बाह्यदशा में मन्त्रोच्चार करते-करते श्रीरामकृष्ण भी समाधिमग्न हो गये। देवी और उसके पुजारी दोनों ही एकरूप हो गये। कैसा उच्च भाव है – अनेकता में एकता झलकने लगी!
हीरे का परखनेवाला जौहरी निकल ही आता है। रानी रासमणि के जामाता श्री मथुरबाबू ने यह भाव कुछ ताड़ लिया और श्रीरामकृष्ण को परखकर शीघ्र ही उन्होंने उनकी सेवाशुश्रूषा का उचित प्रबन्ध कर दिया। इतना ही नहीं, बल्कि पुजारीपद पर एक दूसरे ब्राह्मण को नियुक्त कर उन्हें अपने भाव में मग्न रहने का पूरा-पूरा अवकाश दे दिया। साथ ही श्रीरामकृष्ण के भानजे श्री हृदयराम को उनकी सेवा आदि का कार्य सौंप दिया।
फिर श्रीरामकृष्ण ने विशेष पूजा नहीं की। दिनरात ‘माँ काली’ ‘माँ काली’ ही पुकारा करते थे; कभी जड़वत् हो मूर्ति की ओर देखते, कभी हँसते, कभी बालकों की तरह फूट-फूटकर रोते और कभी कभी तो इतने व्याकुल हो जाते कि भूमि पर लोटते-पोटते अपना मुँह तक रगड़ डालते थे।
इसके बाद श्रीरामकृष्ण ने भिन्न भिन्न साधनाएँ कीं और कई प्रकार के दर्शन प्राप्त कर लिये। कालीमन्दिर में एक बड़े वेदान्ती श्री तोतापुरीजी पधारे थे। वे वहाँ लगभग ग्यारह महीने रहे और उन्होंने श्रीरामकृष्ण से वेदान्त-साधना करायी। श्री तोतापुरीजी को यह देखकर आश्चर्य हुआ कि जिस निर्विकल्प समाधि को प्राप्त करने के लिए उन्हें चालीस वर्ष तक सतत प्रयत्न करना पड़ा था, उसे श्रीरामकृष्ण ने तीन ही दिन में सिद्ध कर डाला। इसके
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कुछ समय पूर्व ही वहाँ एक भैरवी ब्राह्मणी पधारी थीं। उन्होंने भी श्रीरामकृष्ण से अनेक प्रकार की तन्त्रोक्त साधनाएँ करायी थीं।
श्री वैष्णवचरण जो एक वैष्णव पण्डित थे, श्रीरामकृष्ण के पास बहुधा आया करते थे। वैष्णवचरण ने मथुरबाबू से कहा था यह उन्माद साधारण नहीं वरन् दैवी है। एक बार श्रीरामकृष्ण कलूटोला की हरिसभा में गये थे। वहाँ वे समाधिस्थ हो गये और चैतन्यदेव के आसन पर जा विराजे। श्रीचैतन्य की भाँति श्रीरामकृष्ण की कभी 'अन्तर्दशा', कभी 'अर्धबाह्य' और कभी 'बाह्य दशा' हो जाया करती थी। वे कहते थे कि अखण्ड सच्चिदानन्द परब्रह्म और माँ सब एक ही हैं।
उन्होंने कामिनी-कांचन का पूर्ण रूप से त्याग किया था। अपने भक्तगणों को, जो सैकड़ों की संख्या में उनके पास आते थे, वे कहा करते थे कि ये दोनों चीजें ईश्वरप्राप्ति के मार्ग में विशेष रूप से बाधक हैं। बुरे आचरणवाली नारी में भी वे जगन्माता का साक्षात् स्वरूप देखते थे और उसी भाव से आदर करते थे। उनका कांचनत्याग इतना पूर्ण था कि यदि वे पैसे या रुपये को छू लेते तो उनकी उँगलिया ही टेढ़ीमेढ़ी होने लगती थीं। कभी कभी वे गिन्नियों और मिट्टी को एक साथ अंजुली में लेकर गंगाजी के किनारे बैठ जाते थे और 'मिट्टी पैसा, पैसा मिट्टी' कहते हुए दोनों चीजों को मलते मलते श्रीगंगाजी की धार में बहा देते थे।
माता चन्द्रमणि को श्रीरामकृष्ण जगज्जननी का स्वरूप मानते थे। अपने ज्येष्ठ भ्राता श्री रामकुमार के स्वर्गलाभ के बाद श्रीरामकृष्ण उन्हें अपने ही पास रखते थे और उनकी पूजा करते थे।
मथुरबाबू तथा उनकी पत्नी जगदम्बा दासी के साथ वे एक बार वाराणसी, प्रयाग तथा वृन्दावन भी गये थे। उस समय हृदयराम भी साथ में थे। वाराणसी में उन्होंने मणिकर्णिका में समाधिस्थ होकर भगवान् शंकर के दर्शन किये और मौनव्रतधारी त्रैलंग स्वामी से भेंट की। मथुरा में तो उन्होंने साक्षात् भगवान् आनन्दकन्द, सच्चिदानन्द, अन्तर्यामी श्रीकृष्ण के दर्शन किये। कैसी उच्च भावदशा रही होगी!
'सेस, महेस, गनेस, दिनेस, सुरेशहुँ जाहि निरन्तर गावें, जाहि अनादि, अनन्त, अखण्ड, अछेद, अभेद सुवेद बतावें।'
(— श्रीरसखानि)
उन्हीं भगवान् श्रीकृष्ण को उन्होंने यमुना पार करते हुए गौओ को गोधूलि समय वापस लाते देखा और ध्रुवघाट पर से वसुदेव की गोद में भगवान् श्रीकृष्ण के दर्शन किये।
श्रीरामकृष्ण तो कभी कभी समाधिस्थ हो कहते थे, 'जो राम थे और जो कृष्ण थे वही अब रामकृष्ण होकर आये हैं।'
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(११)
सन् १८७९-८० में श्रीरामकृष्ण के अन्तरंग भक्त उनके पास आने लगे थे। उस समय उनकी उन्माद-अवस्था प्रायः चली-सी गयी थी और अब शान्त, सदानन्द और समाधि की अवस्था थी। बहुधा वे समाधिस्थ रहते थे और समाधि भंग होने पर भावराज्य में विचरण किया करते थे।
शिष्यों में उनके मुख्य शिष्य नरेन्द्र (बाद में स्वामी विवेकानन्द) थे। जब से श्री नरेन्द्र उनके पास आने लगे थे तभी से उन्हें नरेन्द्र के प्रति एक विशेष प्रेम हो गया था और वे कहते थे कि नरेन्द्र साधारण जीव नहीं है। कभी कभी तो नरेन्द्र के न आने से उन्हें व्याकुलता होती थी; क्योंकि वे यह अवश्य जानते रहे होंगे कि उनका कार्य भविष्य में मुख्यतः नरेन्द्र द्वारा ही संचालित होगा। अन्य भक्तगण राखाल, भवनाथ, बलराम, मास्टर महाशय आदि थे। ये भक्तगण १८८२ के लगभग आये और इसके उपरान्त दो-तीन वर्ष तक अनेक अन्य भक्त भी आये। इन सब भक्तों ने श्रीरामकृष्ण तथा उनके कार्य के लिए अपना जीवन अर्पित कर दिया।
ईश्वरचन्द्र विद्यासागर, डॉ. महेन्द्रलाल सरकार, बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय, अमेरिका के कुक साहब, पं. पद्मलोचन तथा आर्यसमाज के प्रवर्तक श्री स्वामी दयानन्द सरस्वतीजी ने भी उनके दर्शन किये थे।
ब्राह्मसमाज के अनेक लोग उनके पास आया जाया करते थे। श्रीरामकृष्ण केशवचन्द्र सेन के ब्राह्ममन्दिर में भी गये थे।
श्रीरामकृष्ण ने अन्य धर्मों की भी साधनाएँ कीं। उन्होंने कुछ दिनों तक इस्लाम धर्म का पालन किया और 'अल्लाह' मन्त्र का जप करते करते उन्होंने उस धर्म का अन्तिम ध्येय प्राप्त कर लिया। इसी प्रकार उसके उपरान्त उन्होंने ईसाई धर्म की साधना की और ईसामसीह के दर्शन किये। जिन दिनों वे जिस धर्म की साधना में लगे रहते थे, उन दिनों उसी धर्म के अनुसार रहते, खाते, पीते, बैठते-उठते तथा बातचीत करते थे। इन सब साधनाओ से उन्होंने यह दिखा दिया कि सब धर्म अन्त में एक ही ध्येय में पहुँचते हैं। और उनमें आपस में विरोध-भाव रखना मूर्खता है। ऐसा महान् कार्य करनेवाले ईश्वरी अवतार श्रीरामकृष्ण ही थे।
इस प्रकार ईश्वरप्राप्ति के लिए कामिनी-कांचन का सर्वथा त्याग तथा भिन्न भिन्न धर्मों में एकता की दृष्टि रखना इन्होंने अपने सभी भक्तों को सिखाया और उनसे उनका अभ्यास कराया। इनके कतिपय शिष्य आगे चलकर भारतवर्ष के अतिरिक्त अमेरिका आदि अन्य देशों में भी गये और वहाँ उन्होंने श्रीरामकृष्ण के उपदेशों का प्रचार किया।
१५ अगस्त सन् १८८६ की रात को गले के रोग से पीड़ित हो श्रीरामकृष्ण ने महासमाधि ले ली; परन्तु महासमाधि में गया केवल उनका पांचभौतिक शरीर। उनके उपदेश आज संसार भर में श्रीरामकृष्ण मिशन के द्वारा कोने कोने में गूँज रहे हैं और उनसे असंख्य जनों का कल्याण हो रहा है।
— विद्याभास्कर शुक्ल
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अनुक्रमणिका
प्रस्तावना ... (३)
वक्तव्य ... (४)
श्रीमाताजी का आशीर्वाद ... (६)
भगवान् श्रीरामकृष्णदेव की संक्षिप्त जीवनी ... (७)
१. प्रथम दर्शन ... १
२. द्वितीय दर्शन ... ४
३. तृतीय दर्शन ... ११
४. चतुर्थ दर्शन ... १९
५. बलराम के मकान पर श्रीरामकृष्ण तथा प्रेमानन्द में नृत्य २३
६. श्यामपुकुर में प्राणकृष्ण के मकान पर श्रीरामकृष्ण ... २६
७. श्रीरामकृष्ण तथा ईश्वरचन्द्र विद्यासागर ... ३६
८. दक्षिणेश्वर में केदार द्वारा आयोजित उत्सव ... ५२
९. दक्षिणेश्वर में भक्तों के साथ ... ५४
१०. दक्षिणेश्वर में अन्तरंग भक्तों के साथ ... ६१
११. दक्षिणेश्वर में भक्तों से वार्तालाप ... ७२
१२. दक्षिणेश्वर मन्दिर में बलराम आदि के साथ - ... ७७
१३. केशवचन्द्र सेन के साथ श्रीरामकृष्ण का नौका विहार, आनन्द और वार्तालाप ... ७९
१४. सींती का ब्राह्मसमाज - शिवनाथ आदि ब्राह्मभक्तों के साथ वार्तालाप और आनन्द ... ९६
१५. सर्कस में श्रीरामकृष्ण - ... १०९
१६. षड्भुजदर्शन! राजमोहन के मकान पर शुभागमन - नरेन्द्र ... ११२
१७. मनोमोहन तथा सुरेन्द्र के मकान पर श्रीरामकृष्ण ... ११३
१८. मणि मल्लिक के ब्राह्मोत्सव में श्रीरामकृष्ण ... ११५
१९. विजयकृष्ण गोस्वामी आदि के प्रति उपदेश ... ११७
२०. भक्तों के प्रति उपदेश ... १३२
२१. मारवाड़ी भक्तों के साथ ... १३५
२२. राखाल, प्राणकृष्ण, केदार आदि भक्तों के साथ ... १३७
२३. बेलघर में गोविन्द मुखोपाध्याय के मकान पर ... १४७
२४. दक्षिणेश्वर में राखाल, राम आदि के साथ ... १४९
२५. दक्षिणेश्वर में भक्तों के साथ ... १५२
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२६. दक्षिणेश्वर में श्रीरामकृष्ण का जन्मोत्सव ... १५५ २७. ब्राह्मभक्तों के प्रति उपदेश ... १६७ २८. नरेन्द्र आदि भक्तों के साथ बलराम के मकान पर ... १७१ २९. दक्षिणेश्वर में भक्तों के साथ ... १७४ ३०. सुरेन्द्र के मकान पर अन्नपूर्णा पूजा के उत्सव में ... १८६ ३१. सींती के ब्राह्मसमाज में ब्राह्मभक्तों के साथ ... १९१ ३२. नन्दनबागान के ब्राह्मसमाज में भक्तों के साथ ... १९७ ३३. भक्तों के साथ कीर्तनानन्द में ... २०१ ३४. दक्षिणेश्वर में भक्तों के साथ ... २०३ ३५. भक्तों के मकान पर ... २०६ ३६. दक्षिणेश्वर मन्दिर में भक्तों के साथ ... २१३ ३७. श्रीरामकृष्ण का प्रथम प्रेमोन्माद ... २२१ ३८. दक्षिणेश्वर मन्दिर में ... २२६ ३९. मणिरामपुर तथा बेलघर के भक्तों के साथ ... २२८ ४०. दक्षिणेश्वर में भक्तों के साथ ... २३७ ४१. दक्षिणेश्वर में भक्तों के साथ ... २४३ ४२. पानीहाटी महोत्सव में ... २४७ ४३. बलराम के मकान पर ... २५२ ४४. दक्षिणेश्वर में ... २५४ ४५. अधर के मकान पर ... २५७ ४६. भक्तों के साथ ... २५८ ४७. ब्रह्मतत्त्व तथा आद्याशक्ति ... २६८ ४८. बलराम के मकान पर ... २७७ ४९. दक्षिणेश्वर में भक्तों के साथ ... २७९ ५०. दक्षिणेश्वर मन्दिर में भक्तों के साथ ... २८७ ५१. गुरुशिष्य-संवाद - गुह्य कथा ... २९१ ५२. दक्षिणेश्वर मन्दिर में भक्तों के साथ ... २९४ ५३. अधर के मकान पर ईशान आदि भक्तों के संग में ... ३०२ ५४. दक्षिणेश्वर में राम आदि भक्तों के साथ ... ३१० ५५. मास्टर के प्रति उपदेश ... ३१४ ५६. अधर के मकान पर दुर्गापूजा-महोत्सव में ... ३२२ ५७. दक्षिणेश्वर में कार्तिकी पूर्णिमा ... ३२८ ५८. सिंदुरियापाटी में ब्राह्मभक्तों के प्रति उपदेश ... ३३५ ५९. केशव सेन के मकान पर ... ३४३ ६०. दक्षिणेश्वर में भक्तों के साथ ... ३६० ६१. दक्षिणेश्वर मन्दिर में भक्तों के साथ ... ३६७ ६२. दक्षिणेश्वर में अंतरंग भक्तों के साथ ... ३७५