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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

DevanagariHindipublished711 पृष्ठ

परिच्छेद ८०

परिच्छेद ८०

आत्मदर्शन के उपाय

(१)

फलहारिणी पूजा तथा विद्यासुन्दर कृत नाटक का अभिनय

श्रीरामकृष्ण उसी पूर्वपरिचित कमरे में बैठे हैं दिन के ११ बजे का समय हुआ। राखाल, मास्टर आदि भक्तगण उसी कमरे में उपस्थित हैं। गत रात्रि में फलहारिणी काली की पूजा हो गयी। उस उत्सव के उपलक्ष्य में सभा-मण्डप में रात्रि के तीसरे पहर से नाटक का अभिनय शुरू हुआ है – विद्यासुन्दर कृत नाटक।

श्रीरामकृष्ण ने प्रातःकाल काली माता के दर्शन को जाते समय थोड़ा अभिनय भी देखा है। नाटकवाले लोग स्नान आदि कर चुकने के बाद श्रीरामकृष्ण का दर्शन करने आये हैं।

शनिवार, २४ मई १८८४ ई., अमावस्या।

गोरे रंग का जो लड़का ‘विद्या’ बना था उसने अच्छा अभिनय किया था। श्रीरामकृष्ण आनन्द से उसके साथ ईश्वर सम्बन्धी अनेक बातें कर रहे हैं। भक्तगण उत्सुक होकर सब सुन रहे हैं।

श्रीरामकृष्ण – (विद्या के अभिनेता के प्रति) – तुम्हारा अभिनय बहुत अच्छा हुआ। यदि कोई गाने में, बजाने में, नाचने में या किसी भी एक विद्या में प्रवीण हो, तो वह चेष्टा करने पर शीघ्र ही ईश्वर को प्राप्त कर सकता है।

‘मृत्यु की याद करो।’ ‘अभ्यासयोग’

“और तुम लोग जिस प्रकार देर तक अभ्यास करके गाना, बजाना या नाचना सीखते हो, उसी प्रकार ईश्वर में मन लगाने का अभ्यास करना होता है। पूजा, जप, ध्यान, इन सब का नियमित रूप से अभ्यास करना पड़ता है।

“क्या तुम्हारा विवाह हो गया है? कोई बाल-बच्चे हैं?”

विद्या – जी, एक लड़की का देहान्त हो गया है, फिर एक सन्तान हुई है।

श्रीरामकृष्ण – इसी बीच में हुआ और मर भी गया। तुम्हारी यह कम उम्र! कहते

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हैं – ‘सन्ध्या के समय पति मरा, कितनी रात तक रोऊँगी!’ (सभी हँस पड़े।)

“संसार में सुख तो देख रहे हो? मानो आमड़ाफल, केवल गुठली और छिलका है। और फिर खाने से अम्लशूल हो जाता है!

“नाटक कम्पनी में नट का काम कर रहे हो, ठीक है, परन्तु बड़ा कष्ट होता है! अभी कम उम्र है इसीलिए गोलगाल चेहरा है। इसके बाद सब बिगड़ जायगा। नट प्रायः उसी प्रकार के होते हैं। मुँह सूखा, पेट मोटा, बाँह पर ताबीज। (सभी हँसे)

मैंने क्यों विद्यासुन्दर का गाना सुना? देखा – ताल, मान, गाना सब अच्छे हैं। बाद में माँ ने दिखा दिया कि नारायण ही इन नटों का रूप धारण कर नाटक कर रहे हैं।”

विद्या – जी, काम और कामना में क्या भेद है?

श्रीरामकृष्ण – काम मानो वृक्ष का मूल है और कामना मानो शाखा-प्रशाखाएँ।

“ये काम, क्रोध, लोभ आदि छः रिपु एकदम तो जायेंगे नहीं, इसीलिए ईश्वर की ओर उनका मुँह फेर देना होगा। यदि कामना करनी हो, लोभ करना हो तो ईश्वर की भक्ति की कामना करनी चाहिए और उन्हें पाने के लिए लोभ करना चाहिए; यदि मद अर्थात् मत्तता करनी है, अहंकार करना है, तो ‘मैं ईश्वर का दास हूँ, ईश्वर की सन्तान हूँ’ यह कहकर मत्तता, अहंकार करना चाहिए। सम्पूर्ण मन उन्हें दिये बिना उनका दर्शन नहीं होता।

“कामिनी और कांचन में मन का व्यर्थ में व्यय होता है। यह देखो न, बाल-बच्चे हुए हैं, नाटक में काम करना पड़ रहा है – इन सब अनेक कर्मों के कारण ईश्वर में मन का योग नहीं हो पाता।

“भोग रहने से ही योग घट जाता है। भोग रहने से ही कष्ट होता है। श्रीमद्भागवत में कहा है – अवधूत ने अपने चौबीस गुरुओं में चील को भी एक गुरु बनाया था। चील के मुँह में मछली थी, इसीलिए हजार कौओं ने उसे घेर लिया। मछली को मुँह में लेकर वह जिधर जाती थी उधर ही सब कौए काँव काँव करके उसके पीछे भागते थे। पर जब चील के मुँह से अपने आप मछली गिर गयी, तो सब कौए मछली की ओर दौड़े, चील की ओर फिर न गये।

“मछली अर्थात् भोग की चीज। कौए हैं चिन्ताएँ। जहाँ भोग है वहीं चिन्ता है। भोगों का त्याग होने से ही शान्ति होती है।

“फिर देखो, अर्थ ही अनर्थ हो जाता है। तुम भाई भाई अच्छे हो, परन्तु भाई भाई में बटवारे के प्रश्न पर झगड़ा होता है। कुत्ते आपस में एक दूसरे को चाटते हैं, खूब प्रेम भाव रहता है। परन्तु उन्हें यदि कोई भात, रोटी आदि कुछ फेंक दे, तो आपस में वे एक दूसरे को काटने लगेंगे।

“बीच-बीच में यहाँ पर आते जाना। (मास्टर आदि को दिखाकर) ये लोग आते हैं,

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रविवार या किसी दूसरे अवकाश के दिन आते हैं।”

विद्या – हमारा रविवार तीन मास का होता है। श्रावण, भाद्रपद और पौष - वर्षकाल और धान काटने का समय। जी, आपके पास आयें, यह तो हमारा अहोभाग्य है!

“दक्षिणेश्वर में आते समय दो व्यक्तियों का नाम सुना था – आपका और ज्ञानार्णव का।”

श्रीरामकृष्ण – भाइयों के साथ मेल रखकर रहना। मेल रहने से ही देखने सुनने में सब भला होता है। नाटक में नहीं देखा? चार व्यक्ति गाना गा रहे हैं, परन्तु यदि प्रत्येक व्यक्ति अलग अलग तान छेड़ दे तो नाटक पर ही पानी फिर जायगा!

विद्या – जाल में अनेक पक्षी फँसे पड़े हैं। यदि एक साथ चेष्टा करके जाल लेकर एक ही दिशा में उड़ जायें तो बहुत कुछ बचाव हो सकता है। परन्तु यदि प्रत्येक पक्षी अलग अलग दिशा में उड़ने की चेष्टा करे, तो कुछ नहीं होता। नाटक में भी देखने में आता है, सिर पर घड़ा, और नाच रहा है।

श्रीरामकृष्ण – गृहस्थी करो, परन्तु सिर पर घड़े को ठीक रखो अर्थात् ईश्वर की ओर मन को स्थिर रखो।

“मैंने पल्टन के सिपाहियों से कहा था, तुम लोग संसार का कामकाज करोगे, परन्तु कालरूपी (मृत्युरूपी) मूसल हाथ पर पड़ेगा, इसका ख्याल रखना।

“उस देश में बढ़ई लोगों की औरतें ओखली में चिउड़ा कूटती हैं। एक औरत मूसल को उठाती और गिराती है, और दूसरी चिउड़ा उलट देती है – यह ध्यान रखती है कि कहीं मूसला हाथ पर न पड़ जाय। इधर बच्चे को स्तन-पान भी कराती है और एक हाथ से भीगे धान को चूल्हे पर रखकर पतीले में भून लेती है। फिर ग्राहक के साथ बातचीत भी करती है, कहती है, तुम्हारे ऊपर इतने पैसे पहले के उधार हैं, दे जाना।

“ईश्वर में मन रखकर इसी प्रकार संसार में अनेकानेक कामकाज कर सकते हो, परन्तु अभ्यास चाहिए और होशियार रहना चाहिए, तब दोनों ओर की रक्षा होती है।”

आत्मदर्शन या ईश्वरदर्शन का उपाय-साधुसंग

या विज्ञान (साइन्स)?

विद्या – जी, इसका क्या प्रमाण है कि आत्मा शरीर से पृथक् है?

श्रीरामकृष्ण – प्रमाण? ईश्वर को देखा जा सकता है। तपस्या करने पर उनकी कृपा से ईश्वर का दर्शन होता है। ऋषियों ने आत्मा का साक्षात्कार किया था। साइन्स से ईश्वरतत्त्व जाना नहीं जाता, उसके द्वारा केवल इन इन्द्रियग्राह्य बातों का पता लगता है कि इसके साथ उसे मिलाने पर यह होता है और उसके साथ इसे मिलाने पर यह होता है;

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इसीलिए इस बुद्धि के द्वारा यह सब समझा नहीं जाता। साधुसंग करना होता है। वैद्य के साथ रहते रहते नाड़ी परखना आ जाता है।

विद्या – जी, अब समझा।

श्रीरामकृष्ण – तपस्या चाहिए, तब वस्तु की प्राप्ति होगी। शास्त्र के श्लोकों को रट लेने से भी कुछ न होगा। 'गांजा गांजा' मुँह से कहने से नशा नहीं होता। गांजा पीना पड़ता है।

“ईश्वर-दर्शन की बात लोगों को समझायी नहीं जा सकती। पाँच वर्ष के बालक को पति-पत्नी के मिलने के आनन्द की बात समझायी नहीं जा सकती।”

विद्या – जी, आत्मदर्शन किस उपाय से हो सकता है?

इसी समय राखाल कमरे में भोजन करने बैठ रहे थे। परन्तु वहाँ अनेक लोग हैं, इसलिए सोच-विचार कर रहे हैं। श्रीरामकृष्ण आजकल राखाल का गोपाल-भाव से पालन कर रहे हैं। – ठीक मानो माँ यशोदा का वात्सल्य-भाव।

श्रीरामकृष्ण (राखाल के प्रति) – खा न रे! ये लोग नहीं तो उठकर एक ओर खड़े हो जायँ। (एक भक्त के प्रति) राखाल के लिए बर्फ रखो। (राखाल के प्रति) तू फिर बन-हुगली जायगा? धूप में न जाना।

राखाल भोजन करने बैठे। श्रीरामकृष्ण फिर विद्या का अभिनय करनेवाले लड़के के साथ वार्तालाप कर रहे हैं।

श्रीरामकृष्ण – (विद्या के प्रति) – तुम सब ने मन्दिर में प्रसाद क्यों नहीं लिया? यहीं पर भोजन करते।

विद्या – जी, सभी की राय तो एक-सी नहीं है, इसीलिए अलग रसोई बन रही है। सभी लोग अतिथिशाला में भोजन करना नहीं चाहते।

राखाल भोजन करने बैठे हैं; श्रीरामकृष्ण भक्तों के साथ बरामदे में बैठकर फिर बातचीत कर रहे हैं।

(२)

आत्मदर्शन का उपाय

श्रीरामकृष्ण – (विद्या अभिनेता के प्रति) – आत्मदर्शन का उपाय है व्याकुलता। मन, वचन और कर्म से उन्हें पाने की चेष्टा। जब देह में काफी पित्त जम जाता है, तो सभी चीजें पीली दिखती हैं; पीले के अतिरिक्त दूसरा कोई रंग नहीं दिखता।

“तुम नाटकवालों में जो लोग केवल औरतों का काम करते हैं, उनका प्रकृतिभाव हो जाता है। औरतों का चिन्तन करके औरतों की तरह चलना-फिरना, सभी कुछ उनके समान हो जाता है। इसी प्रकार रात-दिन ईश्वर का चिन्तन करने पर उन्हीं का स्वभाव प्राप्त

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हो जाता है।

"मन को जिस रंग में रँगवाओगे उसका वही रंग हो जाता है। मन मानो धोबी के घर का धुला हुआ कपड़ा है।"

विद्या – तो इसे एक बार पहले धोबी के घर भेजना होगा।

श्रीरामकृष्ण – हाँ, पहले चित्तशुद्धि, उसके बाद मन को यदि ईश्वर-चिन्तन में छोड़ दो, तो उसी रंग का बन जायगा। फिर यदि संसार करो, नाटकवाले का काम करो या जो कुछ भी करो, उसी प्रकार का बन जायगा।

(३)

श्रीरामकृष्ण ने थोड़ा सा ही विश्राम किया था कि कलकत्ते से हरि, नारायण, नरेन्द्र बन्द्योपाध्याय आदि ने आकर भूमिष्ठ हो उन्हें प्रणाम किया। नरेन्द्र बन्द्योपाध्याय प्रेसीडेन्सी कॉलेज के संस्कृत अध्यापक राजकृष्ण बन्द्योपाध्याय के पुत्र हैं। घर में मेल न होने के कारण श्यामपुकुर में अलग मकान लेकर स्त्री-पुत्र के साथ रहते हैं। बहुत ही सरलचित्त व्यक्ति हैं; २९-३० साल की उम्र होगी। जीवन के शेष भाग में उन्होंने प्रयाग में निवास किया था। ५८ वर्ष में उनका देहान्त हुआ था।

ध्यान के समय वे घण्टा-ध्वनि आदि नाना प्रकार के शब्द सुनते थे। भूटान, उत्तर पश्चिम तथा अन्य अनेक प्रदेशों में उन्होंने भ्रमण किया था, बीच-बीच में श्रीरामकृष्ण का दर्शन करने आते थे।

हरि (स्वामी तुरीयानन्द) उन दिनों अपने बागबाजार के मकान में भाइयों के साथ रहते थे। जनरल असेम्बली में प्रवेशिका (मैट्रिक) तक पढ़कर उस समय घर पर ईश्वर-चिन्तन, शास्त्र-पाठ तथा योग का अभ्यास किया करते थे। कभी कभी दक्षिणेश्वर में जाकर श्रीरामकृष्ण का दर्शन करते थे। श्रीरामकृष्ण बागबाजार में बलराम के घर जाने पर उन्हें कभी कभी बुला लेते थे।

बौद्धधर्म की बात: ब्रह्म ज्ञानस्वरूप है

श्रीरामकृष्ण – (भक्तों के प्रति) – बुद्धदेव की बात हमने अनेक बार सुनी है। वे दस अवतारों में से एक हैं। ब्रह्म अचल, अटल है, निष्क्रिय है और ज्ञानस्वरूप है। जब बुद्धि उस ज्ञानस्वरूप में लीन हो जाती है, उस समय ब्रह्मज्ञान होता है, उस समय मनुष्य बुद्ध बन जाता है।

"न्यांगटा (तोतापुरी) कहा करता था, मन का लय बुद्धि में, और बुद्धि का लय ज्ञानस्वरूप में हो जाता है।

"जब तक 'अहं' भाव रहता है, तब तक ब्रह्मज्ञान नहीं होता। ब्रह्मज्ञान होने पर, ईश्वर का दर्शन होने पर 'अहं' अपने वश में आ जाता है। ऐसा न होने पर 'अहं' को

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वशीभूत नहीं किया जा सकता। अपनी परछाईं को पकड़ना कठिन है परन्तु सूर्य जब सिर पर आ जाता है तो परछाईं आधे हाथ के भीतर रहती है।”

भक्त – ईश्वर-दर्शन का स्वरूप कैसा है?

श्रीरामकृष्ण – नाटक का अभिनय नहीं देखा है? लोग सब आपस में बातचीत कर रहे हैं; ऐसे समय परदा उठ गया तब सब लोगों का सारा मन अभिनय में लग जाता है। फिर बाहर की ओर दृष्टि नहीं रहती। इसी का नाम है समाधिस्थ होना।

“फिर परदा गिरने पर पुनः बाहर की ओर दृष्टि। मायारूपी परदा गिरने पर फिर मनुष्य बहिर्मुख हो जाता है। (नरेन्द्र बन्द्योपाध्याय के प्रति) तुमने अनेक देशों में भ्रमण किया है। कुछ साधुओं की कहानी सुनाओ।”

बन्द्योपाध्याय ने भूटान में दो योगियों को देखा था, वे आधा सेर नीम का रस पी जाते थे, ये ही सब कहानियाँ कह रहे हैं। फिर नर्मदा के तट पर साधु के आश्रम में गये थे। उस आश्रम के साधु ने पैण्ट पहने बंगाली बाबू को देखकर कहा था, 'इसके पेट में छुरी है।'

श्रीरामकृष्ण – देखो, साधुओं के चित्र घर में रखने चाहिए, इससे सदा ईश्वर का उद्दीपन होता है।

बन्द्योपाध्याय – मैंने आपका चित्र कमरे में रखा है और साथ ही एक पहाड़ी साधु का चित्र भी रखा है – हाथ में गांजा की चिलम में आग जल रही है।

श्रीरामकृष्ण – हाँ, साधुओं का चित्र देखने से उद्दीपन होता है। जैसे मिट्टी का बना हुआ आम देखने से वास्तविक आम का उद्दीपन होता है, युवती स्त्री देखने से लोगों के मन में जिस प्रकार भोग का उद्दीपन होता है।

“इसीलिए तुम लोगों से कहता हूँ कि सदैव ही साधु-संग आवश्यक है। (बन्द्योपाध्याय के प्रति) संसार की ज्वाला तो देखी है। भोग लेने में ही ज्वाला है। चील के मुँह में जब तक मछली थी, तब तक झुण्ड के झुण्ड कौए आकर उसे तंग कर रहे थे।

“साधु-संगति में शान्ति होती है। जल के भीतर मगर बहुत देर तक रहता है, साँस लेने के लिए एक एक बार जल के ऊपर चला आता है। उस समय साँस लेकर शान्त हो जाता है।”

नाटकवाला – जी आपने भोग की बातें कहीं सो ठीक है। ईश्वर से भोग माँगने पर अन्त में विपत्ति होती है। मन में कितने प्रकार की कामनाएँ उठ रही हैं, सभी कामनाओं से तो मंगल नहीं होता। ईश्वर कल्पतरु हैं। मनुष्य उनसे जो भी कुछ माँगता है, वही उसे प्राप्त होता है। अब उसके मन में यदि ऐसी भावना हो कि 'ये तो कल्पतरु हैं अच्छा, देखें, यदि शेर यहाँ पर आ जाय तो जानों।' बस शेर की याद करते ही शेर आ खड़ा होता है और उसे खा जाता है।

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श्रीरामकृष्ण – हाँ, यह ध्यान में रखना कि शेर आता है। अधिक और क्या कहूँ, इधर मन रखो, ईश्वर को न भूलो – सरल भाव से उन्हें पुकारने पर वे दर्शन देंगे।

“एक और बात – नाटक के अन्त में कुछ हरिनाम करके समाप्त किया करो। इससे जो लोग गाते हैं और जो लोग सुनते हैं वे सभी ईश्वर का चिन्तन करते करते अपने अपने स्थानों में जायेंगे।”

नाटकवाले प्रणाम करके बिदा हुए।

गृही भक्तों की स्त्रियों को उपदेश

दो भक्तों की स्त्रियों ने आकर श्रीरामकृष्ण को प्रणाम किया। वे श्रीरामकृष्ण का दर्शन करने आयी हैं, इसलिए उपवास किये हुई हैं। दोनों ही घूँघटवाली, दो भाइयों की पत्नियाँ हैं। उम्र यही २२-२३ वर्ष के भीतर ही होगी। दोनों ही पुत्रों की माताएँ हैं।

श्रीरामकृष्ण – (स्त्रियों के प्रति) – देखो, तुम शिवपूजा किया करो। कैसे पूजा करनी होती है, 'नित्यकर्म' नाम की पुस्तक है, उसे पढ़कर देख लेना। देवपूजा करने से बहुत देर तक देवता का काम कर सकोगी। फूल चुनना, चन्दन घिसना, देवता के बर्तनों को मलना, देवता के लिए जलपान की सामग्री को सजाना – ये सब काम करने से उधर ही मन लगा रहेगा। नीच बुद्धि, हिंसा, क्रोध ये सब भाग जायेंगे। तुम दोनों – देवरानी जेठानी जब आपस में बातचीत किया करो, तो देवताओं की ही बातें किया करो।

“किसी प्रकार से ईश्वर में मन को लगा देना। एक बार भी उनकी विस्मृति न हो। जैसे तेल की धार – उसके बीच कुछ और नहीं है। एक ईंट या पत्थर को भी यदि ईश्वर मानकर भक्ति के साथ उसकी पूजा करो, तो उससे भी उनकी कृपा से ईश्वर-दर्शन हो सकता है।

“पहले जो कहा, शिवपूजा – यह सब पूजा करनी चाहिए। उसके बाद मन पक्का हो जाने पर अधिक दिन पूजा नहीं करनी पड़ती। उस समय सदा ही मन का योग बना रहता है – सदा ही स्मरण-मनन होता रहता है।”

बड़ी बहू – (श्रीरामकृष्ण के प्रति) – हमें क्या कृपा कर कुछ मन्त्र दे देंगे?

श्रीरामकृष्ण – (स्नेह के साथ) – मैं तो मन्त्र नहीं देता? मन्त्र देने से शिष्य का पाप-ताप लेना पड़ता है। माँ ने मुझे बच्चे की स्थिति में रखा है। अब तुम्हें जो शिवपूजा के लिए कह दिया है वही करो। बीच-बीच में आती रहना, बाद में ईश्वर की इच्छा से जो होने का है, होगा। स्नान-यात्रा के दिन फिर आने की चेष्टा करना।

“घर पर हरिनाम करने के लिए मैंने जो कहा था, क्या वह हो रहा है?”

बहू – जी हाँ।

श्रीरामकृष्ण – तुम लोग उपवास करके क्यों आयी हो? खाकर आना चाहिए।

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“स्त्रियाँ मेरी माँ का एक-एक रूप हैं न; इसीलिए मैं उनका कष्ट नहीं देख सकता। जगन्माता का एक-एक रूप। खाकर आओगी, आनन्द में रहोगी।”

यह कहकर श्री रामलाल को आदेश दिया कि वह उन बहुओं को जलपान कराये। फलहारिणी पूजा का प्रसाद – लूची, तरहतरह के फल, ग्लास ग्लास भर शरबत और मिठाई आदि उन्होंने ग्रहण किया।

श्रीरामकृष्ण ने कहा, “तुम लोगों ने कुछ खा लिया तो अब मेरा मन शान्त हुआ। मैं स्त्रियों को उपवासी नहीं देख सकता।”

श्रीरामकृष्ण शिवमन्दिर की सीढ़ी पर बैठे हैं। दिन के पाँच बजे का समय होगा। पास ही अधर, डाक्टर, निताई, मास्टर आदि दो-एक भक्त बैठे हैं।

श्रीरामकृष्ण – (भक्तों के प्रति) – देखो, मेरा स्वभाव बदलता जा रहा है।

अब कुछ गुह्य बातें कहने के उद्देश्य से एक सीढ़ी नीचे उतरकर भक्तों के पास जा बैठे।

मनुष्य में ईश्वर का सब से अधिक प्रकाश: अवतारतत्त्व

श्रीरामकृष्ण – तुम लोग भक्त हो, तुमसे कहने में हानि नहीं – आजकल मुझे ईश्वर के चिन्मय रूप का दर्शन नहीं होता। साकार नर-रूप में उनका दर्शन करता हूँ। ईश्वर के रूप का दर्शन, स्पर्श तथा आलिंगन करना मेरा स्वभाव है। अब ईश्वर मुझसे कह रहे हैं, ‘तुमने देह धारण की है, साकार नर-रूपों के साथ आनन्द करो।’

“वे तो सभी भूतों में विद्यमान हैं, परन्तु मनुष्य में अधिक प्रकट हैं।

“मनुष्य क्या कम है जी! ईश्वर का चिन्तन कर सकता है, अनन्त का चिन्तन कर सकता है; दूसरा कोई प्राणी ऐसा नहीं कर सकता।

“दूसरे प्राणियों में, वृक्षलताओं में तथा सर्व भूतों में वे हैं, परन्तु मनुष्य में उनका अधिक प्रकाश है।

“अग्नि-तत्त्व सर्व भूतों में है, सब चीजों में है, परन्तु लकड़ी में अधिक प्रकट है।

“राम ने लक्ष्मण से कहा था, ‘भाई, देखो हाथी इतना बड़ा जानवर है, परन्तु ईश्वर का चिन्तन नहीं कर सकता।’

“फिर अवतार में अधिक प्रकट हैं। राम ने लक्ष्मण से कहा था, ‘भाई, जिस मनुष्य में रागा-भक्ति देखो – भाव में हँसता है, रोता है, नाचता है – वहीं पर मैं हूँ।’ ”

श्रीरामकृष्ण चुपचाप बैठे हैं। थोड़ी देर बाद फिर बातचीत करने लगे।

श्रीरामकृष्ण – अच्छा, केशव सेन बहुत आता था। यहाँ पर आकर तो वह बहुत बदल गया। हाल में तो उसमें बहुत कुछ विशेषता आ गयी थी। यहाँ दलबल के साथ कई बार आया था। फिर अकेले आने की इच्छा थी। केशव का पहले वैसा साधुसंग नहीं हुआ

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था।

“कोलूटोला के मकान पर भेंट हुई। हृदय साथ था। केशव सेन जिस कमरे में था, उसी कमरे में हमें बैठाया। मेज पर शायद कुछ लिख रहा था, बहुत देर बाद कलम छोड़कर कुर्सी से नीचे उतरकर बैठा। हमें नमस्कार आदि कुछ नहीं किया।

“यहाँ पर कभी आता था। मैंने एक दिन भावविभोर स्थिति में कहा, 'साधु के सामने पैर पर पैर रखकर नहीं बैठना चाहिए; उससे रजोगुण की वृद्धि होती है।' वह जब भी आता, मैं स्वयं उसे नमस्कार करता था; तब उसने धीरे धीरे भूमिष्ठ होकर नमस्कार करना सीखा।

“फिर मैंने केशव से कहा, 'तुम लोग हरिनाम किया करो, कलियुग में उनके नाम-गुणों का कीर्तन करना चाहिए।' तब उन लोगों ने खोल-करताल लेकर हरिनाम करना प्रारम्भ किया।*

“हरिनाम में मेरा और भी विश्वास क्यों हुआ? इसी देवमन्दिर में बीच बीच में सन्त लोग आया करते हैं। एक मुलतान का साधु आया था, गंगासागर के यात्रियों के लिए प्रतीक्षा कर रहा था। (मास्टर को दिखाकर) इन्हीं की उम्र का होगा वह साधु। उसीने कहा था, उपाय नारदीय भक्ति।

“केशव एक दिन आया था। रात के दस बजे तक रहा। प्रताप तथा अन्य किसी किसी ने कहा, 'आज यहीं रहेंगे।' हम सब लोग वटवृक्ष के नीचे (पंचवटी में) बैठे थे। केशव ने कहा, 'नहीं, काम है, जाना होगा।'

“उस समय मैंने हँसकर कहा, मछली की टोकरी की गन्ध न होने पर क्या नींद नहीं आयेगी? एक मछली बेचनेवाली एक माली के घर अतिथि बनी थी। मछली बेचकर आ रही थी, साथ में मछली की टोकरी थी। उसे फूलवाले कमरे में सोने को दिया गया। फूलों की गन्ध से उसे अधिक रात तक नींद नहीं आयी। घरवाली ने उसकी यह दशा देखकर कहा, 'क्यों तुम छटपटा क्यों रही हो?' उसने कहा, 'कौन जाने भाई! शायद इस फूल की गन्ध से ही नींद नहीं आ रही है। मेरी मछली की टोकरी जरा ला दो तो सम्भव है नींद आ जाय।' अन्त में मछली की टोकरी लायी। उस पर जल छिड़ककर उसने नाक के पास रख ली। फिर खर्राटे के साथ सो गयी!

“कहानी सुनकर केशव के दलवाले जोर से हँसने लगे।

“केशव ने सायंकाल के बाद गंगाघाट में उपासना की। उपासना के बाद मैंने केशव


* श्री केशव सेन खोल-करताल लेकर कुछ वर्षों से ब्रह्मनाम कर रहे थे। श्रीरामकृष्ण के साथ १८७५ में साक्षात्कार होने के बाद से विशेष रूप से हरिनाम तथा माँ के नाम का 'खोल-करताल' लेकर कीर्तन करने लगे।

CC-0. In Public Domain. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

५००श्रीरामकृष्णवचनामृत२४ मई, १८८४

से कहा, 'देखो, भगवान ही एक रूप में भागवत बने हैं, इसीलिए वेद, पुराण, तन्त्र इन सब की पूजा करनी चाहिए। फिर एक रूप में वे भक्त बने हैं; भक्त का हृदय उनका बैठकघर है। बैठकघर में जाने से अनायास ही बाबू का दर्शन होता है। इसीलिए भक्त की पूजा से भगवान की पूजा होती है।'

“केशव तथा उनके दलवालों ने इन बातों को बड़े ही ध्यान से सुना। पूर्णिमा की रात, चारों ओर चाँदनी फैली हुई थी। गंगातट पर सीढ़ी के ऊपर हम सब लोग बैठे हुए थे। मैंने कहा, सभी लोग कहो, 'भागवत भक्त भगवान।'

“उस समय सभी ने एक स्वर से कहा, 'भागवत भक्त भगवान।' फिर मैंने कहा, 'कहो ब्रह्म ही शक्ति, शक्ति ही ब्रह्म है।' उन्होंने फिर एक स्वर से कहा, 'ब्रह्म ही शक्ति, शक्ति ही ब्रह्म है।' मैंने उनसे कहा, 'जिसे तुम ब्रह्म कहते हो, उसी को मैं माँ कहता हूँ। माँ बहुत मीठा नाम है।'

“जब फिर उनसे कहा, 'फिर कहो, गुरु कृष्ण वैष्णव।' उस समय केशव बोला, 'महाराज, उतनी दूर नहीं। इससे तो सभी लोग हमें कट्टर वैष्णव समझेंगे।'

“केशव से बीच बीच में कहता था, जिसे तुम लोग ब्रह्म कहते हो, उसी को मैं शक्ति, आद्याशक्ति कहता हूँ। जिस समय वे वाणी एवं मन से परे, निर्गुण, निष्क्रिय हैं, उस समय वेद में उन्हें ब्रह्म कहा है। जब देखता हूँ कि वे सृष्टि, स्थिति, प्रलय कर रहे हैं, तब उन्हें शक्ति, आद्याशक्ति आदि सब कहता हूँ।

“केशव से कहा, 'गृहस्थी में रहकर साधना होना बड़ा कठिन है – जिस कमरे में अचार, इमली और जल का घड़ा हो उस कमरे में रहकर सन्निपात का रोगी कैसे अच्छा हो सकता है? इसीलिए बीच बीच में साधन-भजन करने के लिए निर्जन स्थान में चले जाना चाहिए। वृक्ष का तना मोटा होने पर उसमें हाथी बाँध दिया जा सकता है, परन्तु पौधों को गाय-बछिया-बकरे चर जाते हैं।' इसीलिए केशव ने व्याख्यान में कहा, 'तुम लोग पक्के बनकर संसार में रहो।'

(भक्तों के प्रति) “देखो, केशव इतना बड़ा पण्डित, अंग्रेजी में लेक्चर देता था, कितने लोग उसे मानते थे, स्वयं सम्राज्ञी विक्टोरिया ने उसके साथ बैठकर बातचीत की है। परन्तु वह जब यहाँ आता था, तो नंगे बदन; साधुओं का दर्शन करना हो तो हाथ में कुछ लाना चाहिए, इसीलिए फल हाथ में लेकर आता था। बिलकुल अभिमानशून्य।

(अधर के प्रति) “देखो तुम इतने बड़े विद्वान, फिर डेपुटी हो, फिर भी स्त्री के ऐसे वश में हो। आगे बढ़ो। चन्दन की लकड़ी के बाद भी और अच्छी अच्छी चीजें हैं; चाँदी की खान, उसके बाद सोने की खान, उनके बाद हीरा, जवाहिरात। लकड़हारा वन में लकड़ी काट रहा था, इसीलिए ब्रह्मचारी ने उससे कहा, 'आगे बढ़ो।' ”

शिवमन्दिर से उतरकर श्रीरामकृष्ण आँगन में से होकर अपने कमरे की ओर आ रहे

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२४ मई, १८८४ | परिच्छेद ८० | ५०१

हैं। साथ हैं अधर, मास्टर आदि भक्तगण। इसी समय विष्णुघर के सेवक पुजारी श्री राम चटर्जी ने आकर समाचार दिया - श्री श्रीमाँ की नौकरानी को हैजा हुआ है।

राम चटर्जी - (श्रीरामकृष्ण के प्रति) - मैंने तो दस बजे ही कहा था, आप लोगों ने नहीं सुना।

श्रीरामकृष्ण - मैं क्या करूँ?

राम चटर्जी - आप क्या करेंगे? राखाल, रामलाल ये सब थे, उनमें से किसी ने कुछ न किया।

मास्टर - किशोरी (गुप्त) दवा लाने गया है, आलमबाजार से।

श्रीरामकृष्ण - क्या अकेला ही? कहाँ से लायेगा?

मास्टर - और कोई साथ नहीं है। आलमबाजार से लायेगा।

श्रीरामकृष्ण - (मास्टर के प्रति) - जो लोग रोगी की देखभाल कर रहे हैं उन्हें समझा दो कि रोग बढ़ने पर क्या करना होगा। और रोग कम होने पर क्या खायेगी यह भी बता दो।

मास्टर - जी, अच्छा।

अब भक्त स्त्रियों ने आकर प्रणाम किया। उन्होंने बिदा ली।

श्रीरामकृष्ण उनसे फिर बोले, “शिवपूजा जैसे कहा वैसे किया करो; और खा-पीकर आया करो। नहीं तो मुझे कष्ट होता है। स्नान-यात्रा के दिन फिर आने की चेष्टा करना।”

अब श्रीरामकृष्ण पश्चिम के गोल बरामदे में आकर बैठे हैं। बन्द्योपाध्याय, हरि, मास्टर आदि पास बैठे हैं। बन्द्योपाध्याय के सब पारिवारिक कष्ट श्रीरामकृष्ण जानते हैं।

श्रीरामकृष्ण - देखो, 'एक कौपीन' के लिए सब कष्ट हैं। विवाह करके बालबच्चे हुए हैं, इसीलिए नौकरी करनी पड़ती है। साधु कौपीन लेकर परेशान है। संसारी परेशान है भार्या लेकर। फिर घरवालों के साथ बनाव नहीं है, इसीलिए अलग मकान करना पड़ा। (हँसकर) चैतन्यदेव ने नित्यानन्द से कहा था, 'सुनो, सुनो, नित्यानन्दभाई, संसारी जीव की कभी गति नहीं है।'

मास्टर - (मन ही मन) - सम्भव है, श्रीरामकृष्ण अविद्या के संसार की बात कर रहे हैं। सम्भव है, अविद्या के संसार में 'संसारी जीव' रहते हैं।

श्रीरामकृष्ण - (मास्टर को दिखाकर बन्द्योपाध्याय के प्रति) - ये सभी अलग मकान लेकर रहते हैं। एक समय दो मनुष्यों की भेंट हुई। एक ने दूसरे से पूछा, 'तुम कौन हो?' दूसरे ने कहा, 'मैं हूँ विदेशी।' फिर उसने पहले से पूछा, 'और तुम कौन हो?' - 'मैं हूँ विरही।' (सभी हँसे।) दोनों में अच्छा मेल होगा!

“परन्तु शरणागत होने पर फिर भय नहीं रहता, वे ही रक्षा करेंगे।”

५०२ श्रीरामकृष्णवचनामृत २४ मई, १८८४

हरि – अच्छा, कुछ लोगों को उन्हें प्राप्त करने में उतना विलम्ब क्यों होता है?

श्रीरामकृष्ण – बात क्या है, जानते हो? – भोग और कर्म समाप्त हुए बिना व्याकुलता नहीं आती। वैद्य कहता है, 'दिन बीतने दो, उसके बाद साधारण औषधि से ही लाभ होगा।'

"नारद ने राम से कहा, 'राम! तुम अयोध्या में बैठे हो, रावण का वध कैसे होगा? तुम तो उसी के लिए अवतीर्ण हुए हो।' राम ने कहा, 'नारद! समय होने दो, रावण का कर्मक्षय होने दो, तब उसके वध की तैयारी होगी।' "

श्रीरामकृष्ण की विज्ञानि स्थिति

हरि – अच्छा, संसार में इतने दुःख क्यों हैं?

श्रीरामकृष्ण – यह संसार उनकी लीला है, खेल की तरह। इस लीला में सुख-दुःख, पाप-पुण्य, ज्ञान-अज्ञान, भला-बुरा सब कुछ है; दुःख, पाप ये सब न रहने से लीला नहीं चलती।

"लुका-लुकौअल खेल में खूँटी छूना पड़ता है। खेल के प्रारम्भ में ही ढाई छूने पर वह सन्तुष्ट नहीं होती। ईश्वर (ढाई) की इच्छा है कि खेल कुछ देर तक चलता रहे। उसके बाद – 'लाखों पतंगों में से दो एक कटते हैं, माँ, तब तुम हँसती हुई हथेली बजाती हो!'

"अर्थात् ईश्वर का दर्शन करके एक-दो व्यक्ति मुक्त हो जाते हैं – बहुत तपस्या के बाद, उनकी कृपा से। तब माँ आनन्द से हथेली बजाती है – 'ओहो! कट गया' यह कहकर।"

हरि – परन्तु इसी खेल में तो हमारे प्राण जो निकलते हैं!

श्रीरामकृष्ण – (हँसकर) – तुम कौन हो कहो न! ईश्वर ही सब कुछ बने हुए हैं – माया, जीव, जगत्, चौबीस तत्त्व।

"साँप बनकर काटता हूँ, और ओझा बनकर झाड़-फूक करता हूँ। वे विद्या, अविद्या दोनों ही बने हुए हैं। अविद्या-माया द्वारा अज्ञानी जीव बने हुए हैं, विद्या-माया द्वारा तथा गुरु के रूप में ओझा बनकर झाड़-फूक कर रहे हैं।

"अज्ञान, ज्ञान, विज्ञान। ज्ञानी देखते हैं, वे ही कर्ता हैं। सृष्टि, स्थिति तथा संहार कर रहे हैं। विज्ञानी देखता है कि वे ही यह सब बने हुए हैं।

"महाभाव, प्रेम होने पर देखता है, उनके अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है।

"भाव के सामने भक्ति फीकि है। भाव पकने पर महाभाव, प्रेम!

(बन्योपाध्याय के प्रति) "क्या तुम अभी भी ध्यान के समय घण्टे का शब्द सुनते हो?"

बन्यो. – रोज उसी शब्द को सुनता हूँ। फिर रूप का दर्शन! एक बार मन द्वारा

२४ मई, १८८४ | परिच्छेद ८० | ५०३

२४ मई, १८८४परिच्छेद ८०५०३

अनुभव कर लेने पर क्या वह फिर रुकता है ?

श्रीरामकृष्ण – (हँसकर) – हा; लकड़ी में एक बार आग लग जाने पर फिर बुझती नहीं। (भक्तों के प्रति) ये विश्वास की अनेक बातें जानते हैं।

बन्धो. – मेरा विश्वास बहुत अधिक है!

श्रीरामकृष्ण – अपने घर की औरतों को बलराम की लड़कियों के साथ लाना।

बन्धो. – बलराम कौन हैं?

श्रीरामकृष्ण – बलराम को नहीं जानते? बोसपाड़ा में घर है।

किसी सरलचित्त व्यक्ति को देखकर श्रीरामकृष्ण आनन्द में विभोर हो जाते हैं। बन्द्योपाध्याय बहुत सरल हैं। निरंजन भी सरल है। इसीलिए उसे भी बहुत चाहते हैं।

श्रीरामकृष्ण – (मास्टर के प्रति) – तुम्हें निरंजन से मिलने के लिए क्यों कह रहा हूँ? यह देखने के लिए कि वह वास्तव में सरल है या नहीं।

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परिच्छेद ८१

परिच्छेद ८१

संसार में किस प्रकार रहना चाहिए

(१)

जन्मोत्सव दिन। भक्तों के संग में

श्रीरामकृष्ण पंचवटी के नीचे पुराने वटवृक्ष के चबूतरे पर विजय, केदार, सुरेन्द्र, भवनाथ, राखाल आदि बहुत से भक्तों के साथ दक्षिण की ओर मुँह किये बैठे हैं। कुछ भक्त चबूतरे पर बैठे हैं। अधिकांश चबूतरे के नीचे, चारों ओर खड़े हुए हैं। दिन के एक बजे का समय होगा। रविवार २५ मई १८८४।

श्रीरामकृष्ण का जन्म-दिन फाल्गुन शुक्ला द्वितीया है। परन्तु उनका हाथ अभी अच्छा नहीं हुआ, इसलिए अब तक जन्मोत्सव नहीं मनाया गया। अब हाथ बहुत कुछ अच्छा है। इसलिए भक्तगण आनन्द मनाना चाहते हैं। सहचरी का गाना होगा। सहचरी की उम्र ज्यादा हो गयी है, परन्तु कीर्तन करने में उसकी प्रसिद्धि है।

मास्टर श्रीरामकृष्ण को कमरे में न देख पंचवटी की ओर चले आये। देखा, सब के मुख पर प्रसन्नता झलक रही है। उन्होंने यह नहीं देखा कि श्रीरामकृष्ण भी पेड़ के नीचे चबूतरे पर बैठे हैं। मास्टर खड़े थे – श्रीरामकृष्ण के बिलकुल सामने। उन्होंने व्यग्रतापूर्वक पूछा, वे कहाँ हैं? उनकी यह बात सुनकर सब के सब बड़े जोर से हँस पड़े। एकाएक सामने श्रीरामकृष्ण को देखकर वे लज्जित हो गये, उन्हें साष्टांग प्रणाम किया। देखा श्रीरामकृष्ण के बाईं ओर केदार (चटर्जी) और विजय (गोस्वामी) चबूतरे पर बैठे हुए हैं। श्रीरामकृष्ण दक्षिण की ओर मुँह किये बैठे हैं।

श्रीरामकृष्ण – (सहास्य, मास्टर से) – देखो, हमने दोनों को – केदार और विजय को कैसा मिला दिया है!

श्रीवृन्दावन से श्रीरामकृष्ण माधवी-लता ले आये थे। उसे पंचवटी में १८६८ ई. में लगाया था। अब वह लता खूब बड़ी हो गयी है। छोटे-छोटे लड़के उस पर बैठकर झूल रहे हैं, नाच रहे हैं, श्रीरामकृष्ण आनन्दपूर्वक देखते हुए कह रहे हैं – 'बन्दर के बच्चों का सा भाव है, गिर जाने पर भी नहीं छोड़ते!'

सुरेन्द्र चबूतरे के नीचे खड़े हैं। श्रीरामकृष्ण स्नेहपूर्वक कह रहे हैं – तुम ऊपर चले

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आओ, इस तरह पैर भी मजे में झुला सकोगे!

सुरेन्द्र ऊपर चले गये। भवनाथ कुर्ता पहने हुए बैठे हैं, यह देखकर सुरेन्द्र ने कहा, 'क्यों जी, आप विलायत जा रहे हैं क्या?'

श्रीरामकृष्ण हँसते हुए कहते हैं, हमारा विलायत ईश्वर के पास है।

श्रीरामकृष्ण भक्तों से अनेक विषयों पर बातचीत कर रहे हैं।

श्रीरामकृष्ण – मैं कभी कभी धोती-कपड़ा फेंककर आनन्दमय होकर घूमता था। शम्भू ने एक दिन कहा, 'क्यों जी, तुम इसीलिए कपड़े फेंककर घूमते हो! – बड़ा आराम मिलता है! – मैंने एक दिन ऐसा करके देखा था।'

सुरेन्द्र – आफिस से लौटकर कपड़े उतारता हुआ कहता हूँ, माँ, तुमने कितने बन्धनों से जकड़ रखा है।

श्रीरामकृष्ण – अष्टपाशों से बाँध रखा है। लज्जा, घृणा, भय, जाति-अभिमान, संकोच, छिपाने की इच्छा आदि सब।

श्रीरामकृष्ण गाने लगे। पहले गाने का भाव है – 'माँ, मुझे यही खेद है कि तुम्हारे जैसी माता के रहते भी मेरे जागते हुए घर में चोरी हो।' दूसरे गाने का अर्थ है – 'माँ, तुम इस संसार में खूब पतंग उड़ा रही हो। आशा की वायु पर पतंग उड़ रही है, उसमें माया की डोर लगी हुई है।'

श्रीरामकृष्ण – माया की डोर स्त्री-पुत्र हैं। विषय से वह डोर मांजी गयी है, इसीलिए उसमें इतनी तेजी आ गयी है। विषय अर्थात् कामिनी-कांचन।

श्रीरामकृष्ण फिर गाने लगे। गीत का भाव – “संसार में पासा खेलने के लिए आना है। यहाँ आकर मैंने बड़ी-बड़ी आशाएँ की थीं। आशा की आशा भग्न दशा ही है। पहले मेरे हक में पंजा आया। पौबारह! अठारह, सोलह, जिस तरह फिर फिरकर आया करते हैं, उसी तरह मैं भी युग और युगांतरों में आता गया। कच्चे बारह के पड़ने पर, माँ, पंजे और छक्के में मुझे बंध जाना पड़ा। छः दो आठ, छः चार दस, माँ, ये कोई मेरे वंश में नहीं हैं। इस खेल में मुझे कोई यश न मिला। अब तो बाजी भी खतम होनी चाहती है।”

श्रीरामकृष्ण – पंजा अर्थात् पञ्चभूत। पंजे और छक्के में बँध जाना, अर्थात् पञ्चभूतों और षड्रिपुओं के वश में आना। छः तीनों नौ को अंगूठा दिखाना, अर्थात् छः रिपुओं के बस में न आना और तीनों गुणों के पार हो जाना।

“सत्त्व, रज और तम, इन तीनों गुणों ने आदमी को अपने वश में कर रखा है। तीनों भाई-भाई हैं। सत्त्व के रहने पर वह रज को बुला सकता है और रज के रहने पर वह तम को बुला सकता है। तीनों गुण चोर हैं। तमोगुण विनाश करता है, रजोगुण बद्ध करता है, सतोगुण बन्धन तो जरूर खोलता है, परन्तु वह ईश्वर के पास तक नहीं ले जा सकता।”

विजय – (सहास्य) – सत् भी चोर है न?

५०६ श्रीरामकृष्णवचनामृत २५ मई, १८८४

श्रीरामकृष्ण – (सहास्य) – वह ईश्वर के पास नहीं ले जा सकता, परन्तु रास्ता दिखा देता है।

भवनाथ – वाह! कैसी सुन्दर बात है!

श्रीरामकृष्ण – हाँ, यह बड़ी ऊँची बात है।

भक्तगण ये सब बातें सुनकर आनन्द मना रहे हैं।

(२)

कामिनी-कांचन के सम्बन्ध में उपदेश

श्रीरामकृष्ण – बन्धन का कारण कामिनी-कांचन है। कामिनी-कांचन ही संसार है। कामिनी-कांचन ही हमें ईश्वर को देखने नहीं देता।

यह कहकर श्रीरामकृष्ण ने अंगौछे से मुख छिपा लिया। फिर कहा, “क्या अब तुम लोग मुझे देख रहे हो? यही आवरण है। यह कामिनी-कांचन का आवरण दूर हुआ नहीं कि चिदानन्द मिले।

“देखो न, जिसने स्त्री का सुख छोड़ा उसने संसार का सुख छोड़ा, ईश्वर उसके बहुत निकट हैं।”

कोई भक्त बैठे, कोई खड़े ये सब बातें सुन रहे हैं।

श्रीरामकृष्ण – (केदार, विजय आदि से) – स्त्री का सुख जिसने छोड़ा, उसने संसार का सुख छोड़ा। यह कामिनी-कांचन ही आवरण है। तुम्हारे इतनी बड़ी बड़ी मूंछें हैं, तो भी तुम लोग उसी में हो! कहो, मन ही मन विचार करके देखो।

विजय – जी हाँ, यह सच है।

केदार चुप हैं। श्रीरामकृष्ण फिर कहने लगे – “सभी को देखता हूँ, स्त्रियों के वशीभूत हैं। मैं कप्तान के घर गया था। वहाँ से होकर राम के घर जाना था। इसलिए कप्तान से कहा – 'गाड़ी का किराया दे दो।' कप्तान ने अपनी स्त्री से कहा। वह स्त्री भी वैसी ही थी – 'क्या हुआ' 'क्या हुआ' करने लगी! अन्त में कप्तान ने कहा, 'खैर वे ही लोग (राम आदि) दे देंगे।' गीता-भागवत-वेदान्त सब स्त्री के सामने झुकते हैं। (सब हँसते हैं।)

“रुपया-पैसा और सर्वस्व बीबी के हाथ में! और फिर कहा जाता है – 'मैं दो रुपये भी अपने पास नहीं रख सकता – न जाने मेरा स्वभाव कैसा है।'

“बड़े बाबू के हाथ में बहुत से काम हैं, परन्तु वे किसी को देते नहीं। एक ने कहा गुलाब-जान के पास जाकर सिफारिश कराओ तो काम हो जायगा। गुलाब-जान बड़े बाबू की रखेली है।

“पुरुषों में यह समझ नहीं रह गयी कि देखें कि वे स्त्रियों के कारण कितना उतर

२५ मई, १८८४ | परिच्छेद ८१ | ५०७

२५ मई, १८८४परिच्छेद ८१५०७

गये हैं।

“किले में जब गाड़ी पर सवार होकर पहुँचा, तब जान पड़ा कि मैं साधारण रास्ते से होकर आया। वहाँ पहुँचने पर देखा तो चार मंजिल नीचे चला गया था। रास्ता ढालू था। जिसे भूत पकड़ता है, वह नहीं समझ सकता है कि उसे भूत लगा है। वह सोचता है, मैं बिलकुल ठीक हूँ।”

विजय – (सहास्य) – कोई ओझा मिल गया तो वह उतार देता है।

श्रीरामकृष्ण ने इसका विशेष उत्तर नहीं दिया, केवल कहा, वह ईश्वर की इच्छा है। वे फिर स्त्रियों के सम्बन्ध में कहने लगे।

श्रीरामकृष्ण – जिससे पूछता हूँ, वही कहता है, जी हाँ, मेरी स्त्री अच्छी है। किसी की स्त्री खराब नहीं निकली! (सब हँसते हैं।)

“जो लोग कामिनी-कांचन लेकर रहते हैं, वे नशे में कुछ समझ नहीं पाते। जो लोग शतरञ्ज खेलते हैं, वे बहुत समय तक नहीं समझते कि कौनसी चाल ठीक होगी; परन्तु जो लोग अलग से देखते हैं वे बहुत कुछ समझते हैं।

“स्त्री मायारूपिणी है। नारद राम की स्तुति करते हुए कहने लगे – ‘हे राम, जितने पुरुष हैं, सब तुम्हारे ही अंश से हुए हैं और जितनी स्त्रियाँ हैं, वे सब मायारूपिणी सीता के अंश से हुई हैं। मैं और कोई वरदान नहीं चाहता। यही करो जिससे तुम्हारे पादपद्मों में शुद्धा भक्ति हो। फिर तुम्हारे मोहिनी-माया में मुग्ध न होऊँ।’ ”

सुरेन्द्र के छोटे भाई गिरीन्द्र और उनके भतीजे नगेन्द्र आदि आये हुए हैं। नगेन्द्र वकालत के लिए तैयारी कर रहे हैं।

श्रीरामकृष्ण – (गिरीन्द्र आदि से) – तुम लोगों से कहता हूँ, तुम लोग संसार में न फँस जाना। देखो, राखाल को ज्ञान और अज्ञान का बोध हो गया है – सत् असत् का विचार पैदा हो गया है – अब मैं उससे कहता हूँ तू घर जा, कभी कभी यहाँ आना, दो एक रोज रह जाया करना।

“और तुम लोग आपस में मिलकर रहोगे, तभी तुम्हारा कल्याण होगा, और आनन्दपूर्वक रहोगे। नाटकवाले अगर एक स्वर से गाते हैं तो नाटक अच्छा होता है, और जो लोग सुनते हैं, उन्हें भी आनन्द मिलता है।

“ईश्वर पर अधिक मन रखकर और संसार में थोड़ा मन लगाकर संसार का काम करना।

“साधुओं का बारह आने मन ईश्वर पर रहता है, चार आने दूसरे कामों में लगाते हैं। साधु ईश्वर की ही कथा पर अधिक ध्यान रखते हैं। साँप की पूँछ पर पैर रखने से फिर रक्षा नहीं। शायद पूँछ में उसे अधिक चोट लगती है।”

श्रीरामकृष्ण झाऊतल्ले की ओर जाते समय सींती के गोपाल से छाते के बारे में कह

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५०८ श्रीरामकृष्णवचनामृत २५ मई, १८८४

गये हैं। गोपाल ने मास्टर से कहा, 'वे कह गये हैं, अपना छाता कमरे में रख देना।' पंचवटी में कीर्तन का आयोजन होने लगा। श्रीरामकृष्ण आकर बैठे। सहचरी गा रही है। भक्तगण चारों ओर बैठे हैं, कोई कोई खड़े भी हैं।

कल शनिवार अमावस्या थी। जेठ का महीना है। आज ही से मेघ दिखलायी देने लगे। एकाएक आँधी भी चल पड़ी। श्रीरामकृष्ण भक्तों के साथ अपने कमरे में चले आये। निश्चय हुआ कि कीर्तन उसी कमरे में होगा।

श्रीरामकृष्ण – (सींती के गोपाल से) – क्यों जी छाता ले आये हो?

गोपाल – जी नहीं, गाना सुनते ही सुनते भूल गया।

छाता पंचवटी में पड़ा हुआ है, गोपाल जल्दी से लेने के लिए चले गये।

श्रीरामकृष्ण – मै इतना लापरवाह तो हूँ, फिर भी इस दरजे को अभी नहीं पहुँचा।

"राखाल ने एक जगह निमन्त्रण की बात पर तेरह तारीख को कह दिया ग्यारह तारीख!

"और गोपाल आखिर गौओं के पाल (समूह) ही तो हैं! (सब हँसते हैं।)

"वही, जो एक सुनारों की कहानी है – एक कहता है 'केशव', दूसरा कहता है 'गोपाल', तीसरा कहता है 'हरि', चौथा कहता है 'हर'! उसमें, उस गोपाल का अर्थ है, गौओं का पाल (समूह)!" (सब हँसते हैं।)

सुरेन्द्र गोपाल को लक्ष्य करके हँसते हुए कह रहे हैं – 'कान्हा कहाँ हैं?'

(३)

कीर्तन करनेवाली गौरांग के संन्यास का कीर्तन गा रही है। श्रीरामकृष्ण गौरांग-संन्यास का कीर्तन सुनते सुनते खड़े होकर समाधिमग्न हो गये। उसी समय भक्तों ने उनके गलें में फूलों की माला डाल दी। भवनाथ और राखाल श्रीरामकृष्ण को पकड़े हुए हैं कि कहीं गिर न जायँ। श्रीरामकृष्ण उत्तर की ओर मुँह किये हुए हैं। विजय, केदार, राम, मास्टर, मनमोहन, लाटू आदि भक्तगण मण्डलाकार उन्हें घेरकर खड़े हैं।

कृष्ण ही अखण्ड सच्चिदानन्द हैं वे ही जीव-जगत् हैं

धीरे धीरे समाधि छूट रही है। श्रीरामकृष्ण सच्चिदानन्द श्रीकृष्ण से बातचीत कर रहे हैं। 'कृष्ण' इस नाम का एक एक बार उच्चारण कर रहे हैं। कभी कभी साफ उच्चारण भी नहीं होता। कह रहे हैं – "कृष्ण! कृष्ण! सच्चिदानन्द! – कहाँ हो, आजकल तुम्हारा रूप देखने को नहीं मिलता! अब तुम्हें भीतर भी देख रहा हूँ और बाहर भी। जीव, जगत्, चौबीस तत्त्व सब तुम्हीं हो। मन, बुद्धि सब तुम्हीं हो। गुरु के प्रणाम में है –

अखण्डमण्डलाकारं व्याप्तं येन चराचरम्।
तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः॥

CC-0. In Public Domain. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

२५ मई, १८८४ | परिच्छेद ८१ | ५०९

२५ मई, १८८४परिच्छेद ८१५०९

तुम्हीं अखण्ड हो, चराचर को व्याप्त किये हुए भी तुम्हीं हो। तुम्हीं आधार हो, तुम्हीं आधेय हो। प्राण-कृष्ण! मन-कृष्ण! बुद्धि-कृष्ण! आत्मा-कृष्ण! प्राण हे गोविन्द! मेरे जीवन हो!"

विजय को भी आवेश हो गया है। श्रीरामकृष्ण कहते हैं, बाबू क्या तुम भी बेहोश हो गये हो?

विजय – (विनीत भाव से) – जी नहीं।

कीर्तन करनेवाली ने गाया – 'सदा ही हृदय में रखती, ऐ प्राण प्यारे!' श्रीरामकृष्ण फिर समाधिमग्न हो गये। – टूटा हाथ भवनाथ के कन्धे पर है।

श्रीरामकृष्ण का मन जब कुछ बहिर्मुख हुआ, तब गानेवाली ने गाया – तुम्हारे लिए जिसने सर्वस्व का त्याग किया, उसे भी इतना दुःख!

श्रीरामकृष्ण ने गानेवाली को प्रणाम किया। बैठकर गाना सुन रहे हैं। – कभी कभी भावाविष्ट हो रहे हैं। गानेवाली ने गाना बन्द कर दिया। श्रीरामकृष्ण बातचीत करने लगे।

श्रीरामकृष्ण – (विजय आदि भक्तों के प्रति) – प्रेम किसे कहते हैं? ईश्वर पर जिसका प्रेम होता है – जैसे चैतन्यदेव का – वह संसार को तो भूल जायगा ही, किन्तु इतनी प्रिय वस्तु यह जो देह है, वह उसे भी भूल जायगा।

प्रेम के होने पर क्या होता है, इसका हाल श्रीरामकृष्ण एक गीत गाकर बतला रहे हैं। गीत का भाव है :–

"मेरे वे दिन कब आयेंगे जब हरि हरि कहते हुए मेरी आँखों से धारा बह चलेगी – शरीर पुलकायमान हो उठेगा – संसार की वासना मिट जायेगी – दुर्दिन दूर होंगे और सुदिन आयेंगे। ईश्वर की ऐसी दया कब होगी?"

श्रीरामकृष्ण खड़े होकर नृत्य कर रहे हैं। भक्तगण भी उनके साथ नाच रहे हैं। श्रीरामकृष्ण ने मास्टर की बाँह पकड़ कर उन्हें मण्डल के भीतर खींच लिया।

नृत्य करते हुए श्रीरामकृष्ण फिर समाधि में डूब गये। चित्रवत् खड़े रह गये। केदार समाधि भंग करने के लिए अब कह रहे हैं –

"हृदय-कमल मध्ये निर्विशेषं निरीहं, हरि-हर-विधि-वेद्यं योगिभिर्ध्यानगम्यम्। जनन-मरण-भीति-भ्रंशि सच्चित्स्वरूपं, सकल-भुवन-बीजं ब्रह्म-चैतन्यमीड़े।।"

क्रमशः श्रीरामकृष्ण की समाधि छूटी। उन्होंने आसन ग्रहण किया और नाम ले रहे हैं – ॐ सच्चिदानन्द! गोविन्द! गोविन्द! गोविन्द! योगमाया! – भागवत भक्त भगवान!

कीर्तन और नृत्य की जगह की धूल श्रीरामकृष्ण ले रहे हैं।

५१० श्रीरामकृष्णवचनामृत २५ मई, १८८४

(४)

संन्यासी का कठिन व्रत। संन्यासी और लोकशिक्षा

श्रीरामकृष्ण गंगा के किनारेवाले गोल बरामदे में बैठे हुए हैं। पास ही विजय, भवनाथ, मास्टर, केदार आदि भक्तगण हैं। श्रीरामकृष्ण एक एक बार कह रहे हैं, हा कृष्ण चैतन्य!

श्रीरामकृष्ण – (विजय आदि भक्तों से) – घर में खूब राम नाम किया गया है, कोई कहता था, इसीसे खूब रंग जमा!

भवनाथ – तिस पर संन्यास की बात!

श्रीरामकृष्ण – अहा! क्या भाव है!

यह कहकर श्रीरामकृष्ण ने गौरांग पर एक गाना गाया। गीत के समाप्त होने पर आपने विजय आदि भक्तों से कहा – “कीर्तन में बहुत ही अच्छा कहा है! – संन्यासी को नारी की ओर नजर भी उठाकर न देखना चाहिए, संन्यासी का धर्म यही है।”

विजय – जी हाँ।

श्रीरामकृष्ण – संन्यासी को देखकर लोग शिक्षा लेंगे न, इसीलिए इतना कठोर नियम है। संन्यासी को स्त्रियों का चित्र भी न देखना चाहिए। उसके लिए ऐसा कठोर नियम है। काला बकरा माता की बलि पर चढ़ाया जाता है, परन्तु जरा भी कहीं घाव हुआ तो फिर उसकी बलि नहीं दी जाती। स्त्रियों का संग तो करना ही नहीं चाहिए। इतना ही नहीं वरन् उनसे बातचीत करना भी संन्यासी के लिए निषिद्ध है।

विजय – छोटे हरिदास ने एक भक्त स्त्री के साथ बातचीत की थी, चैतन्यदेव ने हरिदास का त्याग कर दिया था।

श्रीरामकृष्ण – संन्यासी के लिए कामिनी-कांचन, जैसे सुन्दरी स्त्री के लिए उसके देह की एक खास बदबू। वह बदबू रही तो सब सौन्दर्य ही वृथा है।

“मारवाड़ी ने मेरे नाम से रुपये लिख देना चाहा – मथुर ने जमीन लिख देना चाहा, परन्तु मैं यह कुछ न ले सका।

“संन्यासी के लिए बड़े कठिन नियम हैं। जब साधु-संन्यासी का भेष किया, तब उसे ठीक ठीक साधुओं और संन्यासियों का काम करना चाहिए। थिएटर में देखा नहीं? जो राजा बनता है, वह राजा की ही तरह रहता है, जो मन्त्री बनता है, वह ठीक उसी तरह के आचरण करता है।

“किसी बहुरुपिये ने त्यागी साधु का स्वाँग दिखाया, बिलकुल साधु बन गया। दर्शकों ने उसे एक तोड़ा रुपया देना चाहा। वह ‘उँह’ कहकर चला गया। तोड़ा छुआ तक नहीं। परन्तु थोड़ी देर बाद, देह और हाथ-पैर धोकर अपने कपड़े पहनकर वह आया।